राधा को जाने
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आदि में न होती यदि राधा की ‘र’कार (पुनर्प्रस्तुति)
(ललित निबंध)
(राधाष्टमी पर विशेष)
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जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी होते हैं, जब प्रतीत होता है कि इतिहास की दुर्दांत शक्तियाँ अपनी निर्मम गति से बढ़ रही हैं, जिनमे हम स्वयं को कभी विवश पाते हैं, कभी विक्षुब्ध; कभी विद्रोही तो कभी प्रतिशोधयुक्त; कभी हाथ में वल्गाएँ थामे गतिनायक, तो कभी चुपचाप शाप स्वीकार करते हुये आत्मबलिदानी! किन्तु कुछ ऐसे क्षण भी होते हैं – जब यह प्रतीत होता है ये जो समस्त बाह्य उद्वेग हैं, महत्व उनका नहीं, बल्कि उनका है जो अंतःकरण में साक्षात्कृत होता है –चरम तन्मयता का वह क्षण जो एक स्तर पर समस्त बाह्य इतिहास की प्रक्रिया से अधिक मूल्यवान है, जो हमें एक सीप की भाँति खोल देता है, हमें “अवमुक्त” कर देता है और समस्त बाह्य, समस्त अतीत, वर्तमान और भविष्य, सिमट कर उस एक क्षण में “मुक्ता” सदृश पूँजीभूत हो जाता है और तब हम, हम नहीं रह जाते।
मुझ पुण्यबल एवं तपोबल से हीन, पाप – पङ्किल में डूबे कामकीट, तुच्छातितुच्छ पामर को चरम तन्मयता का वह क्षण उपलब्ध कहाँ?
किन्तु फिर भी एक झलक तो कभी – कभार दिख ही जाती है और उस एक झलक से ही कोटि – पाप और अवदमन तिरोहित हो गये लगते हैं। सत्य है कि वह झलक स्थायी नहीं! वह स्वयं तिरोहित हो जाती है, मेरे सम्पूर्ण पापों तथा अवदमनो को पुनः मुझमें छोड़ कर, और मैं वही रह जाता हूँ, पाप – पङ्किल में डूबा तुच्छातितुच्छ पामर कामकीट!
और वह झलक है भारतीय वाङ्गमय और भारतीय साहित्य की अद्वितीय विभूति – “राधा”! कृष्ण के नाम की “र” कार –– राधा! कृष्ण का आह्लाद – “राधा”! कृष्ण का प्रेम – राधा!
ऐतिहासिक दृष्टि से राधा पर विमर्श करने वाले कहते हैं कि राधा का नाम और कृष्ण के साथ राधा का प्रेमाख्यान प्रथम-द्वितीय शती में आभीरों के युग में प्राप्त होता है। कुछ लोग मानते हैं कि यह अनुराधा नक्षत्र से उद्भूत है और अनुराधा नक्षत्र में सूर्य के पहुँचने पर मार्गशीर्ष माह प्रारम्भ होता है जो पहले इस आर्यावर्त का वर्ष का आरम्भ माना जाता था, और इसी लिए व्यास ने गीता में कृष्ण से कहलवाया – “मासे मार्गशीर्षोहम !”
यह विमर्श एक ऐतिहासिक विमर्श है, व्यक्ति रूप में राधा का उत्स खोजने का प्रयास है, और मुझे प्रतीत होता है कि यह निरर्थक प्रयास है। क्योंकि राधा व्यक्ति नहीं! राधा तो एक भाव है, बल्कि भाव से भी कहीं बहुत ऊँची “महाभाव” है। विडम्बना यही है, कि जहाँ भावना की दृष्टि चाहिये वहाँ हम ज्ञान का सहारा लेने लगते हैं और जहाँ ज्ञान की दृष्टि चाहिये वहाँ भावना की दुहाई देने लगते हैं और तब कहीं की बात कहीं और जा पहुँचती है तथा पीछे छोड़ जाती है एक खिन्नता! विशेष रूप से यह उनके द्वारा होता है जो स्वीकारभाव रहित मानसिकता के प्रतिनिधि हैं और नकार ही उनकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। चूंकि सिद्ध करने का उत्तरदायित्व उनका नहीं, तो वे मात्र अपने नकार के माध्यम से आपकी खीझ का आनंद लेते हैं।
यह अकाट्य तथ्य भी है और महान आश्चर्य का विषय भी, कि “श्रीमद्भागवत” में “राधा” का कोई उल्लेख नहीं! सम्पूर्ण आर्यावर्त जिसके प्रेमकथाओं से परिप्लुत है, और सम्पूर्ण लोक मानस कृष्ण का नाम लेने से पहले जिसका नाम लेता है – इस प्रकार जो सदा कृष्ण से संश्लिष्ट है, श्रीमद्भागवत में कहीं उसका नाम तक नहीं? क्यों?
इसका प्रतिकार करने हेतु कुछ लोग इस श्लोक का उद्धरण देते है ---
पुलकान्गमुपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता|
सर्वास्ता केशावालोक परमोत्सवनिवृता ||
(श्रीमद्भागवत – दशम स्कंध, बत्तीसवां अध्याय, श्लोक ८/९)
[जहाँ अन्य गोपियाँ स्पर्श के द्वारा कृष्ण से सम्बन्ध बनाती हैं, वहीं एक गोपी ऐसी भी है जो उन्हें अपने नेत्रों के सम्पुट में भर कर हृदय में पहुँचा देती है और वहीं उनसे तादात्म्य स्थापित करती है|]
उनके अनुसार इस श्लोक में जिस गोपी का वर्णन है वही राधा है। नाम के प्रति दुराग्रह रखने वाले पुनः पूछेंगे “इतना लिख दिया पर छोटा सा नाम नहीं लिख सके वेद व्यास?”
अब क्या कहा जाये? सचमुच, लिखा तो नहीं ही व्यास ने! किन्तु फिर भक्तिभाव से पगा एक अनूठा तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि – शुकदेव जी को यह श्रीमद्भागवत कथा केवल सात दिन में ही परीक्षित को सुना देनी थी, और “श्रीराधा” का नाम लेते ही उन्हें स्वयं छः मास की समाधि लग जाती थी, सो वे जान-बूझ कर स्वयं को यह नाम लेने से बचा गये। किन्तु तर्कवादियों के लिये तो यही सत्य है कि “राधा” का महत्व आठवीं – नौवीं शती से ही भारतीय साहित्य और कला में दृष्टिगोचर होता है। परन्तु यदि इतिहास ही से राधा प्रमाणित होती है तो उसका भी साक्ष्य है।
"राधा" शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में भी है जिसका वहाँ अर्थ है "कार्य सिद्ध करने वाली", "वैशाख पूर्णिमा", "वृषभानु गोप की कन्या", "कृष्ण-प्रेयसी", "विष्णुकान्ता", आदि। बाद के अन्य ग्रन्थों में जैसे – हाल की "गाथा सप्तशती", विष्णु शर्मा के "पंचतंत्र", धनञ्जय के "दशरूपक", भट्टनारायण के "वेणीसंहार" आदि में भी राधा का उल्लेख है। यह अवश्य है कि तब राधा का स्वरुप वैसा नहीं था, जैसा "जयदेव" ने "गीतगोविन्द" के माध्यम से रचा।
यदि सच पूछिये तो वास्तविकता में “राधा” का चरित्र “जयदेव” की देन है। देववाणी संस्कृत में रचा उनका गीति-काव्य “गीतगोविन्द” ही सर्वप्रथम “राधा” को उसके महनीय रूप में पुनर्सृजित और प्रतिष्ठित कर पाता है। ऐसा क्यों? तो उसका कारण यह है कि गीतगोविन्द के अतिरिक्त अन्य कोई भी काव्य जनमानस में इतना लोकप्रिय न हो सका, क्योंकि अन्य ग्रन्थ इतने सरस न थे। गीतगोविन्द में जो राधा प्रकट हुई वह इतनी भावमय थी कि उसने आने वाले हर युग को अपने भाव से आपूरित कर दिया और भारतीय जन-मानस ज्यों-ज्यों भावमय होता गया, राधा भी त्यों-त्यों और भी रूपमय, रसमय, प्राणमय, अर्चनामय और आनंदमय होती चली गयी।
जयदेव के देववाणी की पीयूष-धारा तो काल की कठोरता में कहीं खो गयी किन्तु जब राधा और कृष्ण की लीलाओं का गान करने के लिये अष्टयाम के संत-कवियों ने अपने तानपूरे उठाये तो सम्पूर्ण लोक–मानस उनके गायन में डूब-डूब गया, जिसमें सबसे ऊँची, सुरीली और मधुर झङ्कार “सूरदास” के तानपूरे की थी।
जयदेव राधा की प्रतिष्ठा करते हुये बहुत सचेत थे। उन्होने राधा को जो कलेवर दिया उस के प्रति उन्हें आभास था, कि भक्ति के साथ यह गहन शृंगार सबको नहीं पचेगा। कोरे भक्त इस रूप से उद्विग्न हो जायेंगे और शृंगार तथा प्रेम को मात्र विलास समझने वाले सूखी टहनी की भाँति रूर्ह (रूढ़ का ठेठ भोजपुरिया संस्करण है रूर्ह, कठोर अर्थ में) लोग तो अर्थ का अनर्थ ही कर डालेंगे, इसीलिए प्रथम सर्ग के चतुर्थ श्लोक में जयदेव कहते है –
“यदि हरिस्मरणे सरसं मनो,
यदि विलास-कलासु-कुतूहलम्।
मधुर कोमलकान्तपदावलीं शृणु,
तदा जयदेव सरस्वतीम्।।
यदि आपका मन हरि स्मरण में सरस है और यदि आपके भीतर विलास कलाओं के प्रति कुतूहल है, तो आप जयदेव की इस कोमलकान्त पदावली से युक्त सरस्वती को सुनें।
ऊपर से तो यह श्लोक और इसका अर्थ बहुत सरल लगता है, किन्तु है नहीं! वस्तुतः कवि का अभिप्राय उसके शब्दों से कहीं अधिक है। वह कहना चाहता है कि यदि आप केवल भक्ति – रस में डूबे हैं तो भी, और यदि केवल शृंगार के रसिक हैं तो भी, आप इस काव्य – तत्व के, इस राधा – तत्व के अधिकारी नहीं! इसका अधिकारी वही है जो भक्ति और शृंगार दोनों में डूबा हो, और एक साथ भक्ति और श्रृंगार दोनों में वही डूब सकता है जिसकी भक्ति भी भक्ति का अतिक्रमण कर चुकी हो तथा शृंगार भी शृंगार का अतिक्रमण कर चुका हो। जो भक्ति और शृंगार दोनों में डूब कर दोनों से पार निकल गया हो वह इस राधा – तत्व का वास्तविक अधिकारी है। संसार में प्यार के कितने रूप हैं - ईर्ष्या है, मोह है, खीझ है, उत्कंठा है, प्रतीक्षा है, मिलन है, विलय है, परन्तु विलय के बाद भी लगे कि मिलना नहीं हुआ, ऐसी लीला में झोंक देने की तैयारी हो – जहाँ यह निश्चित है कि तुम, तुम नहीं रह जाओगे, फिर भी तुम्हें ललक हो कि उस अचिन्त्य भाव को जानना है तो जानना है, तो ही राधा को समझा जा सकता है। अतः जयदेव का उस छन्द द्वारा निकलता सीधा तात्पर्य यह, कि यदि ऐसा नहीं है तो आप जयदेव की पदावलियों को मत सुनें।
प्रथम तो यही ध्यातव्य है कि “राधा” कोई शरीर नहीं है। वह इन्द्रिय भी नहीं! वह मात्र “प्यार” है। वह तो कृष्ण जिन सोलह कलाओं से संपन्न हैं उनकी सोलहवीं कला है, जिसे आप “अमृता” कह लें, स्वयं को मिटा का विराट का वरण करने की उत्सुकता कह लें, समस्त सुखों और ऐश्वर्य को तथा उनकी कामनाओं को भी त्याग कर केवल “आराधिका” होने के अधिकार का वरण कह लें, इनमें से सब कह लें अथवा इन में से कुछ भी कह लें!
चन्द्रमण्डल में सोलह कलायें हैं। चंद्रमा की पंद्रह कलायें प्रतिपदा से पूर्णिमा तक काल के अधीन हैं, किन्तु सोलहवीं कला शाश्वत महाकाल के अधीन है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक की चन्द्रकला एक-एक कला का
कृष्णपक्ष की प्रत्येक रात्रि क्रमशः एक-एक कर भक्षण करती जाती है, और अमावस्या की रात्रि तो सर्वभक्षी रात्रि है, जब चन्द्रमा घटते-घटते निष्कल (कलाहीन) हो जाता है। फिर भी अमावस्या चन्द्रमा की इस षोडशी कला का भक्षण नहीं कर पाती। यही सोलहवीं कला "अमृता" है, जो अमावस्या के हृदय में 'सिनीवाली' की संज्ञा से शाश्वत किन्तु अव्यक्त रूप में विद्यमान रहती है। 'सिनीवाली' वैदिक शब्द है और अथर्ववेद में इसके कई मन्त्र विद्यमान हैं। 'सिनीवाली' अर्थात "अमृता" कला, प्रकाश की शाश्वत कला है जिसका कभी क्षय नहीं होता और वह कला राधा है।
ब्रह्म अतिक्रामी भर ही नहीं होता! वह अतिक्राम्य भी होता है। ब्राह्मी स्थिति सबके भीतर से हो कर सबके परे भी जाती है। और इस ब्राह्मी स्थिति से परे जो स्थिति होती है उसी का नाम है “राधा”। कृष्ण के श्यामल रूप से पूर्व उनका जो प्रभा-मण्डल दिखता है, वह है “राधा”। कृष्ण के श्याम वर्ण ललाट पर जो गोरोचन का तिलक दिखता है वह है “राधा”। कृष्ण के प्राणों की जो पुकार है, वह है “राधा”| “राधा” मानव मन की वह आदिम वृत्ति है जो सम्पूर्ण सत्ता को स्वयं की ही भाँति व्याकुल पाता है। राधा “पत्नी” नहीं, “माँ” नहीं, “बहन” नहीं, “सखी” भी नहीं! राधा मात्र “प्रिया” है। भारतीय वाङ्गमय में एकनिष्ठ पत्नी की आदर्श प्रतिमा हैं “सीता” और “रुक्मिणी”, सख्य की - पुरुष के साथ स्त्री के सख्य की आदर्श प्रतिमा है “द्रौपदी”, बहन के दुलार की आदर्श प्रतिमा है “सुभद्रा”, किन्तु “प्रिया” की एकमात्र आदर्श प्रतिमा है “राधा”! वह एक ऐसे सर्वस्वनाशी प्यार का विग्रह है जिसमें कोई कामना नहीं, जिसने प्राप्ति ठुकरा दी है, जिसके लिये मिलन छोटा हो गया है और यदि कुछ शेष है तो बस “प्यार”! राधा में विशुद्ध “प्रिया तत्व” है, अतः "आनंद तत्व" है, "आह्लाद तत्व" है! राधा “जगन्माता” नहीं, जगदीश्वर की “आह्लादिनी शक्ति” है जिससे उन्हें आह्लाद मिलता है। यह शक्ति जन्म तो लेती है, किन्तु जन्म देती नहीं! वह सनातन प्यार की अधिष्ठात्री है, जो लीला के नायक के इस प्यार से बाहर जाने का प्रत्येक मार्ग स्वयं बंद कर चुकी है। वह रस की अधिष्ठात्री है और रस के महाभाव रास की भी! वही रसेश्वरी भी है, रासेश्वरी भी वही है! वह कृष्ण के चरित्र का सबसे बड़ा सम्बल है। कृष्ण के सभी रूप चाहे वह “योगीश्वर कृष्ण” हों, “मदभंजक कृष्ण” हों या “दार्शनिक कृष्ण” हों, राधा के इसी प्रेम का प्रतिफल हैं। बिना किसी बड़े आलम्बन के, इतनी अविचल शक्ति, इतनी निर्मम कर्मसंपृक्तता और इतना निरुद्वेग भाव किसी एक व्यक्ति से सध ही नहीं सकता भले ही वह समष्टि के एकीकृत रूप कृष्ण ही क्यों न हों!
राधा को सृजित और स्थापित करने वाली कवि – विरादरी ने राधा के चरित्र को विरह के ऐसे प्रगाढ़ रङ्गों से गढ़ा है कि वे रङ्ग आज तक धूमिल नहीं हो सके, बल्कि दिन – प्रति दिन ये रङ्ग और गाढ़े ही होते गये और होते जायेंगे, यदि सृष्टि में एक भी व्यक्ति राधा-भाव को समझने में समर्थ है। यदि कृष्ण स्वयं भी आकर कहें कि – “चलो राधा! हम और तुम बहुत अलग रह लिए! अब मिल जाते हैं!” तो राधा मना कर देगी। क्यों? क्योंकि राधा सुख दे सकती है, भक्ति दे सकती है, मुक्ति दे सकती है, सब दे सकती है, पर वह अपना “राधात्व”, अपना “राधा – तत्व” कैसे दे दे? इसी “राधा-तत्व” के कारण ही तो राधा का अस्तित्व है! “राधा-तत्व” अर्थात् चिरंतन विरह! दुरात्म एकांत! आपादमस्तक प्रगाढ़ प्रेम से भरपूर, किन्तु विरह-दग्ध!
यह राधा–तत्व, यह राधा – भाव ही मूल है क्योंकि राधा के लिये मिलन तो एक स्वप्न है! यह मिलना तो मिलना नहीं स्वयं से भी बिछुड़ना हुआ! रात भर कृष्ण अकेले विरह भोगते रहे, रात भर राधा अकेले विरह भोगती रही। आँखें जल रही हैं, लाल हो गयी हैं जागते हुये, अङ्ग टूट रहे हैं, फिर भी कृष्ण मना रहे हैं। - मान जा राधा!
पर राधा क्यों माने? उसे मिलन से क्या प्रयोजन? उसे विरह अभीप्सित है। वह व्यंग करती है – “रात भर दूसरी के साथ रहे न? तो जाओ उसी के पास! देख रही हूँ मैं, तुम्हारी आँखें लाल हैं। उसका ही प्यार तो तुम्हारी इन लाल – लाल आँखों में स्पष्ट दिख रहा है न? बिना साज-बाज के यदि यह रङ्ग है तो अवश्य वह रंगरेजिन है बहुत चतुर, जिसने इन्हें यह रङ्ग दिया! धन्य है वह रङ्गीली रंगरेजिन! कितना गहरा रङ्ग दिया! पर ये कहो लाला, कि उसे रंगाई क्या दी तुमने? -
“श्री व्रजराज अबै दुचितो भयो,
मो तनु दीठ करौ सुखदाई।
न लाल गुलालहुँ की अरुणायी,
न कंज गुलाबहुँ की सरसाई।।
एतेहु पे इतनो गहिरो रङ्ग?
धनि है रंगरेजिन की चतुराई।
साँची कहो - इन नैनन रंग की,
दीन्हो कहा तुम लाल रंगाई?"
पास हो कर भी पास नहीं रहेगी राधा! वह लड़ पड़ेगी। बहाना कर के लड़ पड़ेगी, क्योंकि,
मिलन उसे चाहिये ही नहीं!
राग का भी हमारे मनीषियों ने रङ्ग निर्धारित किया है। क्यों? क्योंकि इस सृष्टि में कुछ भी असम्पृक्त नहीं, भाव हो, राग हो, रङ्ग हो, सब एक दूसरे से गुँथे हैं। राग के दो रङ्ग है – “नील” रङ्ग, जो कृष्ण का जीवन – परिधान है, अतः उनकी काया का रङ्ग ! यह रङ्ग कृष्ण को बाह्यतः रञ्जित करता है किन्तु उनकी आत्मा को रञ्जित करने वाला रङ्ग है “रक्ताभ”! और इस रक्ताभ की भी दो श्रेणियाँ हैं – “रक्ताभ पीत” और “पीताभ रक्त”! रक्ताभ पीत रंग है “कुसुम्भी” रंग। इस रङ्ग की व्यञ्जना है कृष्ण का अपनी विवाहिता पत्नियों से प्रेम। किन्तु “पीताभ रक्त” रङ्ग होता है “मंजिष्ठ” रंग, टह – टह गुलनार - और यह रङ्ग है कृष्ण के साथ राधा का प्रेम!
स्वयं परात्पर ब्रह्म को जो आह्लाद प्रदान कर सके, रिझा और खिझा सके, ऐसे राधा का रूप कौन वर्णित करे? वह तो समस्त अवगुणों को सद्गुण बना कर धारण करने वाली है। कृष्ण अवगुणों से अत्यंत घबराते हैं। उनका वश चले तो अवगुणों का विनाश ही कर दें। किया ही! और कृष्ण ही नहीं, अवगुणों से तो सभी कतराते हैं। भले ही स्वयं अवगुणों की खान हों, पर दूसरे के अवगुण सहन नहीं किसी को भी! पर अवगुण कहाँ जायेंगे? विधाता ने ही तो उन्हें भी सिरजा है? तो वे राधा के पास रह जाते हैं। और राधा उन्हें सद्गुण बना कर अपनाती है। अन्धकार, भोलापन, कुटिलता, कठिनता, राग, चपलता, क्षीणता, मंदता ये सब शाश्त्रोक्त अवगुण हैं न? किन्तु यही अवगुण जब राधा के पास आते हैं तो सद्गुण बन जाते हैं---
अन्धकार बालों में,
भोलापन गालों में,
भौंह में कुटिलता ने
खुद को समा लिया।
कठिनता ने स्तनों में,
अधरों पर राग ने,
चपलता ने नेत्रों में
आसन जमा लिया।।
क्षीणता ने कटि प्रदेश
को चुना सहर्ष और,
मन्दता ने चरणों में
जा स्थान पा लिया।
हुए सभी सद्गुण
जो विश्व में तिरस्कृत थे,
अवगुणों को धन्य
“राधिका” जी ने बचा लिया।।
(स्वरचित)
कृष्ण ने गोकुल त्याग दिया, और राधा ने गोकुल को अपना लिया। कृष्ण ने राधा का प्रेम त्याग दिया, राधा ने उस त्याग को भी सर्वात्मना अपना लिया। कृष्ण ने वंशी त्याग दी, राधा जीवन भर उसे हृदय से लगा कर बैठी रही। कृष्ण ने कदम्ब की छाँह छोड़ी और करील के कुञ्ज त्याग दिये, राधा कृष्ण के वियोग में उन्ही छाँहों और कुञ्जों में कृष्ण से छूट कर भी कृष्ण से एकीकृत होती रही, क्योंकि जिन्हें कृष्ण त्याग देते हैं, उन्हें राधा अपना लेती है।
किन्तु कृष्ण कर सकते हैं राधा के रूप का वर्णन। जयदेव ने कृष्ण द्वारा ही राधा का रूप-वर्णन कराया--
बंधूकद्युतिबांधवो अयं अधरः
स्निग्धो मधूकच्छ्विर्
गंडश्चंडि चकास्ति नीलनलिन
श्रीमोचनं लोचनं।
नासाभ्येति तिलप्रसूनपदवीं
कुन्दाभ दन्ति प्रिये,
प्रायस्त्वन्मुखसेवया
विजयते विश्वं स पुष्पायुधः।।
(गीतगोविन्द, दशम सर्ग, श्लोक १३)
अर्थ इसका? लीजिये -
ऐसे दमकते हैं तेरे ये अधर युगल,
जैसे दुपहरिया के फूल लाल-लाल हैं।
आँखें तुम्हारी हरें आभा नील-कमलों की,
महुए की सरस स्वर्ण-कान्ति जैसे गाल हैं।।
नाक यह तुम्हारी सोहे, जैसे कोई तिल का फूल,
दन्त-पङ्क्ति जैसे कुण्द - कली पङ्क्तिमाल हैं।
तेरे इस मुखड़े की सेवा में मानो,
जगविजयी पुष्पधन्वा ने भेजे पुष्प-डाल हैं।।
(उपरोक्त श्लोक का स्वयं कृत काव्यानुवाद)
]
अब इस इक्कीसवीं सदी में बेचारा “दुपहरिया का फूल” भी अपना गौरव खो कर “कुछ नहीं मिला तो......” की श्रेणी में आ गया है। कभी “बन्धूकपुष्पसङ्काशम्” से सूर्य के रंग की उपमा देने में समर्थ, “बंधूकद्युतिबांधवो अयं अधरः’ से राधा के अधरों की उपमा देने में समर्थ, “दुपहरिया के फूल” को इस सदी का साहित्यकार तनिक हेय दृष्टि से देखने लगा है, किन्तु यह “दुपहरिया का फूल” होता बड़ा सु-रङ्ग है| एकदम राधा के प्यार सा – “टह-टह गुलनार, पीताभ रक्तिम वर्णी”! संस्कृत में इसे बंधूक – पुष्प कहते हैं। खिलता है भरी दोपहरी में अतः नाम मिल गया “दुपहरिया का फूल”! उपमेय और उपमान दोनों की महत्ता जान कर ही प्राचीन काव्य सम्राटों ने इसे चुना होगा। वास्तव में असली मंजिष्ठ रङ्ग तो बस इस फूल का ही होता है, बाकी तो काम-चलाऊ, थोड़े आस-पास वाले ही हैं।
कृष्ण का जन्म होता है भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को, जब समस्त जगत अन्धकार में डूबा है, मेघ बरस रहे हैं, और शुभ को जन्म दे सकने वाले शृंखलाबद्ध हैं, बंदी हैं। परन्तु कृष्ण का जन्म एकाकी नहीं होता, उसी दिन, तिथि, वार, लग्न और नक्षत्र में कहीं “योगमाया” भी जन्म लेती है। कृष्ण का जन्म होता है विश्व की समस्त कालिमा, जड़िमा, अशुभ और बंधन के बीच अपनी ही माया के साथ! किन्तु कृष्ण की प्रकृति राधा का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी को होता है, जब हर ओर धवलता है।
कृष्ण स्वयं श्रीमद्भागवत में कहते हैं –“प्रकृतिम् स्वामधिष्ठाय सम्भावाम्यात्ममायया” –“मैं प्रकृति और माया के आश्रय से ही अधीष्ठित और प्रकट होता हूँ”- प्रकृति से अधीष्ठित तथा माया से प्रकट! माया के साथ ही प्रकट हुये कृष्ण, किन्तु उनकी प्रकृति अर्थात राधा तो पहले ही उपस्थित थी वृषभानु और कीर्ति देवी की दुहिता बन कर, और वह भी एकाकी! क्योंकि राधा को किसी की आवश्यकता ही नहीं। उसे आवश्यकता है मात्र अपने ही समग्र की पहचान के लिए अपने ही आत्म-रूप कृष्ण की! वह कृष्ण के प्रति इतनी पगी है कि कभी वियुक्त नहीं, किन्तु वियोग-भय से इतनी डरी है कि संयुक्त होने का भान ही नहीं। यह न प्राप्ति है, न अप्राप्ति है, यह तो एक साथ दोनों है। राधा कभी कृष्ण से विलग नहीं! आँखों में उसी का रस अश्रु बन कर उमड़ रहा है, ध्यान में वही बस रहा है, नाभि से उसी का नाम – स्वर उठ रहा है। दर्पण भी देखती है तो वही दिखता है। तो वियोग कहाँ है? भाव और रस विलग ही कहाँ हो सकते हैं? भाव जब उफन पड़ें तो वही तो रस है? और कृष्ण को इसी रस की तो तरस है?
कृष्ण को सबसे अधिक तरस है “दधि” की! शांत – निर्धूम उर-ज्वलन के ताप पर तपाये गो-रस अर्थात् इन्द्रियों के विकारों में धैर्य के जामन से जमाये “दधि” की! “गो” इन्द्रियों को भी कहते हैं, और इसी अर्थ में कृष्ण गो-पाल है, तो इन्द्रियों का हर रस, हर भाव, हर अनुभाव, हर राग, हर विकार, जब विरह के निर्धूम अग्नि पर तपे और धैर्य के साथ संयुक्त होकर रूपान्तरित हो कर स्नेहयुक्त दधि बन जाये तब तो वह कृष्ण की तरस का हेतु बने? अन्यथा तो कैसे संभव है? मटकी तो अवश्य हमारी यही मृत्तिकामयी देह है, किन्तु यह मात्र मटकी है! सूरदास ने राधा से कहलवाया है –‘मेरे दधि को हरि स्वाद न पायो”। हरि यहाँ कृष्ण की हरण वृत्ति को व्यक्त करता है। कृष्ण कर्षक है, सब छीन लेता है, किन्तु “राधा” की इस प्रकार जमायी हुई “दधि” का स्वाद छीनने से मिलेगा? जो लूटता हो वह इस दधि का वास्तविक स्वाद नहीं ले पायेगा! कृष्ण सबका सब कुछ छीन ले, किन्तु राधा की दधि वह छीनेगा, तो उसे स्वाद तो नहीं मिलेगा! इसका स्वाद तो मिलेगा निःशेष समर्पण से, परस्पर भूमिका के परिवर्तन से, पीताम्बर देकर चुनरी ओढ़ लेने से, वंशी और मोर-मुकुट देकर माथे पर बिंदी सजाने से, फिर और आगे जा कर “चित्त के परस्पर परिवर्तन” से! कृष्ण को भी इस महाभाव के सम्मुख समर्पित होकर ही आना है, तभी उनके रस की तरस पूजेगी! अन्यथा नहीं।
कृष्ण की शक्ति “राधा”, “राधिका” भी है, “आराधिका” भी है|। “कृष्णेन आराधयति इति राधा” – कृष्ण भी जिसकी आराधना करते हों वह राधा है। और “कृष्णं समाराधयति सदेति इति राधिका” – जो सदैव कृष्ण की अराधना करती है वह है राधा। तात्विक दृष्टि से तंत्र का “क्लीं” बीज जो कृष्ण में सर्वात्मना आच्छादित है उसमें “ई” राधा का ही स्वरूप है –
“क”कारो नायकः कृष्णः,
सच्चिदानंद विग्रहः।
“ई”कारः प्रकृतिः राधा
महाभाव स्वरूपिणी।।
“ल”श्चानंदात्मकः,
प्रेमसुखं परिकीर्तितं।
चुम्बनाश्लेषमाधुर्यं
बिन्दुनाद समीरितं।।
(क्लीं बीज में “क” सच्चिदानंद के विग्रह स्वरुप कृष्ण हैं, “ई” महाभाव स्वरूपिणी राधा हैं, “ल” प्रेम का आनंद स्वरूप सुख है, और बिन्दु? वह तो बस दोनों के परस्पर चुम्बन की मधुरता का नाद है।)
इस बीज मन्त्र में भी कृष्ण वाचक “क” आधा ही है, क्योंकि कृष्ण की पूर्णता राधा के बिना संभव ही नहीं! राधा की “र”कार यदि कृष्ण में न जुड़े तो वे मात्र कष्ण रह जाते हैं। उन्हें कृष्ण बनाती है राधा की “र” कार!
कौन कोख ‘कीरति” की कीर्ति को प्रकाश देता?
कौतुकी कन्हैया दुलहिनि किसे कहते ?
वृन्दावन बाटन में, यमुना के घाटन में,
किसकी दधि लूट-लूट प्रेम चाह चहते?
दुहिता वृषभानु की उस राधा स्वामिनी के बिना,
किससे घनश्याम रस-राग-रंग लहते ?
आदि में न होती यदि ‘राधा’ की “र” कार तो,
फिर व्रज के वे राधेकृष्ण आधे कृष्ण रहते।।
कृष्ण रूप में कोई गंध नहीं, किन्तु यह कृष्ण की श्यामता जब राधा का शृंगार बन जाती है तो मृगमदरस बन जाती है। अकेले कृष्ण एक विशाल उज्जवल अन्धकार हैं, किन्तु जब वे राधा के सानिध्य में होते हैं तब वे घनश्याम होते हैं। सोने का रङ्ग ही कसौटी को चढ़ सकता है, कसौटी का रङ्ग कभी सोने पर नहीं चढता। अतः राधा ही कृष्ण को रङ्ग सकती है क्योंकि राधा भावनाओं का तप्त सुवर्ण है और कृष्ण हैं कर्म की कसौटी।
कृष्ण अपना महाभाव द्वारिका के महलों में क्यों नहीं पा गये? उन्हें महाभाव का साक्षात् कराने वाली राधा है, क्योंकि राधा नित्य वसंत है, नित्य नूतन होने की आकाङ्क्षा है, नित्य विरह का ताप है, नित्य मरण है, और इसी लिए वह महाकाली के पुरुषावतार श्रीकृष्ण की लीला का अधिष्ठान है।
तनिक सोचिये!
कृष्ण के साथ राधा केंद्र में है, शेष गोपियाँ इनकी परिधि बन कर हैं, और महारास चल रहा है। प्रिय के साथ उसी की गति से नाचना है, उसे ही निहारना है, उसे ही रिझा कर रीझना है, उसी के लिये रीझ कर उसे रिझाना है, और यह सब उस महारास के केन्द्र पर है। परिधि पर नृत्य तीव्र है या मंथर? भान नहीं! कोई और सत्ता है? ज्ञात नहीं। कोई और देश या काल है, या हो सकता है? भान नहीं। कोई और क्षण भी हो सकता है? पता नहीं! बस वे हैं, मैं हूँ, इससे भी आगे जाकर वह मैं हूँ, और मैं वो हैं, अलग-अलग "मैं" बने हम हैं, और एक हुये हम तो हैं ही - यह भाव ही राधा का महारास है। वही महारास, जो सृष्टि में निरंतर चल रहा है।
अविरल माधव – माधव रटते - रटते राधा स्वयं को माधव ही मान बैठी। बेचैनी और बढ़ गयी। जब मैं ही कृष्ण हो गयी तो अब राधा कहाँ गयी? नहीं ! मैं राधा ही हूँ! तो फिर माधव कहाँ गये?
यह वह स्थिति है जब एक ही चित्त चिर कर दो हो गया है। वही राधा है, वही माधव! पर राधा है तो माधव नहीं, माधव है तो राधा नहीं! बीच में यह प्राण है जो एक कीट की भाँति फँसा व्याकुल हुआ जा रहा है। वही प्राण, जो इस विजड़ित काष्ठीभूत चित्त का संयोजक है, नगण्य है, फिर भी इस जलन का साक्षी है। चित्त भले अनभिज्ञ है, प्राण तो सचेत है? दोनों सिरों से जलती अग्नि के बीच फँसा यह व्याकुल प्राण–कीट ही राधा है – “दुहुं दिसि दारु दहन जस दगधहु, आकुल कीट परान”। अतः यदि प्रेम करना है, तो राधा बनना होगा! भक्ति और शृंगार के पार जाना होगा! क्योंकि बिना राधा हुये प्रेम, प्रेम नहीं!
"धारा" का "सागर" से मिलन धारा की प्रवृत्ति भी है और नियति भी इसी लिए इसमें कुछ असहज नहीं, कुछ अप्रत्याशित नहीं, अतः विशिष्ट भी नहीं। परन्तु सागर की एक लहर यदि सागर से विच्छुरित होकर कहीं अलग जा रहे, और सागर को उस लहर से मिलने की प्यास जगे तो "धा....रा" उलट जाती है और तब वह यह प्यास "रा.....धा" बन जाती है। राधा स्वयं एक आत्मपिपासा भर नहीं है, वह कृष्ण की अमित - अमिट प्यास भी है - "सागर" की, एक निज से विच्छुरित लहर के लिये प्यास! कृष्ण के जीवन में आयी प्रत्येक नारी - रुक्मिणी हो, सत्यभामा हो, जामवंती हो, लक्ष्मणा हो, कोई हो, वह "धारा" थी, किन्तु अपनी वेदना को प्रिय की ओर से निज की ओर मोड़ लेने वाली, भानुसुता यमुना की रेती पर कृष्ण का नाम लिख-लिख मिटाते हुये और मिटा-मिटा कर लिखते हुये अपना जीवन बिता देने वाली सागर हेतु चिर-प्रतीक्षित वृषभानुसुता, धारा नहीं थी, वह "राधा" थी। नीचे की ओर जो प्रवाहित हो वह धारा, किन्तु जो नीचे से उन्नयन की यात्रा पर चल पड़े वह राधा!
यह “राधा” शब्द भी बहुत गूढ़ है। अद्भुत व्पञ्जना है इस शब्द में! संस्कृत भाषा इतनी वैज्ञानिक और समृद्ध है कि बस आप समझें तो समझें! “रा” का अर्थ है “प्राप्त हो!” और “धा” का अर्थ है “मुक्ति”| अर्थात् “राधा” का अर्थ है “मुक्ति के लिये छटपटाता जीव”। अपने समस्त बन्धनों से, तृषा से, अवदमन से मुक्ति के लिये एक छटपटाहट का नाम है –“राधा”|
यहाँ यह भी स्मरण रखना आवश्यक है कि यह सब वर्णन अपर्याप्त है। शब्दों के सामर्थ्य की भी एक सीमा है। जब "भाव" को समग्र व्यक्त करने में ही शब्द - सामर्थ्य असफल सिद्ध होता है, तो "राधा" जो "महाभाव" है, उसे अभिव्यक्त करने में कैसे सफल होगा? "राधा" तो एक व्याकुल "आत्मानुसंधान" है, जिसके हर सोपान पर यह असमर्थता है कि अब और नहीं चढ़ सकते, और यह हठ भी कि नीचे नहीं उतरना। हर सोपान पर प्राणों का सङ्कट भी है और जीवन की चुनौती भी! अब शब्दों की लाचारी है, और मात्र मेरी नहीं, न्यूनाधिक जयदेव से लेकर उस हर कवि की लाचारी है, जिसने "राधा" को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया। कारण यह है कि जो शब्द प्रयुक्त हुये, हो रहे हैं, या होंगे, उनमें से कुछ प्रीत-व्यापार के लिये हैं, कुछ इन्द्रिय व्यापार के लिये और कुछ जगत–व्यवहार के लिये! और लाचारी यही कि हमें काम इन्ही से लेना है! और जो लिखा, पढ़ा, बोला या सुना गया वह शब्द "राधा" मात्र एक शब्द है, किन्तु वह शब्द क्या अभिव्यक्त करता या कर सकता है यह उस पर भी निर्भर करता है जो इसे पढता या सुनता और फिर समझता है। भक्ति और शृंगार से पार जाना तो दूर, पूर्णतः भक्ति या शृंगार में ही डूब सकना जिन्हें नहीं आया उन्हें राधा को समझना क्या? और समझाना क्यों? "राधा" इस कहने-सुनने से परे है।
अंततः हुआ वही, जयदेव को जिसका भय था। शृंगार को विलास समझने वालों के आक्षेप भी लगे, और कोरी भक्ति करने वाले उद्विग्न भी हुये। भक्तों को लगा कि उनका कृष्ण इस विलास में कैसे रम सकता है? कारण वही- शृंगार को विलास समझने की भूल! तो भक्तों ने तर्क उपस्थित किया कि कृष्ण तो बालक थे, वे शृंगार या विलास क्या जानें? बस इसी से बात कुछ और बिगड़ गयी। "नेति" कहते ही "इति" स्वयं सिद्ध होने लगता है। "ऐसा नहीं है" में छुपा है कि "कुछ तो है!" अतः पुनः प्रश्न उठता है -"फिर कैसा है?"। और इस प्रकार राधा के महाभाव और राधा-तत्व को समझने तथा आत्मसात करने के स्थान पर एक नया वितंडावाद खड़ा हो गया और राधा "केवल भक्ति" या फिर 'केवल शृंगार" के माध्यम से अभिव्यक्त होने लगी! और यही वह चूक है जो महाभाव उपलब्ध नहीं होने देगी! यह तो वैष्णव मान्यता ही है कि यह सारा सृष्टि-प्रपंच विष्णु की ही काम-क्रीड़ा है, और यह काम-लोलुप देवता सृष्टि के अंग-अंग में "विष" की भांति व्याप्त है इसी लिये उसका नाम विष्णु है। शर-शय्या पर लेटे भीष्म ने कृष्ण की प्रार्थना करते हुये कहा -
"यतः सर्वे प्रसूयन्ते, ह्यनंगात्मांगदेहिनः|
उन्मादाः सर्वभूतानां
तस्मै कामात्मने नमः||"
[जिस काम की प्रेरणा से सभी देहधारी जन्म पाते हैं और जो कामोन्माद के रूप में सभी को उन्मत्त करता है, उस कामरूपी तुम्हे नमस्कार है|]
तो कामरूपी उस विष्णु के पाने का एक मार्ग शृंगार भी तो है ही? किन्तु यह सब मुझ जैसों के लिये नहीं है। जिस कवि – बिरादरी ने राधा को ये रङ्ग दिये मैं भी उसी कवि - बिरादरी का लोटा ढोने की लालसा लिये उनके पीछे भटकता रहा पर अवसर कभी न मिल सका। मिल भी जाय, तो पता नहीं वह भारी लोटा मुझसे उठेगा भी या नहीं। जयदेव से लेकर सूर और रसखान तथा और न जाने कितनो ने जिसे मांजा – चमकाया, वह इतना हलका नहीं है जिसे मुझ जैसे ढो सकें! होंगे कृष्ण शान्तं शुद्धं अद्वैतं! मैं तो राधा को कृष्ण के विरह में अनंत काल से तप रही एक विरहिणी नारी मात्र मान कर ही उसके महाभाव का कुछ अनुमान कर सकता हूँ।
राधा ने मात्र भक्तों, भाविकों, कवियों, साहित्यकारों, चित्रकारों एवं मूर्तिकारों को ही आकृष्ट नहीं किया अपितु ब्रह्मान्वेषी वैदिकों तथा आत्मान्वेषी शुष्क तांत्रिकों को भी उतना ही आकर्षित किया। राधा नाम से झरते पीयूष-निर्झर में स्नात किसी कवि ने ऋग्वेद के खिल भाग में राधोपनिषद् नाम से चार प्रपाठक जोड़ दिये। यद्यपि तन्त्र के क्षेत्र में राधा का प्रवेश अत्यन्त विलम्ब से लगभग सत्रहवीं शदाब्दी में सम्भवतः बङ्गदेश में हुआ किन्तु राधा की जो गढ़न और गठन है उसने तन्त्र के क्षेत्र में प्रविष्ट हो कर भी अपनी रसमयता का त्याग नहीं किया अतः तन्त्र मार्ग द्वारा पूजित हो कर भी राधा अन्य शाक्त देवियों जैसी गूढ़ एवं रहस्यमय नहीं रही और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि रसेश्वरी रासेश्वरी को रहस्यावेष्ठित करने के प्रयास में उसका रसोद्रेक और तरल हो गया।
वैदिकों एवं तान्त्रिकों ने राधा को अपने अनुरूप कलेवर तो प्रदान किया किन्तु राधा के ये दोनों स्वरूप पता नहीं राधा को ही नहीं भाये अथवा जनता को ही राधा का जो मनभावन द्विचित्तीय स्वरूप भा गया गया था उसकी तुलना में राधा के वैदिक एवं तान्त्रिक स्वरूप उसे उतना आकृष्ट न कर सके। राधोपनिषद् कहता रह गया –
‘तस्याद्या प्रकृती राधिका नित्या निर्गुणा सर्वालङ्कारशोभिता प्रसन्नाशेषलावण्यसुन्दरी।
अस्मदादीनां जन्म तदधीनं अस्यांशाद्बहवो विष्णुरुद्रादयो भवन्ति।
एवंभूतस्यागाधमहिम्नः सुखसिन्धोरुत्पन्नमिति मानसपूजया ध्यानेन कीर्तनेन स्तुत्या मानसेन सर्वेण नित्यस्थलं प्राप्नोति।
नान्येनेति। नान्येनेति। नान्येनेति ।
इति वेदवचनं भवति । इति वेदवचनं भवति । इति वेदवचनं भवति।’
तथा तान्त्रिक भी राधा सम्बन्धित मन्त्र का उद्धार करते रह गये –
शींकार वह्नि संयुक्तं अनंतम् तदंतरम्।
नाद बिन्दु कलायुक्तं राधिकायै ततः परम्।।
हृदयानतम् महामंत्रम् अष्टाक्षर परम् विदुः।
अस्य स्मरण मात्रेण किम् न सिध्यति साधनम्।।
तथा च
ॐ ह्रीं ऐं पद्मिन्यै राधिकायै ह्रीं ॐ ऐं।
किन्तु लोक ने जिस रस-पगी राधा को जाना था उसकी तुलना में यह सब उसे निश्चित ही नीरस लगा होगा। कारण जो भी रहा हो किन्तु राधा के वैदिक एवं तान्त्रिक स्वरूप सामान्य जनों हेतु अनजाने से ही रहे और लोक-मानस ने राधा को जिस भाव-विह्वलता के साथ अपनाया था उसी भाव-विह्वलता में रमे रहने में ही अपनी भुक्ति एवं मुक्ति खोजता रहा। रसखान ने तो यहाँ तक कह दिया कि ‘उस ब्रह्म को मैंने वेदों और पुराणों में बहुत खोजा, गीत-संगीत में खोजा, एक बार नहीं, चार बार खोजा, किन्तु मुझे वह नहीं मिला। दूर-दूर तक खोज आया किन्तु उसका स्वरूप कैसा है, स्वभाव कैसा है, कुछ ज्ञात न हो सका। बहुतों से पूछा, किन्तु किसी ने नहीं बताया।
ब्रह्म मैं ढूँढ्यो पुरानन, गायन,
वेद ऋचा सुनि चौगुने चायन।।
देख्यो दुरो कतहूँ न चितौ,
वह कैसो स्वरूप औ कैसो सुभायन।।
हेरत-हेरत हारे पर्.यो
रसखान बतायो न लोग लुगायन।
देख्यो दुर्.यो वह कुञ्जकुटीर में,
बैठि पलोटत राधिका पायन।।
और जब मिला, तो? तो मैंने देखा कि वह परात्पर ब्रह्म एक कुञ्जकुटीर में बैठा राधिका के चरण दबा रहा है।
अब जो भाविक ब्रह्म को इतने रस-पूर्ण परिस्थिति में देखने का अभ्यासी हो वह वेदों एवं तन्त्र का मार्ग गहे भी तो क्यों?
प्रश्न तो है!
प्रश्न है कि राधा का राधा-तत्व अपने स्थान पर, किन्तु कृष्ण ने राधा को आत्मिक रूप से अपना करके भी, सामाजिक रूप से क्यों नहीं अपनाया? भक्तों के तर्क पर्याप्त सबल नहीं! भक्त के पास सबल तर्क होते भी नहीं! भक्त जो तर्क देते हैं, वे भावुकता वाले हैं। सच तो यह है कि जब “कृष्ण” गोकुल छोड़ कर मथुरा गये, वे पूर्ण युवक थे। कंस के मल्लों और स्वयं कंस जैसे दुर्दांत को खेल – खेल में मार देने वाला कृष्ण बालक तो नहीं हो सकता! और मथुरा जाने से पूर्व उन्होंने वह सब किया, जो एक संपन्न युवक, एक सुन्दर युवक, एक शक्तिशाली युवक, भविष्य की दुश्चिंताओं से मुक्त युवक, व्रज के रस-पूर्ण परिवेश में करता, या कर पाता! कृष्ण की मेधा पर और उसकी शक्ति पर तो अविश्वास नहीं ही किया जा सकता, और कूटनीति तो जैसे स्वयं उनके रूप में अवतरित हुई थी तो जब आज का एक टुच्चा राजनीतिज्ञ भी यह जानता है कि विगत प्रेम-संबंधों का अनावरण उसके राजनीतिक जीवन के लिये विष-तुल्य है, तो कृष्ण यदि “फिरे न बहुरि” तो यह निश्चित ही उनकी कूटनीति थी और पूर्णतः सफल कूटनीति थी। अन्यथा मथुरा से गोकुल है कितना दूर? और कभी नहीं तो किसी ऐसी रात्रि में ही सही जब चैत्रक्षपा अपनी सम्पूर्ण विभा से यमुना के क्षीण कलेवर को रजत – शलाका बना रही हो, एक नाव लेते, और उस पार जा कर मिल आते! कितने तो कुशल तैराक थे! कालिय मर्दन के समय सबने देख – जान लिया था। तो तैर कर ही चले जाते! रास शरत पूर्णिमा में ही क्यों? एक बार चैत्र पूर्णिमा को ही सही! चैत्र पूर्णिमा भी कम उज्जवल नहीं होती। कितने भी व्यस्त रहे हों, एक रात का समय तो जुटा ही सकते थे! किन्तु नहीं! कृष्ण जाना चाहते तो न? उन्हें जाना ही नहीं था!
कृष्ण के पास "राधा' के रूप में वह संबल था, जिसके बल पर वह सब कुछ छोड़ सके। जन्म लेते ही अपने माता-पिता को छोड़ा, फिर यशोदा और नन्द को भी छोड़ा, गोकुल छोड़ा, यमुना का पुलिन छोड़ा, कदम्ब की छाँह छोडी, करील के कुञ्ज छोड़ा, वंशी छोडी, राधा को छोड़ा, मथुरा का सिंहासन छोड़ा, मथुरा भी छोडी, द्वारिका बसाया किन्तु उसका भी सिंहासन छोड़ा, जीवन भर द्वारिका भी छोड़े ही रहे, जिन पांडवों के लिये महाभारत रच डाला उन पांडवों को भी छोड़ दिया, जिन यादवों के लिये द्वारिका बसायी उन यादवों को छोड़ दिया, सब कुछ छोड़ते रहे, छोड़ते गये! कर्म के अतिरिक्त उनकी संपृक्तता यदि रही तो मात्र मोर-मुकुट और पीताम्बर से। यद्यपि यह मोर मुकुट था वृन्दावन का इन्द्रधनुषी परिवेश जो माथे पर सजा रहा, और पीताम्बर था राधा का पीत-गौर गात्र, जो उनके अङ्ग से लिपटा रहा और उन्हें स्मरण दिलाता रहा वृन्दावन का भी और राधा का भी, किन्तु कृष्ण लौटे नहीं! उसी राधा के स्नेह-संबल के व्याज का आलम्ब लेकर कृष्ण ने उसी राधा को भी छोड़ दिया! नहीं सोचा - कि उस पर क्या बीतेगी? उसकी निर्दोष भावना का क्या होगा? उसके चिरंतन विरह के सम्बन्ध में कृष्ण को ज्ञान भी था, परवाह भी थी! फिर भी कृष्ण लौटे नहीं! क्यों ?
क्योंकि एक बार "राधा" से कृष्ण का बिछड़ना एक संयोग था, जो घटित होना था, हो गया। किन्तु दुबारा राधा से मिल कर और पुनः उससे बिछड़ कर संसार में लौटना कृष्ण के लिए असंभव था। यदि एक बार भी कृष्ण पुनः राधा से मिल लेते तो उनकी सारी कूटनीति धरी रह जाती, सारी असम्पृक्तता लुप्त हो जाती, सारा ज्ञान खो जाता, अतः मन में सर्वोच्च स्थान देकर भी जीवन में "राधा" को स्थान दे सकना कृष्ण के लिये भी संभव न था। और इसी लिए भारतीय जनमानस ने कृष्ण शब्द कहने से पूर्व राधा कहना श्रेयस्कर समझा, और कृष्ण के मन-मंदिर में प्रतिष्ठित राधा को हर कृष्ण-मंदिर में प्रतिष्ठा दी।
सदा कृष्ण के साथ रमने वाली "राधा" अनंत काल से, अनंत काल तक के लिये भावनात्मक रूप से विरह-दग्ध है। उसके मनुहार और उसके उपालम्भ, सदा से रहे हैं, सदा तक रहेंगे। कृष्ण को न उसके मनुहार से कोई अंतर पड़ना है, न उसके उपालंभ से! और कृष्ण को अंतर न पड़ने से राधा को भी कोई अंतर नहीं पड़ना है! अंतर यदि किसी को पड़ना है तो उसे - जो "राधा-भाव" से अपरिचित है, अतः "राधा" से भी अपरिचित है! "राधा" को इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ना है कि कोई राधा से, राधात्व से, राधा तत्त्व से अपरिचित है। राधा तो “माधव ही अब हो गयी, रटते माधव नाम!”
मनुष्य के हाथों ने जिसे छुआ, वही सोना हो गया! मनुष्य का हाथ एक पारस पत्थर है। इसने अपने स्पंदन, अपने स्नेह, अपनी ममता, अपनी वेदना, अपने अश्रु, अपने हुलास, सबको छू कर उसे सोना बना दिया है - एक दम ठोस सुनहला चमकदार सोना! और अपने ही स्पर्श से सृजित सुनहरे वैभव के बीच आज का मनुष्य काठ हो चुका है। उसका लोभ उसे खाने दौड़ रहा है परन्तु उसे बचाने वाला कोई नहीं। जो बचाने आयेगा, मनुष्य को छूते ही स्वयं सोना बन जाएगा - निर्जीव चमकता सुनहला सोना! ऐसे समय में मनुष्य के बचने का एक मात्र उपाय है “राधा”! जब गहरे-घने काले बादल घिर आये हों - जैसे आज हमारी संस्कृति पर घिर आये हैं, तमाल के पुष्पहीन सघन - पत्र वृक्ष जब अन्धकार को और बढ़ा दें - जैसा आज के परिवेश में यत्र-तत्र-सर्वत्र उगे तमाल बढ़ा रहे हैं, राह पहचानना कठिन हो- जैसा कि हो रहा है, तो अंतःकरण के नंद का निर्देश मानते हुए "राधा" का आश्रय ले कर ही आगे बढ़ा जा सकता है, क्यों कि राधा का परिधान नील-श्याम है, राधा का अंतर श्याम से भरा है, वह बाह्य और आतंरिक रूप से समस्त श्यामता को सोखने वाली है अतः यह कलौंस, यह कालिमा वही सोख सकती है जिससे हमें मार्ग मिल सके!
हमारी शिक्षा-पद्धति ने भी बचपन से ही मन में कुछ कुसंस्कार बो दिए हैं, जिनमें एक है आदर्शवाद के आवरण में पलती सोंठ की भांति सूखी और ऐंठी हुयी बुद्धिजीविता, और दूसरी छूंछी पश्चिमी नैतिकता। किन्तु यदि हम नैतिकता के नाम पर प्रचारित अनैतिकता तथा सोंठियायी बुद्धिजीविता से अलग रह कर के देख सकें तो हमें अनुभव होगा कि व्यक्ति-व्यक्ति में एक राधा है, और “चंचलः मनः हि कृष्णः” के कारण कभी न कभी सबको “कान्ह बिना सगरो जग सूना” का भान सा होता ही है। उस समय राधा का विरह अपना लगने लगता है और कृष्ण के प्रति कुछ उपालंभ और कुछ प्रश्न उगने लगते हैं, किन्तु यह राधा – भाव प्रश्नों की मूकता और उत्तरों की व्यर्थता भी भली – भाँति जानता है।
आप उस राधा से मिलना चाहेंगे? तो राधा-भाव खोजिये।
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प्रेम की अधिष्ठात्री, महाभाव–स्वरूपिणी, रसेश्वरी राधा को उनके प्राकट्य दिवस पर समर्पित.....
राधाष्टमी की शुभकामनायें..................
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© त्रिलोचन नाथ तिवारी.
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