कुंड एवं मण्डप विधि

*कुण्ड और मण्डप बिधि*

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यज्ञ का मण्डप एवं कुण्ड बहुत ही सुन्दर तथा सुव्यवस्थित बने हुए 
तथा कलापूर्ण सुन्दरता के साथ सजे हुए होने चाहिए ।
कलापूर्ण वस्तुएँ, सुरुचिकर, आकर्षक एवं शोभनीय प्रतीत होती हैं,
उनमें चित्त लगता है । कार्यकर्त्ताओं तथा दर्शकों का मन लगता है, 
चित्त प्रसन्न होता है तथा उत्साह बढ़ता है ।
इसलिए ज्यों-ज्यों, 
उल्टे-तिरछे कुण्ड-मण्डप बना लेने का निषेध किया गया है और इस बात पर जोर दिया गया है, 
कि कला-व्यवस्था, नाप-तौल, सौन्दर्य, शोभा आदि का ध्यान रखकर ही इनका निर्माण किया जाय ।

यज्ञ का मण्डप किस प्रकार बनाया जाय तथा कुण्ड किस प्रकार तैयार किये जायँ, 
इस सम्बन्ध में अनेक स्वतन्त्र प्राचीन पुस्तकें उपलब्ध हैं ।

(१) विट्ठल दीक्षित कृत-कुण्डार्क (२) शङ्कर भट्ठ कृत-कुण्डार्क (३) नारायण भट्ठ कृत- कुण्डदर्पण 
(४) अनन्त देवज्ञ कृत-"कुण्ड मर्त्तण्ड (५) विश्वनाथ कृत कुण्ड कौमुदी (६) लक्ष्मीधर भट्ठ कृत कुण्ड कारिक 
(७) कुण्ड शुल्व कारिका (८) महादेव गुरुकृत-कुण्ड प्रदीप (९) रामचन्द्रचार्य कृत-कुण्डोदधि 
(१०) द्विवेदी विश्वनाथ कृत-कुण्ड रत्नाकर (११) श्रीधर कृत- कुण्डार्णव (१२) गङ्गाधर कृत-कुण्डांकुश 
(१३) नीलकंठ कृत-कुण्डोद्योत (१४) नारद कृत- कुण्ड नारद पंच गात्रम (१५) बलभद्र कृत- कुण्ड कल्पद्रुम 
(१६) शुल्क माधवा कृत-कुण्ड कल्पद्रम (१७) कुण्ड रचना (१८) परशुराम कृत-परशुराम पद्धत्युक्त कुण्ड मण्डप 
(१९) राम वाजपेयी कृत-कुण्ड राम वाजपेयी" (२०) विष्णु भट्ठ कृत-कुण्ड मरीचित माला" 
(२१) नारायण सुतानन्द भट्ठ कृत-कुण्ड मण्डप दर्पण (२२) नैमिष वासी रामचन्द्र कृत-कुण्ड श्लोक प्रकाशिका 
(२३) आपदेव कृत-खेट पीठ माला (२४) नवकुण्डी विधान (२५) सप्तष नृहरि दैवज्ञ कृत-कुण्ड मण्डप प्रकाशिका 
(२६) कुण्डशुदि (२७) सूक्ष्म गणिततानीत कुण्ड मण्डप परिमाण, विचार (२८) रामचन्द्र दीक्षित कृत-कुण्ड रत्नावली 
(२९) परशुराम भट्ठ कृत-पद्मकुण्ड कोष (३०) रामकृष्ण दीक्षित कृत- कुण्ड मण्डप पद्धति 
(३१) कुण्ड लक्षणम्ा् (३२) शिवरामोपाध्याय कृत-कुण्डार्क दीधिति (३३) कृष्ण दीक्षित कृत-मण्डार्क पद्मिनी 
(३४) दामोर सूरि कृत-कुण्डार्क नौका (३५) कुण्डार्क मिताक्षरा (३६) श्रीधर शास्त्री कृत कुण्डार्क सुप्रभा 
(३७) करंजकर दीक्षित कृत कुण्डर्कोदय (३८) मयूरेश्वरोपाध्याय कृत-वेदी पद्धति 
(३९) घुण्डी राज कृत-सामान्य निर्णय कर्म निर्णय आदि अनेक पुस्तकों में
 अनेक प्रकार के कुण्ड तथा मण्डप बनाने के विधान, 
आकार तथा नियम लिखे हुए हैं ।
मण्डपों के निर्माण में द्वार, खम्भे, 
तोरण द्वार, ध्वजा, शिखर, छादन, रङ्गीन वस्त्र आदि वर्णन हैं । 
इनके वस्तु भेद, रङ्ग भेद, नाप दिशा आदि के विधान बताए गए हैं । 
मण्डपों के नाम भी अलग- अलग-प्रयोग विशेष के आधार पर लिखे गये हैं । 
कुण्डों में चतुरस्र कुण्ड, योनि कुण्ड, अर्ध चन्द्र कुण्ड, अष्टास्त्र कुण्ड, सप्तास्त्र कुण्ड, 
पञ्चास्त्र कुण्ड, आदि अनेक प्रकार के कुण्डों के खोदने के अनेक विधान हैं । 
कुण्डों के साथ में योनियाँ लगाने का वर्णन है । योनियों के भेद-उपभेद एवं अन्तरों का विवेचन है । 
इन सबका उपयोग बहुत बड़े यज्ञों में ही सम्भव है । 
इसी प्रकार अनेक देव-देवियाँ यज्ञ मण्डप के मध्य तथा दिशाओं में स्थापित की जाती हैं ।

साधारण यज्ञों को सरल एवं सर्वोपयोगी बनाने के लिए मोटे आधार पर ही काम करना होगा । 
मण्डप की अपने साधन और सुविधाओं की दृष्टि से पूरी-पूरी सजावट करनी चाहिये और उसके बनाने में कलाप्रियता, 
कारीगरी एवं सुरुचि का परिचय देना चाहिए । रंगीन वस्त्रों, रंगीन कागजों, 
केले के पेड़ों आम्र पल्लवों, पुष्पों, खम्भों, द्वारों, चित्रों, ध्वजाओं, 
आदर्श वाक्यों, फल आदि के लटकनों से उसे भली प्रकार सजाना चाहिए । 
वेदी का कुण्ड जो कुछ भी बनाया जाय, टेका-तिरछा न हो । उसकी लम्बाई-चौड़ाई तथा गोलाई सधी हुई हो । 
कुण्ड या वेदी को रंगविरंगे चौक पूर कर सुन्दर बनाना चाहिये ।
पिसी हुई मेंहदी से हरा रंग, 
पिसी हल्दी से पीला रंग,आटे से सफेद रंग, गुलाल या रोली से लाल रंग की रेखाएँ खींचकर, 
चौक को सुन्दर बनाया जा सकता है । सर्वतोभद्र, देव-स्थापना की चौकियाँ या वेदियाँ, कलश, 
जल घट, आसन आदि को बनाने या रखने में भी सौन्दर्य एवं शोभा का विशेष ध्यान रखना चाहिए ।
जिस प्रकार देव मन्दिरों में भगवान की प्रतिमा नाना प्रकार के वस्त्रों, आभूषणों, एवं श्रंङ्गारों से सजाई जाती है, 
उसी प्रकार यज्ञ भगवान की शोभा के लिए भी पूरी तत्परता दिखाई जानी चाहिये । 
कुण्ड और मण्डप-निर्माण के विधि-विधानों में जहाँ विज्ञान का समावेश है, 
वहाँ शोभा, सजावट, कला एवं सुरुचि प्रदर्शन भी एक महत्वपूर्ण कारण है ।

कुण्ड और मण्डपों के सम्बन्ध में इस प्रकार के उल्लेख ग्रन्थों में मिलते हैः-

बड़े यज्ञों में ३२ हाथ (४८ फुट) ३६ फुट अर्थात १६ = २४ फुट का चौकोर मण्डप बनाना चाहिये । 
मध्यम कोटि के यज्ञों में १४ (१८ फुट) हाथ अथवा १२ हाथ (१८ फुट) का पर्प्याप्त है । 
छोटे यज्ञों में १० हाथ (१५ फुट ) या ८ (१२ फुट) हाथ की लम्बाई चौडाई का पर्याप्त है । 
मण्डप की चबूतरी जमीन से एक हाथ या आधा हाथ ऊँची रहनी चाहिए । 
बड़े मण्डपों की मजबूती के लिए १६ खंभे लगाने चाहिये । 
खम्भों को रङ्गीन वस्त्रों से लपेटा जाना चाहिए । 
मण्डप के लिये प्रतीक वृक्षों की लकड़ी तथा बाँस का प्रयोग करना चाहिए ।

मण्डप के एक हाथ बाहर चारों दिशाओं में ४ तोरण द्वार होते हैं, 
यह ७ हाथ (१० फुट ६ इंच) उँचे और ३.५ चौड़े होने चाहिए । 
इन तोरण द्वारों में से पूर्व द्वार पर शङ्क, दक्षिण वाले पर चक्र, पच्छिम में गदा और उत्तर में पद्म बनाने चाहिए । 
इन द्वारों में पूर्व में पीपल, पच्छिम में गूलर-उत्तर में पाकर, दक्षिण में बरगद की लकड़ी लगाना चाहिए, 
यदि चारों न मिलें तो इनमें से किसी भी प्रकार की चारों दिशाओं में लगाई जा सकती है । 
पूर्व के तोरण में लाल वस्त्र, दक्षिण के तोरण में काला वस्त्र, पच्छिम के तोरण में सफेद वस्त्र, 
उत्तर के तोरण में पीला वस्त्र लगाना चाहिए ।
सभी दिशाओं में तिकोनी ध्वजाएँ लगानी चाहिये । 
पूर्व में पीली, अग्निकोण में लाल, दक्षिण में काली, नैऋत्य में नीली, पच्छिम में सफेद, 
वायव्य में धूमिल, उत्तर में हरी, ईशान में सफेद लगानी चाहिये । 
दो ध्वजाएँ ब्रह्मा और अनन्त की विशेष होती है, ब्रह्मा की लाल ध्वजा ईशान में 
और अनन्त की पीली ध्वजा नैऋत कोण में लगानी चाहिए । 
इन ध्वजाओं में सुविधानुसार वाहन और आयुध भी चित्रित किये जाते हैं । 
ध्वजा की ही तरह पताकाएं भी लगाई जाती है इन पताकाओं की दिशा और रङ्ग भी ध्वजाओं के समान ही हैं । 
पताकाएं चौकोर होती हैं । एक सबसे बड़ा महाध्वज सबसे उँचा होता है ।

मण्डप के भीतर चार दिशाओं में चार वेदी बनती हैं । ईशान में ग्रह वेदी, 
अग्निकोण में योगिनी वेदी, नैऋत्य में वस्तु वेदी और वायव्य में क्षेत्रपाल वेदी, 
प्रधान वेदी पूर्व दिशा में होनी चाहिए ।
एक कुण्डी यज्ञ में मण्डप के बीच में ही कुण्ड होता है । 
उसमें चौकोर या कमल जैसा पद्म कुण्ड बनाया जाता हैं । 
कामना विशेष से अन्य प्रकार के कुण्ड भी बनते हैं । 
पंच कुण्डी यज्ञ में आचार्य कुण्ड बीच में, चतुरस्र पूर्व में, 
अर्थचन्द्र दक्षिण में, वृत पच्छिम में और पद्म उत्तर में होता है । 
नव कुण्डी यज्ञ में आचार्य कुण्ड मध्य में चतुररसा्र कुण्ड पूर्व में, योनि कुण्ड अग्नि कोण में, 
अर्धचन्द्र दक्षिण में, त्रिकोण नैऋत्य में वृत पच्छिम में, षडस्र वायव्य में, पद्म उत्तर में, 
अष्ट कोण ईशान में होता है ।
प्रत्येक कुण्ड में ३ मेखलाएं होती हैं । ऊपर की मेखला ४ अंगुल, 
बीच की ३ अंगुल, नीचे की २ अँगुल होनी चाहिए ।
ऊपर की मेखला पर सफेद रङ्ग मध्य की पर लाल रङ्ग और नीचे की पर काला रङ्ग करना चाहिए । 
५० से कम आहुतियों का हवन करना हो तो कुण्ड बनाने की आवश्यकता नहीं । 
भूमि पर मेखलाएं उठाकर स्थाण्डिल बना लेना चाहिए । 
५० से ९९ तक आहुतियों के लिए २१ अंगुल का कुण्ड होना चाहिए । 
१०० से ९९९ तक के लिए २२.५अँगुल का, एक हजार आहुतियों के लिए २ हाथ=(१.५)फुट का, 
तथा एक लाख आहुतियों के लिए ४ हाथ (६ फुट)का कुण्ड बनाने का प्रमाण है ।

यज्ञ-मण्डप में पच्छिम द्वार से साष्टाङ्ग नमस्कार करने के उपरान्त प्रवेश करना चाहिए । 
हवन के पदार्थ चरु आदि पूर्व द्वार से ले जाने चाहिए । 
दान की सामग्री दक्षिण द्वार से और पूजा प्रतिष्ठा की सामग्री उत्तर द्वार से ले जानी चाहिए ।

कुण्ड के पिछले भाग में योनियों बनाई जाती है । 
इनके सम्बन्ध में कतिपय विद्वानों का मत है कि वह वामार्गी प्रयोग है । 
योनि को स्त्री की मूत्रेन्दि्रय का आकार और उसके उपरिभाग में अवस्थित 
किये जाने वाले गोलकों को पुरुष अण्ड का चिह्न बना कर वे इसे अश्लील एवं अवैदिक भी बताते हैं । 
अनेक याज्ञिक कुण्डों में योनि-निर्माण के विरुद्ध भी हैं और योनि-रहित कुण्ड ही प्रयोग करते हैं । 
योनि निर्माण की पद्धति वेदोक्त है या अवैदिक, इस प्रश्न पर गम्भीर विवेचना अपेक्षणीय है ।

लम्बाई, चौड़ाई, सब दृष्टि से चौकोर कुण्ड बनाने का कुण्ड सम्बन्धी ग्रन्थों में प्रमाण है । 
अनेक स्थानों पर ऐसे कुण्ड बनाये जाते हैं, जो लम्बे चौड़े और गहरे तो समान लम्बाई के होते हैं, 
पर वे तिरछे चलते हैं और नीचे पेंदे में जाकर ऊपर की अपेक्षा चौथाई-चौड़ाई में रह जाते हैं । 
इसके बीच में भी दो मेखलाएं लगा दी जाती हैं । इस प्रकार बने हुए कुण्ड अग्नि प्रज्ज्वलित करने 
तथा शोभा एवं सुविधा की दृष्ठि से अधिक उपयुक्त हैं । आर्य समाजों में ऐसे ही हवन-कुण्ड बनाये जाते हैं । 
इनके किनारे-किनारे एक पतली नाली भी होती है 
जिसमें चींटी आदि कीड़े-मकोड़ों का अग्नि तक न पहुँचने देने की रोक रहती है । 
कुण्ड के आस-पास जल-सिंचन इसी उद्देश्य के लिए ही किया जाता है ।
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यज्ञों के विविध विधान-कुण्ड विज्ञान*
सूक्ष्म प्रकृति में हलचलें उत्पन्न कर, 
भौतिक जगत को प्रभावित करने में यज्ञ प्रक्रिया पूरी तरह समर्थ है। 
इस सामर्थ्य का विज्ञान काफी गहरा और विस्तृत है। प्रयोजन क्या है? 
इस हेतु चेतना जगत में किस तरह की तरंगें पैदा करनी है, 
इसी के अनुरूप यज्ञ के प्रकार हवनकुण्ड का स्वरूप, 
कर्मकाण्ड का निर्धारण तय करना पड़ता है। यही कारण है 
कि यज्ञवेत्ता महर्षियों ने अपने गहन शोध प्रयासों के बाद इस सम्बन्ध में अनेकानेक प्रयोग 
पव्तियों-तरह-तरह के कर्मकाण्ड विधानों का अन्वेषण किया।
इसकी व्यापकता का स्पष्ट बोध कराने के लिए 
महाग्रन्थों के कलेवर भी बौनापन अनुभव करने लगेंगे। 
लेख की पंक्तियाँ तो सिर्फ झलक दर्शाने की कोशिश भर कर सकती हैं। 
यज्ञवेत्ताओं के अनुसार-विवाहोपरान्त विधिपूर्वक अग्नि स्थापना का निर्देश है। 
इसे स्मार्ताग्नि कहते हैं। जिसमें साँय, प्रातः, नित्य हवनादि सम्पन्न किए जाते हैं।

(2) गार्हपत्य, आह्वानीय और दक्षिणाग्नि के विधिपूर्वक स्थापन को ‘श्रौताधान’ कहते हैं। 
इन अग्नियों में किए जाने वाले यज्ञों का नाम श्रौतकर्म है।

(3) दर्ष पूर्ण मास याग- अमावस्या और पूर्णिमा का होने वाले यज्ञ को क्रमशः दर्ष और पौर्णमास यज्ञ कहते हैं।

(5) प्रतिवर्ष वर्षाऋतु में अथवा उत्तरायण और दक्षिणायन में संक्रान्ति के दिन एक बार जो यज्ञ किया जाता है, 
उसे “निरुढ़पषु-बन्ध” कहते हैं।

(6) आग्रयण यज्ञ- प्रति वर्ष वसन्त और शरदऋतु में नवीन यव और चावल से जो यज्ञ किया जाता है, 
उसे आग्रयण या नवान्न यज्ञ कहते हैं।
(7) सौत्रामणि यज्ञ:− इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ
किया जाता है, 
उसे सौत्रामणि यज्ञ कहते हैं। यह
दो प्रकार का होता है-स्वतन्त्र और अंगभूत।

(8) सोमयाग- सोम लता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है, उसे सोमयाग कहते हैं। 
इसके सोलह ऋत्विक् होते हैं। दक्षिणा लेकर यज्ञ करने वाले ऋत्विक् कहलाते हैं। 
सोमयाग के सोलह ऋत्विकों के भी चार प्रकार हैं’
1-अध्वर्युगण 2-ब्रह्मगण 3-होतृगण 4-उद्गातगण सोमयाग के सात भेद हैं-

(1) अग्निष्टोम :- अग्निष्टोम साम में जिस यज्ञ की समाप्ति हो और उसके बाद अन्य साम न पढ़ा जाय, 
उसे अग्निष्टोम कहते हैं। इसी प्रकार (2) उक्थ्य साम (3) षोडशी साम (4) बाजपेय साम 
(5) अतिरात्र साम और (6) असोर्याम नामक साम पढ कर जिन यज्ञों की समाप्ति होती है, 
वे यज्ञक्रम से उक्थ्य आदि नामों से पुकारे जाते हैं। अग्निष्टोम साम के अननतर षोडशी साम जिस यज्ञ में पढ़ा जाता है, 
वह अत्यग्निष्टोम कहा जाता है।
(9) क्षदशाह यज्ञ :- यह सत्र और ‘अहीन’ भेद से दो प्रकार का होता है। 
जिनमें सोलहों ऋत्विक्, आहिताग्नि ब्राह्मण और बिना दक्षिणा वाले हों, उसे सत्र कहते हैं। 
दो सुत्या से ग्यारह सुत्याः (प्रातः सायं, मध्याह्न तीनों समय हवन को एक सुत्या कहते है) 
जिस यज्ञ में हों और आदि अन्त में ‘अतिरात्र’ नामक यज्ञ हो तथा अनेक यजमानकर्ता हों ऐसे सोमयाग को ‘अहीन’ कहते हैं।

(10) गवानयन यज्ञ- यह सत्र 385 दिनों का होता है। इसमें 12 दीक्षा, 12 उपसद तथा 361 सुत्या होती हैं।

(11) वाजपेय यज्ञ- इस यज्ञ के आदि और अन्त में अग्निष्टोम यज्ञ होता है। इसमें सत्रह-सत्रह हाथ के यूप होते हैं। 
यह चालीस दिन में सम्पन्न होता है।
(12) राजसूय यज्ञ- इसमें अनुमति आदि बहुत सी इष्टि 
और पवित्र आदि बहुत से यज्ञ होते हैं। यह यज्ञ 33 महीने में पूरा होता है। 
साँस्कृतिक दिग्विजय करने में समर्थ सार्वभौम लोकनायक ही इसे सम्पन्न करते है।

(13) चयन याग-जिस यज्ञ में ईंटों के द्वारा वेदी निर्माण हो, उसे चयनयाग कहते हैं। 
यह वेदी 10 हाथ लम्बी और चौड़ी होती है, जिसे आत्मा कहते है। 
इसके दक्षिण और उत्तर की ओर छ:−छः हाथ का चबूतरा बनता है जिसको दक्षिण पक्ष और उत्तर पक्ष कहते हैं। 
पश्चिम की ओर बने साढ़े पाँच चबूतरे को पुच्छ कहते हैं। इसकी ऊँचाई पाँच हाथ की होती है। 
अतः इसको पंचचितिक स्थण्डिल कहते हैं। इसे बनाने में चौदह तरह की ईंटें लगती हैं। 
चयन याग के चबूतरे में समस्त इष्टिकाएँ 11170 होती हैं।

(14) पुरुष मेध यज्ञ- इस यज्ञ में पुरुष आदि यूप में बाँधकर छोड़ दिए जाते हैं। 
इसमें 11 यूप होते हैं और चालीस दिन में समाप्त होता है। 
यज्ञ करने के बाद वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया जा सकता है।

(15) सर्वमेध यज्ञ:− इस यज्ञ में सभी प्रकार की वनस्पतियों और अन्नों का हवन होता है। 
यह यज्ञ 34 दिन में समाप्त होता है।
(16) पितृमेध यज्ञ- इस यज्ञ में मृत्पित्रादि का अस्थिदाह होता है। 
इसमें ऋत्विक् केवल अध्यर्यु होता है।
(17) यकाह यज्ञ- एक दिन साध्य यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते हैं। 
जिन यज्ञों में एक सुत्या होता है, ऐसे सोमयाग, विश्वजित, सर्वजित, भूष्टोमं आदि सौ से अधिक यज्ञ तत्तत्सूत्रों में विहित हैं।

(18) अहीन यज्ञ- दो सुत्या से लेकर ग्यारह सुत्या तक को ‘अहीन’ यज्ञ कहते हैं। 
ये भी विभिन्न नामों से शताधिक सूत्रों में विदित हैं।

(19) अश्वमेध यज्ञ- साँस्कृतिक-दिग्विजय करने वाले लोकनायक इस यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं।
 इसे यज्ञों का राजा कहा गया है। इसके दृश्य और अदृश्य जगत में अनेकों चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं। 
इस यज्ञ में दिग्विजय के लिए घोड़ा छोड़ा जाता है। इसमें 21 हाथ के 21 यूप होते हैं।

(20) बारह से सोलह तक अठारह से तैंतीस, पैंतीस से चालीस, उनचास, एक षत, 
तीन सौ आठ और 1000 सुत्या वाले जो अनेकों सोमयाग हैं उन्हें सत्र कहते हैं।

यज्ञों के स्वरूप और प्रकार भेद के अनुरूप कुण्ड के आकार-प्रकार की विशिष्टता का चुनाव करना पड़ता है। 
जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है, वे अनुभव कर सकते हैं कि हवन कुण्ड अन्तरिक्ष में संव्याप्त बृहत्सोम के अवतरण का आधार है। 
इसमें देवशक्तियों की अनुग्रह वर्षा उतर कर यज्ञ धूम के साथ-समूचे विश्व में फैल जाती है। 
उसका निर्माण भी आहुतियों के आधार पर प्रयोजनकर्ता के उद्देश्य पर निर्भर है।
कुण्डसिद्धि’-कार के अनुसार पचास से सौ आहुति देनी हो तो कुहनी से कनिष्ठिका के मान का एक हजार आहुति में हाथ भर का, 
दस हजार आहुति के लिए दो हाथ का, एक लाख आहुति हेतु चार हाथ का तथा दस लाख 
और एक करोड़ आहुति के लिए क्रमशः छः हाथ और सोलह हाथ का हवनकुण्ड बनाना चाहिए। 
भविष्योत्तर पुराण शारदातिलक, स्कन्द पुराण में भी कुछ इसी तरह के कथन देखने को मिलते हैं।

इनकी कुछ और विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए कुण्डसिद्धि कार का मत है-

वेदाक्षीणि युगाग्नयः शशियुगान्यष्टाव्यय स्त्रीषवोऽष्टाक्षा याहृतरसा स्वाराँगकमिता नेर्त्रषयोऽक्षस्वराः।

अं्गुल्योऽथ यवाः खमभ्रमिषवः खं पंचषट् सागराः, समाभ्रंगु नयस्तवभोनिगदितावेदास्र के बाहवाः।

अर्थात्-एक हाथ के कुण्ड का आयास विस्तार 24 अंगुल का, दो हाथ का हो तो 34 अंगुल का, 
तीन हाथ का हो तो 41 अंगुल और 5 हाव का, चार हाथ का हो तो 48 अंगुल और 5 यव, 
व 6 हाथ का कुण्ड हो तो 49 अंगुल 7 यव, सात हाथ का कुण्ड हो तो 63 अंगुल और 4 यव, 
आठ हाथ का कुण्ड हो तो 66 अंगुल और 7 यव, नव हाथ का कुण्ड हो तो 72 अंगुल और 
दस हाथ का कुण्ड हो तो 76 अंगुल और 7 यव के प्रमाण से आयाम विस्तार होना चाहिए। 
इन्हें चतरस्र कुण्ड के भुज कहा गया है।
जिस प्रकार ताँत्रिक उपासनाओं में प्रयोग किए जाने वाले 
यंत्र-कागज अथवा धातु पत्र पर खिंची आड़ी तिरछी रेखाएँ भर नहीं है। इनकी देवशक्तियों की प्रतिकृति 
मानकर-तद्नुरूप शक्तियों का आकर्षित किया जाता है। उसी प्रकार कुण्ड निर्माण का आधार सौंदर्य को उत्कीर्ण करना भर नहीं हैं।
इनकी विभिन्न आकृतियों के उद्देश्य अनेकानेक शक्तिधाराओं का आकर्षण समझा जाना चाहिए। 
इसी कारण से शास्त्रकारों ने इन्हें शिल्पियों द्वारा ठीक-ठाक तैयार करवाने का निर्देश दिया है। 
आधुनिक प्रचलित क्रियाओं में चतुष्कोण, अर्धचंद्र, समअष्टास्र, पद्समषडस्र इनके चित्र साथ को पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं।

आयाम विस्तार की भाँति ही कुण्ड सिद्धि और शारदा तिलक में कुण्ड की गहराई का विवेचन प्राप्त होता है। 
इसके अनुरूप जितना कुण्ड का विस्तार और आयाम हो उतना गहरा प्रथम मेखला तक करना चाहिए। 
तथा गहराई चौबीसवें भाग में कुण्ड का निर्माण होना श्रेष्ठ है। 
“क्रियासार” और लक्षण संग्रह के अनुसार एक मेखला वाला कुण्ड अधम, 
दो मेखला वाला मध्यम और तीन मेखला वाला उत्तम होता है। 
कुछ विद्वानों के अनुसार पाँच मेखला वाला कुण्ड उत्तम है। इन मेखलाओं में सत्व, 
रजस और तमस् की भावना से तीनों रंग भरे जाते हैं। मेखलाएं पाँच हों वहाँ पंचतत्व की भावना से रंगने का विधान है। 
कुण्ड निर्माण का विषय ज्यामिति, भूमिति, क्षेत्रमिति और वास्तुशास्त्र से अधिक संबंध रखता है। 
इस संबंध में अधिक रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं को कुण्डसिद्धि, भविष्य पुराण, वायु, पुराण, 
अनुष्ठान प्रकाश, पंचरात्र क्रियासार समुच्चय शारदातिलक आदि ग्रंथों का अवलोकन-अध्ययन करना चाहिए।

कुण्डों की रचना में भिन्नता का उद्देश्य यह है कि काम्यकर्मों की प्रधानता के अनुसार उद्देश्यों की भिन्नता के अनुरूप, 
अलग-अलग आकार वाले भिन्न-भिन्न दशाओं में कुण्ड बनाने से फल सिद्धि शीघ्र होती है। 
बहवृच परिशिष्टादि ग्रंथों में कहा है-
भुक्तौ-मुक्तौ तथा पुष्टौ जीर्णोद्धारे विशेषतः। 
सदा होमे तथा शान्तौ वृतं वरुणादिग्मतम्।
अर्थात्-भुक्ति-मुक्ति पुष्टि, जीर्णोद्धार, 
नित्य हवन तथा शाँति के लिए पश्चिम दिशा में वृत्ताकार कुण्ड का निर्माण करना चाहिए। 
इसी प्रकार दिशा भेद का विशेष स्पष्टीकरण करते हुए अन्य ग्रंथकारों ने लिखा है-स्तम्भन के लिए पूर्व दिशा में चतुरस, 
भोग प्राप्ति के लिए अग्निकोण में योनि के आकार वाला, मारण के लिए दक्षिण दिशा में अर्धचंद्र, 
अथवा नैऋत्य कोण में त्रिकोण शाँति के लिए पश्चिम में वृत, उच्चाटन के लिए वायव्यकोण में षडस्र, 
पौष्टिक कर्म के लिए उत्तर में पद्याकृति और मुक्ति के लिए ईशान में अष्टास्र कुण्ड प्रयुक्त होते हैं। 
इनमें से कुछ विशिष्ट कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होते हैं-
पुत्र प्राप्ति के लिए योनिकुण्ड, भूत, 
प्रेत और ग्रहबाधा विनाश के लिए पंचास्र अथवा धनुर्ज्यावृत्ति, अभिचार दोष के लिए सप्तास्र का प्रयोग होता है।

नित्य नैमित्तिक हवन में यदि हवनकुण्ड के निर्माण की सामर्थ्य न हो-तो शारदा तिलक के अनुसार 
“नित्य नैमित्तिक होमं स्थण्डिलें वासभाचरेत” अर्थात् -चार अंगुल ऊँचा, एक हाथ लम्बा चौड़ा 
सुवर्णवर्ण पीली मिट्टी अथवा बालू रेती का स्थण्डिल बनाया जा सकता है
। शास्त्रकारों के अनुसार कुण्डमेव विधानस्यात स्थण्डिलेवा समाचरेत स्थण्डिल (वेदिका) 
का वही स्थान है जो कुण्ड का है। शास्त्रों में यज्ञ के द्वारा बताए गये परिणामों को जीवन में चरितार्थ करने के लिए जरूरी है-
यज्ञ विधान और उपकरणों की विशेषताएं और सूक्ष्मताएं भी समझी और व्यवहार में लायी जायँ।

इस दृष्टि से वर्तमान समय में सम्पन्न की जा रही अश्वमेध महायज्ञों की श्रृंखला को अभूतपूर्व कहा जा सकता है। 
इसे अंतरिक्ष और दृश्य जगत में नवयुग के अनुरूप वातावरण विनिर्मित करने वाले समर्थ प्रयोग के रूप में लिया जाना चाहिए। 
एक वैज्ञानिक प्रयोगकर्ता-जिस तरह अपने प्रयोग के सिद्धाँतों, विधानों, 
उपकरणों की बारीकियों को समझता और व्यवहार में लाता है। कुछ वैसा ही यह अश्वमेध प्रयोग है। 
इसमें प्रयोग किये जाने वाले कुण्ड, मण्डप, कर्मकाण्ड सभी शास्त्र पद्धति के अनुसार होंगे। 
इसके परिणाम जहाँ आश्वमेधिक फलितार्थ को साकार करेंगे। वहीं भूल–बिसर चुकी वैदिक प्रक्रियाओं-
परंपराओं का सशक्त शिक्षण भी संपन्न होगा। 
इतना ही क्यों-महायज्ञ में भाग लेने वाले होता गण
 इस तत्व की जीवंत अनुभूति कर सकेंगे कि वे वैदिक युग के महर्षिगणों में से एक हैं। 
अनुभूति की यह निधि उन्हें जीवन पर्यन्त ऋषित्व के उदय और विकास के लिए प्रेरित करती रहेगी।


*कुण्डों की रचना एवं भिन्नता का उद्देश्य*

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शास्त्रों में यंत्र-तंत्र आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःख की निवृत्ति के लिये अनेक उपाय बतलाये हैं। 
उनमें प्रधानतया यज्ञ का निर्देश अधिक प्राप्त होता है। ये यज्ञ कई प्रकार के होते हैं। 
जिनके विषय में अन्यत्र लिखा जा चुका है। 
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यज्ञ जो हवनात्मक होता है वह कैसे कहाँ किया जाय? 
तदर्थ शास्त्रों की आज्ञा है कि चतुर डडडडआदि कुण्डों में देवों की प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ करना चाहिये। 
अतएव यहाँ कुण्डों के बारे में सामान्य विवेचन किया जाता है।

“कुण्ड” शब्द पाणिनीय व्याकरण के अनुसार रक्षणार्थक कुडि अथवा मानार्थक कुण धातु से सिद्ध होता है।
तथा कोपकार कुण्ड शब्द का अर्थ व्युत्पत्ति और लक्षण से- रक्षा-स्थान, मान-नाप की वस्तु, 
अभिमुखकारी, दानादि—द्वारा पोषणकर्ता, हवन की अग्नि का निवास स्थान तथा जल का पात्र आदि करते हैं। 
इनमें से हमें ‘हवन की अग्नि का निवास-स्थान’ अर्थ यहाँ अभिप्रेत है। 
इस प्रकार कुण्ड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट हवि पहुँचाने की प्रक्रिया को विद्वज्जन यज्ञ करते हैं।

किसी भी कार्य के आरम्भ में वह सविधि सानन्द सम्पन्न हो, 
इस विचार से उसकी पूर्व भूमिका तैयार की जाती है। 
और तत्सम्बन्धी सम्पूर्ण सामग्री सुव्यवस्थित की जाती है। 
इसी प्रकार यज्ञ आरम्भ करने से पूर्व मण्डप-निर्माण होता है। 
वह कितना लम्बा-चौड़ा हो? इसका निर्णय भी विद्वानों ने ग्रन्थों द्वारा बतला दिया है। 
जैसे सभागृह में आगन्तुकों के अनुमान से लम्बाई-चौड़ाई का निर्णय होता है, 
वैसे ही यहाँ आहुति के आधार पर मण्डप की लघुता-दीर्घता का निर्णय होता है। 
कुण्ड भी मण्डप का अन्योन्याश्रय से अंग है ही। अतः उसका भी निर्माण आहुति के आधार पर अवलम्बित है। 
तदर्थ—“कुण्डसिद्धि” कार का कथन है कि—
शतर्धेडरत्निः स्याच्छतपरिमितेडरत्नि-विततं, 
सहस्रे हस्तं स्यादयुतहवने हस्तयुगलम्। चतुर्हस्तं लक्षे प्रयुतहवने पट्करमितं, ककुद्भिर्वा कोटौ नृपकरमपि प्राहुरपरे॥
“पचास अथवा सौ आहुति देनी हो तो कुहनी से कनिष्ठिका तक के माप का कुण्ड बनाने; 
एक हजार आहुति में एक हस्त प्रमाण का, दस हजार आहुति में दो हस्त प्रमाण का, 
एक लक्ष आहुति में चार हाथ का, दस लक्ष आहुति में छह हाथ का तथा कोटि आहुति में
8 हाथ का अथवा सोलह हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये।” 
भविष्योत्तर पुराण में पचास आहुति के लिये मुष्टिमात्र का भी निर्देश है। 
तथा इस विषय में “शारदातिलक, स्कन्दपुराण आदि का सामान्य मतभेद भी प्राप्त होता है। 
इसी तरह कुण्डसिद्धिकार ने कुछ विद्वानों के विचार को मान देते हुए यह लिखा है 
कि—
लक्षैकवृद्धया दशलक्षकान्तं, करैकवृद्धया दशहस्तकंच। 
कोट्यर्घदिग्विंशतिलक्षलक्ष—दले मुनीष्वर्तुकृशानुहस्तम्॥
“एक लक्ष से दस लक्ष आहुति तक क्रमशः एक हाथ से दस हाथ तक का कुण्ड बनाना चाहिये। 
अथवा पचास लाख, दस लाख, बीस लाख, एक लाख या पचास हजार आहुति में 
क्रमशः 7, 5, 6, 3, 
हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये।”

साथ ही विशेष स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि—

वेदाक्षीणि युगाग्नयः शशियुगान्यष्टाब्धयस्त्रीपवोऽष्टाक्षावह्निरसा रसांगकमिता नेर्त्रषयोऽक्षस्वराः।

अडगुल्पोऽथ यवाः खमभ्रमिपवः ख पञ्चषट्सागराः, सप्त भ्रंमुनयस्त्वमीः निगदिता वेदास्रके बाहवः॥
कुण्डसिद्धि
एक हस्त के कुण्ड का आयाम-विस्तार 24 अँगुल का, दो हस्त का हो तो 34 अँगुल का, 
तीन हस्त का हो तो 41 अँगुल और 5 यव का, चार हस्त का हो तो 48 अँगुल का, 
पाँच हाथ का कुण्ड हो, तो 56 अँगुल और 5 यव, छह हाथ का कुण्ड हो, 
तो 59 अँगुल और 6 यव, सात हाथ का कुण्ड हो, तो 63 अँगुल और 4 यव, 
आठ हाथ का कुण्ड हो, तो 66 अँगुल और 7 यव, नव हाथ का कुण्ड हो, 
तो 72 अँगुल तथा दस हाथ का कुण्ड हो, तो 76 अँगुल और 7 यव के प्रमाण से आयाम विस्तार होना चाहिये। 
ये चतुरस्र कुण्ड के भुज कहे हैं।
मण्डप के निर्माण में चारों ओर के स्तम्भ, उन के ऊपर छत तथा द्वार, 
तोरण और ध्वजा आदि के सम्बन्ध में भी शास्त्राज्ञा माननीय है। इसी प्रकार कुण्ड के निर्माण में अंगभूत खात, 
कंठ, मेखला तथा नाभि का प्रमाण भी आहुति एवं कुण्ड की आकृति के आधार से निश्चित किये जाते हैं। 
इस कार्य में न्यूनाधिक होने से राग शोक आदि विघ्न आते हैं। अतः केवल सुन्दरता पर ही दृष्टि न रख कर 
शिल्पी के साथ पूर्ण परिश्रम से शास्त्रानुसार कुण्ड तैयार करवाना चाहिये।

आधुनिक प्रचलित क्रियाओं में निम्नलिखित कुण्डों का उपयोग दृष्टिगोचर होता है:—

इन नौ कुण्डों की आकृतियाँ पीछे देखिये। 4
चतुष्कोण, अर्धचन्द्र, त्रिकोण, वृक्ष, 
विषमषडस्र, विषम आष्टास्र, पद्म, समषडस्र, सम अष्टास्र और योनिकुण्ड। 
इनके अतिरिक्त सप्तास्र, पञ्चास्र, धनुर्ज्याकृति, विषमभुज-मृदंगाकार, श्रिदेंल-पद्म, 
चतुर्दल पद्मकुण्ड के नाम भी प्राप्त होते हैं।
देखो ‘वाचस्पत्य-कोष’ कुण्ड शब्द के अर्थ वाला भाग।

नवग्रह की जो आकृतियाँ शास्त्रों में वर्णित हैं। नवग्रह की आकृतियाँ पीछे देखिये।
उनके अनुसार भी ‘नवग्रह-मख’ 
करते समय कुण्ड बनाये जा सकते हैं

तारा भक्ति सुधार्णव के टीका कराने उपर्युक्त चतुरस्रादि कुण्डों की स्थापना का क्रम इस प्रकार बतलाया है—

प्राक् प्रोक्ते मण्डपे विद्वान्, वेदिकाया बहिस्त्रधा।
क्षेत्रं विभज्य मध्याँशे, 
पूर्वादि परिकल्पयेत्॥ अष्टास्वाशासु कुण्डानि, रम्याकाराण्यनुक्रमात्। 
चतुरस्र योनिमर्धचन्द्रं त्र्यस्रं सुवर्तुलम्॥ षडसाँ पंकजाकारमष्टास्रं तानि नामतः। 
आचार्यकुण्डं मध्ये स्याद् गौरीपतिमहेन्द्रयोः॥
आहुति के मान से मण्डप- निर्णय होने के पश्चात
वेदिका के बाहर तीन प्रकार से क्षेत्र का विभाग करके मध्यभाग में पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना करे।
फिर आठों दिशाओं में—
आठ दिशाओं के नाम इस प्रकार हैं—पूर्व अग्नि, दक्षिण, निऋति, 
पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा ईशन क्रमशः चतुरस्र, योनि, अर्धचन्द्र, त्र्यस्र, वर्तुल, 
षडस्र, पंकज और अष्टास्रकुण्ड की स्थापना सुचारु रूप से करे। तथा मध्य में आचार्य कुण्ड वृत्ताकार अथवा चतुरस्र बनाये। 
यह नवकुंडी याग की प्रक्रिया से सम्बद्ध है।

पूर्वापरायतं सूत्रं, हस्तमानं प्रसार्य च। 
तम्याग्रयोर्मत्स्ययुग्मं, कुर्यात् स्पष्ट यथा भवेत्॥ 
द्विभागं कृत्य तत्सूत्रं पातयेद् दक्षिणोत्तरम।
तदग्रयोर्मत्स्युग्मंकुर्यात् स्पष्टं यथा भवेत्॥ 
चतुर्दिक्षु चतुसूत्रं, पातयेत् तत्प्रमाणतः चतुरस्रं चतुःकोष्ठ, भवेदति मनोहरग्॥ 
कोणसूत्रद्वयं दद्यात् प्रमाणं तेन लक्षयेत्। चतुरस्रं भवेत् कुन्डं, सर्व लक्षण लक्षितम्॥

गौतमीयतन्त्र में चतुरस्रकुन्ड निर्माण की विधि स्पष्ट करते हुए लिखा है 
कि—पहले एक सूत्र एक हाथ-24 अंगुल का लेकर पूर्व से पश्चिम की ओर फैलाकर दो निशान स्पष्ट बनाये। 
फिर उसी सूत्र के दो भाग करके दक्षिण और उत्तर की ओर फैलाये तथा उसका निशान बनाये। 
तदनन्तर चारों दिशाओं में सूत्र को नापते हुए प्रमाण युक्त निशान करे जिस से मनोहर चतुरस्र कुण्ड का निर्माण होगा। 
कोनों में सूत्र का नाप करके प्रमाण ज्ञान करले। जिससे न्यूनाधिक न हो। इस प्रकार सर्व लक्षण चतुरस्रकुण्ड होता है।

इसी तरह कुण्ड की गहराई के लिये शास्त्रकारों का आदेश है कि जितना कुण्ड का विस्तार 
और आयाम हो उतना गहरा प्रथम मेखला तक करना चाहिये। तथा गहराई चौबीसवें भाग में कुण्ड का निर्माण होना श्रेष्ठ है। 
मेखला के बारे में विद्वानों का अभिप्राय है कि एक मेखलावाला कुण्ड अधम, 
दो मेखलावाला मध्यम और तीन मेखला वाला उत्तम होता है। कुछ विद्वान् पाँच मेखला वाले को उत्तम मानते हैं।

सोमशम्भु नामक विद्वान् का मत है कि एक मेखलावाला कुण्ड वैश्य के लिये हितकर है दो वाला क्षत्रिय के लिये सुखद है 
और तीन मेखलावाला ब्राह्मणों के लिए लाभप्रद है।
इन मेखलाओं में सत्त्व, रजस् और तमस् की भावना से तीनों रंग भरे जाते हैं 
तथा पांच हो वहाँ पञ्चतत्त्व की भावना से रंग देने का सम्प्रदाय है। 
इनके निर्माण का गणित भी अविस्मरणीय है।

नाभि-कुण्ड के आकार से बारह अंश ऊपर तथा छः अंश के विस्तार वाली जैसा कुण्ड हो 
उसके अनुरूप कमल के आकार वाली बनानी चाहिये। 

योनि- के लिये त्रैलोक्यसार में लिखा है कि बारह अंगुल चौड़ी, 
विस्तार से तीन अंश छोटी, मध्यभाग में एक अंगुल ऊपर उठी हुई, कुण्ड में झुकी हुई, 
अश्वत्थ के पत्र की तरह छिद्र और नाल में युक्त, ऊपर कुछ संकोच वाली तथा 
मेखला के मध्य में पश्चिम की ओर अथवा दक्षिण में, एक अंगुष्ठ-प्रमाण की मेखला से युक्त, 
घृत धारण करने में समर्थ ऐसी योनि बनानी चाहिये। योनि कुण्ड में योनि नहीं बनायी जाती है। 
देखो—कुण्ड सिधि, शारदातिलक।
 देखो—क्रियासार, लक्षणसंग्रह।

पद्मकुण्ड में नाभि नहीं होती है।
 
दीर्घा सूर्यांगु योनिसत्र्यंशोना विस्तरेण तु। एकांगु लोच्छिता सातु, प्रविष्टाऽभ्यन्तरे तथा॥ 
कुम्भद्गयार्धसंयुक्ता, चाश्वत्थदलवन्मता। अंगुष्ठमेखला युक्ता, मध्ये त्वाज्यवृतिक्षमा॥

इत्यादि।

वैदिकों को कुंड में योनि गत्तोदि अभिमत है।

सर्वसाधारण कार्यों में प्रायः चतुरस्र अथवा वृत्तकुँड का निर्माण करके कार्य चलाने की पद्धति है।
क्योंकि ‘सर्वसिद्धिकर’ कुँड चतुरस्रमुदाहृतम्-चतुरस्र-कुँड सर्व सिद्धि करने वाला है। 
इसी प्रकार वृत्त कुँड भी शान्ति-पुष्टिकारक है।
कुँड निर्माण का विषय ज्यामिति, मूमिति, 
क्षेत्रमिति और वातुशास्त्र से अधिक सम्बन्ध रखता है।
अतः जिन्हें अधिक इससे रस हो, उन्हें कुँडसिद्धि, भविष्य पुराण, वायु पुराण, 
अनुष्ठान प्रकाश, पञ्चसार, क्रियासार समुच्चय, शारदातिलक आदि ग्रंथों का पूर्णतया अवलोकन करना चाहिये। 
एवं कर्मकाँड करते समय साम्प्रदायिक परिपाटी में क्रियाभेद न हो, 
तदर्थ गुरु के साथ यज्ञादि के समय उपस्थित रहकर प्रत्यक्ष-शिक्षण प्राप्त करना चाहिए। 
जिससे स्वपर का कल्याण हो, तथा शास्त्रों के प्रति नवीन मस्तिष्क के लोगों की अभिरुचि बढ़े।
कुण्डों की रचना में 
भिन्नता का उद्देश्य यह है कि काम्यकर्मों की प्रधानता के अनुसार पृथक्-पृथक् आकार वाले 
भिन्न-भिन्न दिशाओं में कुण्ड बनाने से फलसिद्धि शीघ्र होती है। 
तदर्थ बहवृच परिशिष्टादि ग्रन्थों की उक्ति है कि भुक्ति, मुक्ति, पुष्टि, जीर्णोद्धार, 
नित्य हवन तथा शान्ति के लिए पश्चिम दिशा में वृत्ताकार कुँड का निर्माण करना चाहिए। 
इसी प्रकार दिशाभेद का विशेष स्पष्टीकरण करते हुए अन्य ग्रन्थकारों ने लिखा है कि
स्तम्भन करने के लिये पूर्व दिशा में चतुरस्र, भोगप्राप्ति के लिए 
अग्निकोण में योनि के आकारवाला मारण के लिए दक्षिण दिशा में अर्धचन्द्र अथवा नैऋत्यकोण में त्रिकोण, 
शान्ति के लिए पश्चिम में वृत्त, उच्चाटन के लिए वायव्यकोण में षडस्र पौष्टिक कर्म के लिए 
उत्तर में पद्मकृति और मुक्ति के लिये ईशान में अष्टास्र कुँड हितावह है। 
इनमें कुछ विशिष्ट कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होते हैं। यथा
पुत्र प्राप्ति के लिए योनिकुँड, भूत प्रेत और ग्रहबाधा-विनाश के लिए पंचास्र अथवा धनुर्ज्यावृति, 
अभिचारदोष का शमन करने के लिए सप्तास्र इत्यादि।
सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर ऊपर कुँड 
और यन्त्र का साम्य भी कुछ झलकता है जैसे यंत्र देवता का शरीर भाग जाता है 
वैसे ही कुँड भी देवता का शरीर ही है ऐसा मान लें तो कोई आपत्ति नहीं।
प्रत्येक कर्म में यथाशक्ति यज्ञ करना ही चाहिये। 
पर उसमें कुँड ही बनाया जाय, यह आवश्यक नहीं। तदर्थ शास्त्रकारों की आज्ञा है कि
यदि कुँड करने का सामर्थ्य न हो, तो सामान्य हवनादि में विद्वान् चार अंगुल ऊँचा, 
अथवा एक अँगुल ऊँचा एक हाथ लम्बा चौड़ा सुवर्णाकार-पीली मिट्टी अथवा बालू रेती का सुन्दर स्थण्डिल बनाये।

नित्यं नैमित्तिकं होमं स्थण्डिले वासमाचरेत्”

शारदा तिलक मत से नित्य-नैमित्तिक हवन स्थन्डिल में करना चाहिये।

स्थण्डिल का स्थान
“कुण्डमेव विधंनस्यात् स्थण्डिले वा समाचरेत”

स्थानापन्न स्थंडिल का वही स्थान है, जो कुँड का है।

“तत्स्थानापन्नस्तद्धर्म लभते स्थान धर्माणाँ स्थानान्यति देशः।,’ 
कुँड स्थापन स्थंडिल भी कुँड स्थान में ही होता है; 
स्थानान्तर में नहीं।
इसके अतिरिक्त ताम्र के और पीतल के भी यथेच्छ कुँड बाजार मैं प्राप्त होते हैं। 
उनमें प्रायः ऊपर मुख चौड़ा होता है और नीचे क्रमशः 
छोटा
 भुक्तौ मुक्तौ तथा पुष्टौ, जीर्णोद्धारे विशेषतः
सदाँ हौमे तथा शान्तौ, वृत्तं वरुणादिग्गतम्॥

ऐन्द्रयाँ स्तम्भे चतुष्कोणमग्नौ भोगे भगाकृति।
 चन्द्रार्धं मारणे याम्ये, नैऋते हि त्रिकोणकम्॥

वारुण्याँ शान्तिके वृत्तं, षडस्त्युच्चाटनेऽनिले। 
उदीष्ठयाँ पौष्टिके पद्म, रौद्रयामष्टास्रमुक्तिदम्॥

देखो—वाचस्पत्यकोप कुँड शब्द।
 
अथवाऽपि मृदा सुवर्णभासा करमानं चसुरंग लोच्चमल्पे। हवनेविदधीत वांग लोच्चं: विबुध स्थण्डिलमेव वेदकोणम्॥ 
॥कुँड सिद्धि॥
होता है। वह भी शास्त्र की दृष्टि से ग्राह्य है। 
नित्य हवन-बलिवैश्व-देव आदि के लिए अनेक विद्वान इन्हें उपयोग में लेते हैं
इसका उलटा प्रकार जो मंडल के रूप में कहा जा सकता है। 
जिसमें नीचे से चौड़ा और ऊपर तक छोटा आकार वाला भी मृत्तिकादि से बनाते हैं। 
उसमें पाँच या सात मेखला रहती है।
यह सामान्य दिग्दर्शन है।

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