क्या बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार हैं ?



वैसे तो मैंने बुद्धावतार पर एक लघु लेख तीन वर्ष पूर्व २०१७ में ही लिखा था जिसपर कई मान्य विद्वानों की आपत्ति यह कह कर आई थी कि श्री पुरी शंकराचार्य जी आदि जब अजिन/अजनपुत्र महात्मा बुद्ध को अवतार मानते हैं तो आप उनके साथ साथ शुद्धोदनपुत्र क्षत्रिय गौतम बुद्ध को क्यों अवतार मानते हैं ? उस समय मेरे पास दो चार प्रमाण थे अपने मत पक्ष में, किन्तु विरोध इतना दृढ़ था कि मैं चुप रहा। तीन वर्षों के गहन शोध के बाद दुर्लभ सनातनी एवं बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन के अनंतर आज उसी विषय पर विस्तृत प्रमाणों के साथ पुनः लेखन कर रहा हूँ।

बुद्धावतार के विषय में कुछ धारणाएं निम्न हैं -

१) सनातनी मानते हैं कि बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार हैं।
२) बौद्ध मानते हैं कि बुद्ध स्वतन्त्र हैं, किसी के अवतार नहीं।
३) कुछ सनातनी मानते हैं कि गौतम ही एकमात्र बुद्ध हैं और उन्होंने ही बौद्ध धर्म चलाया।
४) कुछ अधिक अध्ययन करने वाले सनातनी मानते नहीं कि नहीं, गौतम से पूर्ववर्ती अजिनपुत्र बुद्ध भी थे और वही भगवान् विष्णु के अवतार हैं।
५) कुछ लोग मानते हैं कि गौतम बुद्ध, अजिनपुत्र महात्मा बुद्ध, ये सभी भगवान् विष्णु के ही अवतार हैं एवं बुद्ध अनेकों हुए हैं और आगे भी होंगे।

मैं शास्त्र प्रमाण और परम्परा के आधार पर यह मानता हूँ कि आस्तिक एवं नास्तिक दर्शन दोनों साथ साथ ही आये हैं। नास्तिक दर्शन के प्रसार हेतु समय समय पर बुद्धों का अवतार होता आया है एवं ब्राह्मण महात्मा बुद्ध तथा क्षत्रिय गौतम बुद्ध, दोनों ही भगवान् विष्णु के अवतार हैं। अब पुनः लोग कहेंगे कि आपके वचन का श्रीकरपात्री स्वामी आदि के वचनों से विरोध हो रहा है, तो मैं यही कहूंगा कि इस लेख को ध्यान से समझते हुए पढ़ें तो आपको मेरे कथन का पूर्ण बोध हो जाएगा।

बहुतायत से ऐसे लोगों की संख्या विश्व में व्याप्त है, जो बुद्ध को भगवान् विष्णु का अवतार मानते हैं | वहीं कई ऐसे लोग हैं, जो बुद्ध को भगवान का अवतार स्वीकार ही नहीं करते | अस्तु, प्रथम तो हम बुद्ध शब्द पर ध्यान देते हैं | बुद्ध का शाब्दिक अर्थ है, जागृत होना, सतर्क होना तथा जितेन्द्रिय होना | वस्तुतः बुद्ध एक व्यक्तिविशेष का परिचायक न होकर स्थितिविशेष का परिचायक है | वर्तमान समय में बुद्ध शब्द का व्यापक प्रयोग राजकुमार सिद्धार्थ के परिव्राजक रूप के लिए किया जाता है | हमारे धर्मग्रन्थ तथा ऋषियों ने इस सन्दर्भ में क्या कहा है, इस बात की चर्चा आज हम करेंगे |

सनातन धर्म की प्रवृत्ति प्रारम्भ से ही बड़ी उदार है | हमारे यहाँ किसी भी विषय, सिद्धांत और मत पर व्यापक चर्चा एवं विमर्श का स्थान उपलब्ध है | इसीलिए हमारे धर्मशास्त्रों में एक अंग दर्शनग्रन्थ का भी है | दर्शन का अर्थ है, दृष्टिकोण | यहाँ दर्शन का अर्थ है, धर्म को देखने का दृष्टिकोण | आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन, दोनों की व्यवस्था हमारे यहाँ की गयी है, क्योंकि यदि अन्धकार न रहे तो प्रकाश की परवाह कौन करे ? अज्ञान न रहे तो ज्ञान का महत्त्व कैसे प्रतिपादित होगा ? आस्तिक दर्शन में पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, सांख्य, योग, न्याय तथा वैशेषिक दर्शन का नाम आता है, तथा नास्तिक दर्शन में बौद्ध, जैन तथा चार्वाक दर्शन का |

एक भ्रम लोगों में बहुतायत से व्याप्त है कि गौतम ही बुद्ध थे | एक दूसरा भ्रम यह भी व्याप्त है कि गौतम बुद्ध नहीं थे, बल्कि बुद्ध कोई और थे | जबकि सत्य यह है कि गौतम ही नहीं, गौतम भी बुद्ध थे | वस्तुतः बुद्ध एक नहीं बहुत हैं | जैसे कि पूर्व में बताया गया कि बुद्ध मात्र एक स्थिति विशेष का नाम है, तो उस स्थिति में पहुँचने वाला प्रत्येक प्राणी बुद्ध कहलाया | युगाधारित अवतारों में व्यास का कार्य है, वेदों का विभाजन, पुराणों का संकलन, तथा ग्रंथों का संरक्षण | बुद्ध का कार्य है, समाज में जो लोग धर्म के नाम पर पाखंड तथा पशुहिंसा आदि करें, ऐसी आसुरी सम्पदा से युक्त पुरुषों को मायामय उपदेश के द्वारा सनातन से विमुख करना, जैसे किसी फोड़े को शरीर से काट कर इसीलिए अलग कर दिया जाता है कि वह अन्य अंगों को क्षति न पहुंचा सके | कल्कि का उद्देश्य है, बौद्ध, जैन तथा म्लेच्छों का विनाश करके पुनः विशुद्ध सनातन को स्थापित करना तथा व्यवस्था परिवर्तन करना |

इस संसार में वेद से इतर कुछ भी नहीं। इस संसार में स्वतः प्रमाण वेद भगवान् का समर्थन और प्रतिपादन न करने वाला वाक्य मान्य और प्रामाणिक नहीं। अतः एक सच्चा वैदिक वही है जो पुराण द्वेष न करे क्योंकि वेदों के पोषक पुराण ही हैं । एक सच्चा पौराणिक वही है जो वेद निंदा न करे क्योंकि वेद सभी तत्वों के मूल हैं।

बुद्ध एक नहीं हुए हैं | अनेकों बुद्धों का आगमन हो चुका है, तथा अनेकों बुद्ध आयेंगे | प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, कुशल, मैत्रेय, गौतम, कश्यप, शक्र, अर्यमा, शाक्यसिंह , क्रतुभुक, कृती, सुखी, शशांक, निष्णात, सत्व, शिक्षित, सर्वग्य, सुनत, रुरु, मारजित्, बुद्ध, प्रबुद्ध आदि कई बुद्धों एवं बोधिसत्वों का वर्णन आता है | अब बौद्धावतार का कारण बताते हैं |
मिश्रदेशोद्भवाम्लेच्छाः काश्यपेनैव शासिताः।
.....
शिखासूत्रं समाधाय पठित्वा वेदमुत्तमम् |
यज्ञैश्च पूजयामासुर्देवदेवं शचीपतिम्॥
.....
अहं लोकहितार्थाय जनिष्यामि कलौयुगे।
.....
कीकटे देशमागत्य ते सुरा जज्ञिरे क्रमात् |
वेदनिन्दां पुरस्कृत्य बौद्धशास्त्रमचीकरन् ॥
.....
वेदनिन्दाप्रभावेण ते सुराः कुष्ठिनोऽभवन् ।
.....
विष्णुदेवमुपागम्य तुष्टुवुर्बौद्धरूपिणम् ।
हरिर्योगबलेनैव तेषां कुष्ठमनाशयत्॥
(भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व, खण्ड - ०४, अध्याय - २०)

कलियुग के आने पर मिस्र देश में उत्पन्न कश्यप गोत्रीय म्लेच्छों ने शिखा रख कर तथा जनेऊ धारण करके स्वयं को ब्राह्मण घोषित कर दिया तथा स्वयं भी वेदपाठ करते हुए देवताओं का पूजन करने तथा कराने लगे | इससे त्रस्त होकर देवताओं ने देवराज इंद्र के समक्ष जाकर समाधान हेतु निवेदन किया | देवराज ने उनकी प्रार्थना पर उन असुर म्लेच्छों को मोहित करने के लिए बौद्धमार्ग का विस्तार करके वेदों कि निंदापरक ग्रंथों को लिखने के लिए बारहों आदित्य के साथ कीकट में अवतार लिया | वेदनिन्दा करने के कारण उन्हें कुष्ठ हो गया अतः वे समस्त देवगण बुद्धरूपधारी विष्णु जी के पास गए जिन्होंने अपने योगबल से उनका रोगनाश किया |

तो वस्तुतः बुद्ध का आगमन सनातन धर्म के अंदर जिन म्लेच्छों ने घुसपैठ कर रखी थी, उनके विनाश के लिए हुआ था |
श्रीमद्भागवत में भी वर्णन है “धर्मद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां......वेषं विधाय बहुभाष्यत औपधर्म्यं” तथा
“ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् |
बुद्धो नाम्नाजिन सुतः, कीकटेषु भविष्यति” |
असुरों को मोहित करने के लिए बुद्ध का अवतार हुआ था | सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि का उपदेश देने के कारण उन्हें अधार्मिक तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु वेद तथा ईश्वर निंदक होने के कारण वे धार्मिक भी नहीं कहलाये | अतः उन्हें उपधार्मिक कहा गया है |

कुछ अन्य जन यह बात भी करते हैं कि वस्तुतः विष्णु के अवतारों में पहले बलराम तथा कृष्ण को अलग अलग गिना गया था तथा बाद में आदि गुरु शंकराचार्य जी ने बलराम को हटा कर बुद्ध को सम्मिलित कर दिया | लेकिन इसका कोई प्रमाण न आदिशंकराचार्य जी के किसी ग्रन्थ में में मिलता है और न ही वर्तमान में किसी शांकरपीठ के पास इसका प्रमाण है | साथ ही कभी शंकराचार्य जी ने भी नहीं कहा कि बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं थे और न ही दलाई लामा इसे अस्वीकार करते हैं | कुछ मूर्ख तो यह भी कहते हैं कि दशावतार में बुद्ध का नाम नहीं है, इसे बाद में जयदेव कवि ने जोड़ दिया। हाँ, इस बात के कई प्रमाण अवश्य हैं कि तंत्रग्रंथों तथा पुराणों में शंकराचार्य जी के आगमन से बहुत पूर्व से ही विष्णु भगवान के बौद्धावतार की बात कही गयी थी और श्रीमद्भागवत आदि कई ग्रन्थों में बलराम जी को अवतारों की सूची से हटाये बिना ही बौद्धावतार का उल्लेख है | ऐसे ही प्रमाण देवीभागवत, विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण, नृसिंह पुराण आदि में भी प्राप्य हैं |

अस्तु, अब लोग बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार तो स्वीकार कर लेंगे परन्तु यह कहेंगे कि यहाँ तो कीकट प्रान्त में अजिन के पुत्र के रूप में वर्णन हैं | फिर हम गौतम को क्यों माने कि वे बुद्ध थे और भगवान के अवतार थे ? इसका प्रमाण भी पुराणों में प्राप्य है |

एतस्मिनैव काले तु कलिना संस्मृतो हरिः |
काश्यपादुद्भवो देवो गौतमो नाम विश्रुतः |
बौद्धधर्मं समाश्रित्य पट्टणे प्राप्तवान्हरिः |
(भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व, खण्ड - ०१, अध्याय ०६, श्लोक - ३६)

कलियुग की प्रार्थना पर काश्यप गोत्र में भगवान विष्णु ने गौतम के नाम से अवतार लेकर बौद्धधर्म का विस्तार करते हुए पटना चले गये |

पुनः लोग यह शंका करेंगे कि हमें राजा शुद्धोदन का भी नाम चाहिये, तो इसका प्रमाण भी उपलब्ध होता है |

शुद्धोदनस्तमालोक्य महासारं रथायुतैः।
प्रावृतं तरसा मायादेवीमानेतुमाययौ॥ ....
बौद्धा शौद्धोदनाद्यग्रे कृत्वा तामग्रतः पुनः।
योद्धुं समागता म्लेच्छकोटिलक्षशतैर्वृताः॥
(कल्कि पुराण)

इस प्रसंग में वर्णन है कि जब कल्कि भगवान् बौद्धों और म्लेच्छों का विनाश करने लगेंगे तो बुद्ध, उनके पिता शुद्धोदन तथा माता मायादेवी पुनः प्रकट होंगे तथा म्लेच्छों के साथ मिलकर कल्कि से युद्ध करेंगे | इसी युद्ध के वर्णन के अंतर्गत वर्णन है कि जब शुद्धोदन हार कर मायादेवी को बुलाने चला गया तो बौद्धों ने शुद्धोदन के पुत्र का आश्रय लेकर लाखों करोड़ों म्लेच्छों कि सहायता से युद्ध करना आरम्भ किया |

इस प्रकार से सभी प्रमाणों को एक साथ देखा जाय तो बुद्ध कई हैं, तथा सभी अवतार ही हैं जो उद्देश्य विशेष से यथासमय आते हैं | यदि प्रकाश में व्यक्ति हत्या कर रहा हो तो प्राण बचाने वाला अन्धकार कर देता है | वैसे ही जब धर्म का नाम लेकर म्लेच्छों में ब्राह्मण बन कर अधर्म प्रारम्भ किया तो उन्हें ठीक करने के लिए भगवान ने बुद्ध के रूप में आकर कहा कि जिस ईश्वर और धर्म के नाम पर तुम ये सब कर रहे हो, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है | बाद में जयदेव कवि आदि ने भी कारुण्यमातन्वते, निन्दसि यज्ञविधे, सदयपशुघातम् आदि शब्दों के द्वारा इसी बात को प्रमाणित किया कि श्रीहरि का ही अवतार भिन्न भिन्न समयों में बुद्ध को रूप में हुआ था |

एतेन्ये च त्रयीबाह्या: पाखण्डा: पापचारिण:।
पाशब्देन त्रयीधर्म: पालनाज्जगतः स्मृत:।
तं खंडयन्ति यस्मात्ते पाखण्डास्तेन हेतुना॥
(माहेश्वर तंत्र, अष्टादशपटल)

जो वेदत्रयी को न माने, वह पापाचारी ही पाखण्डी है। 'पा' शब्द से वेदत्रयी के धर्मानुसार लोकव्यवहार करना बताया गया है। जो उसका खण्डन करे वही पाखण्डी बताया गया है।

तपश्चरसु सर्वेषु असुरेषु जयार्थिषु।
विष्णु: सुदुस्तरां मायामास्यास्य सुरनोदित:॥
मोहयामास योगात्मा तपोविघ्नाय तान्प्रभु:।
स मूढान् बुद्धरूपेण तानुवाच महामना:॥
शक्या जेतुं सुराः सर्वे युष्माभिरितिदर्शनै:।
बौद्धधर्मं समास्थाय शक्यास्ते बभूविरे॥
तानुवाचार्हतो मम यूयं भवत मद्विधा:।
ज्ञानेन सहितं धर्मं ते चार्हन्त इति स्मृताः॥
बौद्धश्रावकनिर्ग्रंथा: सिद्धपुत्रास्तथैव च।
एते सर्वेपि चार्हंतो विज्ञेया दुष्टचारिण:॥

(माहेश्वर तंत्र, अष्टादश पटल)

विजय की कामना से तपस्या करने वाले असुरों को विष्णु भगवान ने मोहित करने वाली माया से वश में करके बुद्ध रूप धारण करके कहा :- "दर्शनों के पालन से सभी देवता आप लोगों के द्वारा जीते जा सकते हैं अतः आप सब बौद्ध धर्म में आस्थावान् होकर उन्हें जीत सकते हैं।" बुद्ध भगवान के ऐसा करने पर वे असुर बौद्ध मतावलंबी हो गए। उन्हें धर्मलोप किया देख भगवान ने कहा, जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम सब हो जाओ और बताए गए ज्ञान के सहित इस बौद्ध धर्म का पालन करो। इसीलिए वे सब पुनः अर्हत कहाये। बौद्ध श्रावक, निर्ग्रंथी, और सिद्धपुत्र (जैनी) ये सब दुष्ट बुद्धि वाले अर्हन्त के नाम से जाने गए।

अजिनपुत्र ब्राह्मण महात्मा बुद्ध के अवतार होने के सन्दर्भ में पूर्व के कई आचार्य एवं विद्वान् बता चुके हैं, अतएव मैं उनके प्रमाणों पर अधिक चर्चा नहीं करूंगा। मैं वह बताऊंगा जो शेष आचार्यों ने गुप्त रखा। क्या कारण है कि महात्मा बुद्ध को लोग नहीं जानते और गौतम बुद्ध की प्रसिद्धि अधिक हो गयी ? क्या विष्णु भगवान् के अवतार की प्रसिद्धि कम हो, और लौकिक जनों की अधिक, ऐसा सम्भव है ? इसका कारण है कि गौतम बुद्ध भी भगवान् विष्णु के अवतार ही हैं एवं उनके बाद अभी तक कोई दूसरा बुद्ध नहीं आया है इसीलिए उनकी प्रसिद्धि विशेष है। नारद पांचरात्र एवं पद्मपुराण में वर्णित शिवप्रोक्त विष्णुसहस्रनाम के अंत में भगवान् का एक नाम शौद्धोदनि (शुद्धोदन पुत्र) भी आया है।

वर्तमान में कथित नवबौद्ध आदि बुद्ध के मूल सिद्धांत को न जानने के कारण घोर अनर्थ करते हैं | क्योंकि बुद्ध ने फोड़े को काट कर हटाया और शेष को सुरक्षित किया, लेकिन कथित बौद्धगण स्वस्थ देह का गला ही काट दे रहे हैं | वस्तुतः यह सब कुछ पूर्व नियोजित था कि सनातन में घुसपैठ किये म्लेच्छों को नास्तिक बौद्ध दर्शन का आश्रय लेकर विष्णु भगवान भ्रमित करके उन्हें सनातन से वापस दूर करेंगे तथा इस प्रक्रिया में जो भी कुछ सनातनियों में भ्रम व्याप्त होगा उसे बाद में उचित अवसर पाकर कुमार कार्तिकेय तथा भगवान शिव क्रमशः आचार्य कुमारिल भट्ट तथ आदिगुरु शंकराचार्य के रूप में आकर ठीक करेंगे | तो निष्कर्ष यह निकलता है कि बुद्ध निःसंदेह नारायण के अवतार हैं तथा उनका उद्देश्य तथा कर्तव्य सही था | बुद्ध सही थे, बौद्ध नहीं |

धर्मसम्राट् करपात्री स्वामी आदि ने इसीलिये गौतम बुद्ध को प्रत्यक्ष अवतरण नहीं माना क्योंकि अम्बेडकर के बौद्ध बन जाने से अंग्रेजों ने सवर्ण तथा दलित नाम का जो कथित विभाजन किया था, उसमे दलित जन सनातन विरोधी हो रहे थे। साथ ही वे यह भी मानते थे कि गौतम ही एक मात्र बुद्ध हैं। उससे पहले कोई बुद्ध नहीं हुआ। इसीलिए करपात्री जी ने गौतम को अवतरण नहीं मानने की दूरगामी नीति अपनायी ताकि लोग बाद में भ्रमित न हों। साथ ही उन्होंने अजिन पुत्र पर भी जोर दिया। यदि गौतम से विरोध होता तो आचार्य शंकर, आचार्य कुमारिल तथा आचार्य उदयन आदि, जो गौतम से कुछ ही समय बाद हुए थे, कभी न कभी कहीं न कहीं यह ज़रूर कहते कि अजिन पुत्र ही वास्तव में बुद्ध अवतार हैं। यह गौतम नाम का आदमी फ़र्ज़ी बुद्ध था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। क्योंकि वे इस बात को अच्छे से जानते थे। आदिगुरु ने कभी गौतम के अवतार न होने की बात कही ? या ये कि वो फ़र्ज़ी बुद्ध है। एक मात्र अजन पुत्र ही बुद्ध हैं। और केवल वे ही अवतार हैं। कुमारिल भट्ट या आचार्य उदयन ने भी नहीं कहा। जबकि गौतम के सबसे निकट समकालीन बौद्ध खंडक तो वही लोग थे।

कारण मैं बता रहा हूँ। अम्बेडकर के बौद्ध बनने से सनातनियों का बड़ा वर्ग जो अंग्रेजों की कूटनीति का शिकार था, बुद्ध की ओर आकर्षित हुआ। यदि धर्मसम्राट जी जैसा अतिमान्य व्यक्तित्व यह कहता कि गौतम बुद्ध विष्णु के अवतार हैं तो बाकी सुधरे हुए सनातनियों में यह भ्रम होता कि विष्णु के कृष्ण और बौद्ध अवतार के उपदेश में इतनी विसंगति क्यों है। मूल उद्देश्य जो अवतारों का था, उससे वे परिचित तो थे नहीं। अब बुद्ध का मत भौतिकवादी है। मायाप्रधान है। बहुत लुभावना है, बहुत आकर्षक है। अतः यदि उन्हें विष्णु का अवतार कह देते तो लोग और तेजी से बुद्ध की ओर भागते। ये कह कर कि बौद्ध बनने से हमें भौतिकवाद का लाभ मिलेगा और लोग हमें गलत भी नहीं कहेंगे क्योंकि बुद्ध तो विष्णु के अवतार थे। अतः उन्होंने सीधा कह दिया कि गौतम बुद्ध विष्णु के अवतार ही नहीं है। यहाँ ध्यान दें कि नीति उन्होंने वही अपनायी जो विष्णु भगवान् ने बौद्धावतार में लगायी थी। ईश्वर के नाम पर अधर्म करने वालों को यह कह कर रोका कि ईश्वर ही नहीं है। इस प्रकर धर्मसम्राट करपात्री स्वामी जी ने सनातन का बहुत बड़ा वर्ग बचा लिया जो बौद्ध बनने जा रहे थे। अब जैसे हमारे हज़ारों जन्मों में हज़ारों माता पिता हुए, पर हमने उसी को प्रधानता दी, उसी से प्रभावित हुए जो सबसे अर्वाचीन है। वैसे ही सभी लोग अजन पुत्र की अपेक्षा गौतम से अधिक प्रभावित हुए।

अब गौतम का विरोध करने से ऐसे लोग, जो यह सोच रहे थे कि बौद्ध मत का लाभ लेंगे लेकिन धर्मभीरु होने से बौद्ध मत को भी सनातन ही मान रहे थे, यह कह कर कि गौतम बुद्ध विष्णु के अवतार हैं, अतः हम सही हैं, ऐसे लोगों पर विराम लग गया। लेकिन बौद्ध अवतार हुआ तो था, अतः उन्होंने अजन पुत्र को अवतार माना। इससे बुद्ध का विरोध हुआ भी, और नहीं भी हुआ। दोनों कार्य साध लिये। और वेदविरोधी होने से भगवान् का बुद्ध विग्रह श्रेष्ठ नहीं माना गया, अतः उनका विरोध भी पापकारक नहीं हुआ।

अब कीकट क्या है ? श्रीधर स्वामी ने कीकट का अर्थ मगध का मध्य या गया किया है। नालंदा के गृद्धकूट से मिर्जापुर के चुनार पास चरणाद्रि पर्वत तक कीकट है, ऐसा शक्तिसंगम तन्त्र का वचन है।

चरणाद्रिं समारभ्य गृध्रकूटान्तकं शिवे ।
तावत् कीकटदेशः स्यात् तदन्तर्मगधो भवेत्॥
(शक्तिसंगम तन्त्र)

अजिनपुत्र बुद्ध के अवतार के समय वाराणसी में महाराज किकी का शासन था और वे कीकट के भी राजा थे।

वैष्णव दशावतार में बुद्ध की चर्चा भी है।

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः॥
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की च ते दश॥
(भविष्यपुराण, उत्तरपर्व, अध्याय - १९०, श्लोक - ०६)

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नृसिंहो वामनस्तथा।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की ततः स्मृतः।
एते दशावताराश्च पृथिव्यां परिकीर्तिताः॥
(पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय - ७१, श्लोक - २७)

दैत्यानां नाशनार्थाय विष्णुना बुद्धरूपिणा।
बौद्धशास्त्रमसत्प्रोक्तं नग्ननीलपटादिकम्॥
(पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय - २३६, श्लोक - ०६)

इस प्रकार कहीं कहीं बुद्ध की गणना दशावतार में है तो कहीं कहीं नहीं है। ऐसे ही कहीं कहीं बलरामजी की भी गणना है तो कहीं नहीं भी है। अतएव यह कहना कि बाद में जयदेव कवि ने बुद्ध का नाम मिला दिया, यह सर्वथा अशास्त्रीय है। भगवान् विष्णु की निम्न भविष्यवाणी देखें -

मया बुद्धेन वक्तव्या धर्माः कलियुगे पुनः।
हन्तव्या म्लेच्छराजानस्तथा विष्णुयशात्मना॥
(विष्णुधर्मोत्तरपुराण, खण्ड - ०३, अध्याय - ३५१, श्लोक - ५४)

मेरे द्वारा बुद्धरूप से कलियुग में (उप) धर्म का प्रवचन किया जाएगा एवं फिर विष्णुयशा के पुत्र (कल्कि) के रूप में म्लेच्छ राजाओं का वध किया जाएगा।

कुछ और शास्त्र प्रमाण देखें -
भविता सञ्जयश्चापि वीरो राजा रणञ्जयात्।
सञ्जयस्य सुतः शाक्यः शाक्याच्छुद्धोदनोऽभवत्॥
शुद्धोदनस्य भविता शाक्यार्थे राहुलः स्मृतः।
प्रसेनजित्ततो भाव्यः क्षुद्रको भविता ततः॥
(वायुपुराण, उत्तरार्ध, अध्याय - ३७, श्लोक - २८४-२८५)

रणंजय का पुत्र संजय होगा। संजय का पुत्र शाक्य और उससे शुद्धोदन होगा। शुद्धोदन का पुत्र शाक्य उपाधि लेकर राहुल को जन्म देगा। राहुल का पुत्र प्रसेनजित् और उसका पुत्र क्षुद्रक होगा। (गौतमबुद्ध की उपाधि शाक्यमुनि भी है)

बुद्ध पतन और उत्थान दोनों कराता है, इसका एक संकेतात्मक वर्णन देखें -

बुद्धं प्रतीदं ब्रह्मैव केवलं शान्तमव्ययम्।
अबुद्धं प्रति बुद्ध्यैतद्भासुरं भुवनान्वितम्॥
सर्गस्तु सर्गशब्दार्थतया बुद्धो नयत्यधः।
स ब्रह्मशब्दार्थतया बुद्धः श्रेयो भवत्यलम्॥

(योगवासिष्ठ महारामायण, स्थितिप्रकरण, सर्ग - ०३, श्लोक - १६ एवं २३)

जो व्यक्ति बुद्ध हो गया है, उसके लिए ब्रह्म का अनुभव शांत एवं अव्ययरूप में होता है। जो बुद्ध नहीं है, वह केवल प्रकाशित संसार को ही देखता है। यदि केवल संसार को संसार ही मान ले (नास्तिक बुद्धि से) तो यह बुद्धत्व उसका पतन कर देता है। यदि संसार में ब्रह्मरूप का दर्शन करे तो बुद्ध का कल्याण होता है, इतनी सी बात है।

धर्मराज युधिष्ठिर को अवतारों का वर्णन करते हुए ऋषि मार्कण्डेय कहते हैं -
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्किश्च ते दश ॥
तथा बुद्धत्वमपरं नवमं प्राप्स्यतेऽच्युतः ।
शान्तिमान्देवदेवेशो मधुहन्ता मधुप्रियः ॥
तेन बुद्धस्वरूपेण देवेन परमेष्ठिना ।
भविष्यति जगत्सर्वं मोहितं सचराचरम् ॥
(स्कन्दपुराण, अवन्तीखण्ड-रेवाखण्ड, अध्याय - १५१, श्लोक - ०४ एवं २१-२२)

मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध एवं कल्कि ये दस अवतार हैं। नवें अवतार के रूप में भगवान् अच्युतदेव (विष्णु) का बुद्धरूप से आगमन होगा। मधुदैत्य का नाश करने वाले, वसन्तप्रिय (कामरूपी) भगवान् का वह रूप शान्त होगा। उन परमदेव के उस रूप के द्वारा सम्पूर्ण संसार मोहित हो जाएगा।

ऋषिप्रणीत ज्यौतिषीय ग्रंथों में भी देखें -
रामः कृष्णश्च भो विप्र नृसिंहः सूकरस्तथा।
एते पूर्णावताराश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विताः॥
अवताराण्यनेकानि ह्यजस्य परमात्मनः।
जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः॥
दैत्यानां बलनाशाय देवानां बलबृद्धये।
धर्मसंस्थापनार्थाय ग्रहाज्जाताः शुभाः क्रमात्‌॥
रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः।
नृसिंहो भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च॥
वामनो विबुधेज्यस्य भार्गवो भार्गवस्य च।
कूर्मो भास्करपुत्रस्य सैंहिकेयस्य सूकरः॥
केतोर्मीनावतारश्च ये चान्ये तेऽपि खेटजाः।
परात्मांशोऽधिको येषु ते सर्वे खेचराभिधः॥
(बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय ०२, श्लोक - ०२-०७)

हे ब्राह्मणों ! राम, कृष्ण, नृसिंह एवं वाराह ये चार पूर्णावतार हैं। अन्य अवतारों में कुछ जीवांश भी विद्यमान् है। अजन्मा परमात्मा के अनेकों अवतार हैं। जीवों को उनका कर्मफल देने के लिए भी भगवान् जनार्दन ग्रहरूप से आते हैं। दैत्यों के बल का नाश करने के लिए, एवं देवताओं के बल को बढ़ाने के लिए, धर्म की स्थापना के लिए क्रम से शुभ ग्रहों का निर्माण हुआ है। श्रीरामावतार सूर्य हैं, चन्द्रमा श्रीकृष्ण हैं। नृसिंह मङ्गल एवं बुद्धावतार बुध हैं। वामन बृहस्पति हैं एवं परशुरामावतार शुक्र हैं। कूर्मावतार शनि और वाराह राहु हैं। केतु मत्स्यावतार हैं और भी अन्य जो आकाशीय पिंड हैं, उनमें परमात्मा का ही अंश है।

आपको स्मरण होगा कि मैंने भविष्य पुराण के प्रमाण से यह सिद्ध किया था कि इन्द्रादि ने बुद्धावतार लेकर वेदनिन्दा की, जिससे उन्हें कुष्ठ हो गया और भगवान् विष्णु ने अपने योगबल से उन्हें स्वस्थ किया। अब हम विलुप्तप्राय मुद्गल पुराण के एक प्रमाण को देखते हैं। ब्रह्मा की प्रार्थना पर (इन्द्रादि के इस अवतार के बाद) भगवान् विष्णु ने जब बुद्धावतार का निर्णय किया तो वेदनिन्दा से होने वाले अधर्म का उन्हें भय हुआ। उन्हें लोगों के वैदिक कृत्यों में विघ्न डालना था इसीलिए वे विघ्नराज गणेश जी की तपस्या करने लगे। भगवान् विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर गणेश्वर में उन्हें वरदान मांगने को कहा, तो भगवान् विष्णु ने निम्न बात कही -

भक्तिं देहि त्वदीयां मे सर्व सिद्धिप्रदायिनीम्।
बुद्धोऽहं धर्मलोपार्थं भविष्यामि कलौ युगे॥
धर्मसंस्थापनं नित्यं करोमि गणनायक।
धर्मलोपार्थमेवाहं त्वया बुद्धः प्रकीर्तितः॥
एतदेव विरुद्धं मे प्राप्तं ढुंढ़े दयानिधे।
तदर्थं शरणं नाथ यातोऽहं ते पदस्य च॥

हे नाथ ! सर्वप्रथम तो आप मुझे सभी सिद्धियों के देने वाली अपनी भक्ति का वरदान दें। मैं धर्म के लोप हेतु कलियुग में बुद्ध का अवतार लूंगा। मेरे सभी अवतार धर्म की स्थापना के लिए ही होते हैं और अब मुझे आपकी आज्ञा से धर्म के विनाश के लिए बुद्ध बनना है। इस विरोधाभास के कारण मैं आपके चरणों की शरण में आया हूँ।

भगवान् विष्णु की बात सुनकर परब्रह्मरूपी गणेश्वर ने कहा -

मा भयं कुरु विष्णो त्वं धर्मयुक्तो भविष्यसि।
कलिप्रवर्तने दोषो न ते क्वापि महात्मनः॥
मया चतुर्युगा: खेलाद्रचिताः क्रमकारणात्।
वरदानेन मे सर्वे स्वस्वकालयुता बभु:॥
कलिस्तेषु महापापी मया संस्थापितोऽभवत्।
मदाज्ञापालको भूत्वा भव बुद्धस्त्वमादरात्॥

हे विष्णो ! आप भय न करें, आप धर्म से युक्त ही रहेंगे। कलियुग को बढ़ावा देने के कारण आप जैसे महात्मा को कोई दोष नहीं लगेगा। मेरे ही द्वारा खेल खेल में क्रम से चारों युग बनाये गए हैं, और मेरे ही वरदान से अपने अपने कालविभाजन से वे युक्त हैं, इनमें महापापी कलियुग की भी स्थापना मैंने की है। इसीलिए मेरी आज्ञा को मानकर आप आदरपूर्वक बुद्धरूप धारण करें।

सर्वान् सम्मोह्य विश्वात्मा बुद्ध: कलिप्रवर्तकः।
संस्थितः कैकटे देशे गुप्तरूपेण मानदः॥

हे विश्वात्मन् ! आप कलियुग को बढ़ाने वाला बुद्धरूप धारण करके सबों को मोहित करें एवं कीकट देश में गुप्तरूप से स्थित हों। (गुप्त इसीलिए, ताकि उनके विष्णु होने का बोध छिपा रहे)

तथापि पूजया हीनो बभूव बुद्धरूपधृक्।
विष्णुर्वेदविरुद्धस्थमार्गसंसर्जनात्किल॥

(मुद्गल पुराण, खण्ड - ०८, अध्याय - १५)

वेदविरुद्ध मार्ग की स्थापना के कारण भगवान् विष्णु बुद्धरूप में पूजा से रहित हुए, उनकी पूजा वर्जित है।

यह अवतार अजिनपुत्र बुद्ध के रूप में हुआ था। जहां गौतम बुद्ध का अवतार वैशाख पूर्णिमा में हुआ था, और महात्मा बुद्ध का अवतार कुछ के मत से माघ में हुआ था। कुछ विद्वान् बुद्धावतार का प्रमाण विजयादशमी के दिन से दैते हैं तो कुछ कहते हैं कि शुक्लपक्ष की दशमी में जब विशाखा नक्षत्र और रविवार था तब दिन के छः घड़ी बीतने पर बुद्धावतार हुआ। शुक्ल दशमी और विशाखा का योग आषाढ़ के महीने में बहुधा बनता है।

शुद्धा च दशमी देवि रविवारेण संयुता।
शुक्लयोगे विशाखायां दिवा नाड़ी च षट् तदा।
बुद्धोऽवतीर्णो देवेशि ततः कलियुगे शृणु॥
(शक्तिसंगम तन्त्र, छिन्नमस्ताखण्ड, षष्ठ पटल, श्लोक - ६६)

अब तन्त्र में बुद्ध की उपासना का एक वर्णन मिलता है।

अथातः संप्रवक्ष्यामि बौद्धमन्त्रं महाफलम्।
सभ्यत्वान्न द्विजातीनामधिकारोस्ति कर्हिचित्॥
वाममार्गरत विप्राः कुण्डका जातिविच्युताः।
हीना वैदिकसंस्कारै: प्रमादान्म्लेच्छतां गताः॥
गोलकाश्च तथा जात्या कायस्थादय एव च।
बौद्धं विष्णुं समाराध्य भुक्तिं मुक्तिं प्रयान्ति ते॥
पतितानामयं मन्त्रः सम्प्रोक्तः सुखदायकः।
नमो भगवते बुद्ध संसारार्णवतारक।
कलिकालादहं भीतः शरण्यं शरणं गतः॥

भगवान् ईश्वर कहते हैं - अब मैं महान् फल को देने वाले बुद्धावतार का मन्त्र कहता हूँ। सभ्य (वेदाधिकार से युक्त) द्विजाति के लिए इसे करने का अधिकार नहीं है। वाममार्गी (अवैदिक) ब्राह्मण, जाति से बहिष्कृत या च्युत, वैदिक संस्कार से हीन (व्रात्य), आलस्य के कारण म्लेच्छवृत्ति को अपनाने वाले कुण्डक, गोलक आदि वर्णसंकर एवं कायस्थ आदि (कायस्थों के आठ प्रकार में चार वैदिक मार्ग में अधिकृत हैं और चार अवैदिक मार्ग में, उसमें अवैदिक मार्ग वाले कायस्थ) बुद्धरूप से विष्णु की आराधना करके इस संसार में सुख और आगे मुक्ति को प्राप्त करते हैं। पतितों को यह मन्त्र सुखदायी बताया गया है।

मन्त्र - नमो भगवते बुद्ध संसारार्णवतारक।
कलिकालादहं भीतः शरण्यं शरणं गतः॥

भगवान् बुद्ध के लिए प्रणाम है। संसार रूपी समुद्र से पार करने वाले ! मैं कलिकाल से भयभीत होकर आपको रक्षक मानता हुआ आपकी शरण में आया हूँ।

आगे बुद्ध सम्बन्धी यंत्र में कहते हैं -
कामिनीं च महामायां श्रीकृष्णं च विनायकम्।
समन्तभद्रं वर्त्मर्षिं निधिचन्द्रं मनोहरम्॥
(मेरुतन्त्र, दशावतारमन्त्रप्रकाश २६वां पटल)

कामिनी, महामाया (बुद्धमाता), श्रीकृष्ण (यमारि), विनायक, समन्तभद्र (गौतम बुद्ध की एक उपाधि) एवं निधिचन्द्र का पूजन करे। गौतम बुद्ध के जन्म के साथ ही चार निधिकुम्भ भी प्रकट हुए थे ऐसा बौद्ध ग्रंथों में वर्णन है। इस प्रकार भगवान् विष्णु का शुद्धोदनपुत्र गौतम बुद्ध के रूप में अवतार सिद्ध होता है।

प्रधान बौद्ध ग्रंथ ललितविस्तर सूत्र का निम्न वचन देखें -

इह खलु बौद्धशास्त्रसमूहेषु सम्प्रोक्ताः पञ्चविंशतिर्बुद्धा दृश्यन्ते। तेषां शुद्धोदनौरसात् मायादेवीगर्भजातः शाक्यसिंहसर्वार्थसिद्धार्कबन्धुगौतमेति नामचतुष्टयेन प्रसिद्धोऽन्तिमतमः लोकविश्रुतो बुद्धः कपिलवस्तुनगरे कलेश्चतुःशतषडशीत्यधिकद्विसहस्रमितेषु गतेष्वब्देषु शुक्रवासरे सुरद्विषां सम्मोहनाय साक्षाद् विवेकमूर्त्तिः स्वेच्छाविग्रहेण प्रादुर्बभूव।
(ललितविस्तर सूत्र)

बौद्धशास्त्र के समूहों में (दीपङ्कर बुद्ध से गौतम बुद्ध तक और भविष्य के मैत्रेय बुद्ध को मिलाकर) पच्चीस बुद्ध दिखते हैं। उनमें शुद्धोदन की औरस सन्तान, जो मायादेवी के गर्भ से उत्पन्न हुई, जिनकी शाक्यसिंह, सर्वार्थसिद्ध (सिद्धार्थ), अर्कबन्धु और गौतम, इन चार नामों से प्रसिद्धि हुई, वे सबसे निकट (हाल ही) के हैं, इनकी कीर्ति संसार में प्रसिद्ध है। कपिलवस्तु में कलियुग के २४८६ (दो हज़ार, चार सौ छियासी) वर्ष बीतने पर शुक्रवार को देवताओं से द्रोह करने वाले (असुरों) को मोहित करने के लिए साक्षात् विवेक की मूर्ति, इच्छानुसार शरीर को धारण करके उत्पन्न हुए।

यहां सुरद्विषां सम्मोहनाय शब्द से गौतम बुद्ध के अवतार का जो उद्देश्य था, उसका अजिनपुत्र महात्मा बुद्ध के अवतार का उद्देश्य, जो श्रीमद्भागवत में सम्मोहाय सुरद्विषाम् के रूप में वर्णित है, उससे संगति होना सिद्ध करता है कि दोनों बुद्ध भगवान् विष्णु के ही अवतार थे एवं समान उद्देश्य से आये थे।

अब हम ऐसे शास्त्रीय प्रमाणों पर चर्चा करेंगे जो स्पष्ट रूप से नाम, रूप आदि सभी आयामों में गौतम बुद्ध को भगवान् विष्णु का अवतार बताते हैं।

वक्ष्ये बुद्धावतारं च पठतः शृण्वतोऽर्थदम्।
पुरा देवासुरे युद्धे दैत्येर्देवाः पराजिताः॥
रक्ष रक्षेति शरणं वदन्तो जग्मुरीश्वरम्।
मायामोहस्वरूपोऽसौ शुद्धोदनसुतोऽभवत्॥
मोहयामास दैत्यांस्तांस्त्याजिता वेदधर्मकम्।
ते च बौद्धाबभूवुर्हि तेभ्योऽन्यो वेदवर्जिताः॥
(अग्निपुराण, अध्याय - १६, श्लोक - ०१-०३)

जिसको पढ़ने या सुनने से अर्थागम होता है, उस बुद्धावतार का वर्णन करता हूँ। पूर्वकाल में देवासुर संग्राम होने पर दैत्यों ने (वेदधर्म के पालन से जन्य पुण्यबल से) देवताओं को पराजित कर दिया। तब सभी देवता जगदीश्वर भगवान् विष्णु के पास रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! ऐसा कहते हुए गए। तब भगवान् ने माया से मोहित करने वाले रूप को धारण करके शुद्धोदन के पुत्र में अवतार लिया। उन्होंने दैत्यों को मोहित करके उनसे वैदिकधर्म का आचरण छुड़वा दिया। वे सभी दैत्य बाद में बौद्ध बन गए और उनसे अन्य लोग भी वेदों का परित्याग करने लगे।

अब भगवान् विष्णु के दशावतार में शुद्धोदन पुत्र बुद्ध का स्वरूप कैसा है, उसका वर्णन भी देखें -

शान्तात्मा लम्बकर्णश्च गौराङ्गश्चाम्बरावृतः।
ऊर्ध्वपद्मस्थितो बुद्धो वरदाभयदायकः॥
(अग्नि पुराण, दशावतारप्रतिमालक्षण, अध्याय - ४९, श्लोक - ०८)

शान्तव्यक्तित्व, लंबे कान, गोरा शरीर, वस्त्र पहने हुए, ऊपर की ओर खिले कमल पर बैठे हुए बुद्ध वरद एवं अभय मुद्रा को धारण करके वरदाभय को देते हैं। (यह स्वरूप गौतम बुद्ध का ही है)

एक और प्रमाण देखें जो बहुत ही दुर्लभ ग्रंथ से है। जैसे महापुराणों में विष्णुपुराण एवं शिवपुराण हैं, वैसे ही उपपुराणों में विष्णुधर्म पुराण (पूर्व) एवं विष्णुधर्मोत्तर पुराण हैं। साथ ही शिवधर्म पुराण (पूर्व) एवं शिवधर्मोत्तर पुराण भी हैं। निम्न प्रमाण विष्णुधर्म पुराण (पूर्व) से है, जिसमें भगवान् विष्णु स्वयं ब्रह्मा जी से अपने अवतारों का वर्णन करते हुए श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारकथन के बाद कहते हैं -

ततः कलियुगे घोरे सम्प्राप्तेऽब्जसमुद्भव।
शुद्धोदनसुतो बुद्धो भविष्यामि विमत्सरः॥
बौद्धं धर्ममुपाश्रित्य करिष्ये धर्मदेशनाम्।
नराणामथ नारीणां दया भूतेषु दर्शयन्॥
रक्ताम्बरा ह्यञ्जिताक्षा: प्रशान्तमनसस्ततः।
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति मयि बुद्धत्वमागते॥
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता।
भवित्री प्रायशो ब्रह्मन्मयि बुद्धत्वमागते॥
(विष्णुधर्म (पूर्व) पुराण, अध्याय - ६६, श्लोक - ६८-७१)

हे ब्रह्मन् ! उसके बाद घोर कलियुग के आने पर मैं ईर्ष्यारहित होकर शुद्धोदन के पुत्र बुद्ध के रूप में अवतार लूंगा। बौद्धधर्म का आश्रय लेकर मैं धर्म का उपदेश करूँगा, स्त्री एवं पुरुषों को प्राणियों में दयाभाव का उपदेश करूँगा। जब मैं बुद्ध बनूंगा तो लाल वस्त्र पहने, काली आंखों वाले, शांतचित्त शूद्र भी उस समय धर्म का उपदेश करने लगेंगे। पृथ्वी एडूक (मज़ार) से भर जाएगी, मंदिरों की संख्या कम होने लगेगी एवं मेरे बुद्धावतार के बाद पृथ्वी ऐसी ही हो जाएगी।

इस प्रकार मैंने यह सिद्ध किया कि अजिनपुत्र ब्राह्मण महात्मा बुद्ध एवं शुद्धोदनपुत्र क्षत्रिय गौतम बुद्ध, ये दोनों ही भगवान् विष्णु के ही अवतार हैं।

बौद्धमत के ग्रंथ तो कामाख्या आदि को भी मान्यता देते हैं, जबकि आजकल के नवबौद्ध कामाख्या की योनिपूजा को लेकर उपहास करते हैं।

कामरूपं भवेत् पृथ्वीरापः पूर्णगिरिस्मृतः।
जालन्धरं महातेजो वायुरोंकारमण्डलम्॥
(मंथानभैरवतन्त्र, कुमारिकाखण्ड, आनन्द - ६७)

सबसे वर्तमान में जो गौतम बुद्ध हुए वो अपने शिष्यों को, विशेषतः पुत्र राहुल को अपने पूर्वजन्मों और उनके समकालीन बुद्धों का वर्णन करते हुए बुद्धवंसपालि का उपदेश करते हैं जो सुत्तपिटक के खुद्दकनिकाय के अंतर्गत वर्णित है। ललितविस्तर और जातक आदि का कथन है कि बुद्धावतार यदि मानव में हों तो ब्राह्मण या क्षत्रिय कुल में ही होता है।

भगवान् गौतम बुद्ध का पहला जन्म
नाम - सुमेध
कुल - ब्राह्मण
निवास - अमरावती
तात्कालीन बुद्ध - भगवान् दीपङ्कर बुद्ध

इन्हीं दीपङ्कर बुद्ध की शरण में सुमेध गए थे और दीपङ्कर बुद्ध ने उस समय भविष्यवाणी की थी -

पस्सथ इमं तापसं जटिलं उग्गतापनम्।
अपरिमेय्यितो कप्पे बुद्धो लोके भविस्सति॥
अहु कपिलब्हया रम्मा निक्खमित्वा तथागतो।
पधानं पदहित्वान कत्वा दुक्करकारिकम्॥
अजपालरुक्खमूलस्मिं निसीदित्वा तथागतो।
तत्थ पायासं पग्गय्ह नेरञ्जनमुपेहिति॥
नेरञ्जनाय तीरम्हि पायासं अद सो जिनो।
पटियत्तवरमग्गेन बोधिमूलमुपेहिति॥
ततो पदक्खिणं कत्वा बोधिमण्डं अनुत्तरो।
अस्सत्थरुक्खमूलम्हि बुज्झिस्सति महायशो॥
इमस्स जनिका माता माया नाम भविस्सति।
पिता सुद्धोदनो नाम अयं हेस्सति गोतमो॥
(बुद्धवंसपालि, सुमेधपत्थनाकथा, ६१-६६)

दीपङ्कर बुद्ध बोले - इस उग्र तपस्या करने वाले जटाधारी तपस्वी को देखो। यह आज से चार असंख्येय कल्प के बीतने पर बुद्ध होगा। यह तथागत बनने के लिए कपिलवस्तु नगरी से गृहत्याग कर प्रबल उद्योग एवं दुष्कर तपस्या करता हुआ अजपाल नामक बरगद वृक्ष के नीचे बैठकर वहां दूध (या खीर) ग्रहण करके निरंजना (फल्गु की एक शाखा) नदी के तट पर जाएगा। निरंजना नदी के तट पर उस क्षीर को खाकर, व्यवस्थित मार्ग से बोधिवृक्ष के नीचे जाएगा। यह अनुपम महान् यशस्वी, उस बोधिवृक्ष की प्रदक्षिणा करके पीपल के नीचे बुद्ध बनेगा। इसकी माता माया देवी होंगी तथा पिता का नाम शुद्धोदन होगा। इसका नाम गौतम होगा। (इसी भविष्यवाणी का अनुमोदन परवर्ती बुद्ध करते गए हैं)

भगवान् दीपङ्कर बुद्ध का जन्मस्थान - रम्यवती
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुमेधा एवं सुदेव
पटरानी - पद्मा
पुत्र - वृषभस्कन्ध
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - सुमेध नामक मुमुक्षु ब्राह्मण

भगवान् कौण्डिन्य बुद्ध
जन्मस्थान - रम्यवती
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुजाता एवं सुनन्द
पटरानी - रुचि देवी
पुत्र - विजितसेन
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - चक्रवर्ती राजा
भगवान् कौण्डिन्य बुद्ध की भविष्यवाणी -

इमस्स जनिका माता माया नाम भविस्सति।
पिता सुद्धोदनो नाम अयं हेस्सति गोतमो॥
×××××
आयु वस्ससतं तस्स गोतमस्स यसस्सिनो॥

इसकी माता मायादेवी और पिता शुद्धोदन होंगे। इसका नाम गौतम होगा एवं इस यशस्वी की आयु सौ वर्ष के करीब होगी।

भगवान् मङ्गल बुद्ध
जन्मस्थान - उत्तर नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - उत्तर एवं उत्तरा
पटरानी - यशस्वी (यशस्विनी)
पुत्र - शिवल
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - सुरुचि नामक वेदाभ्यासी ब्राह्मण

भगवान् सुमन बुद्ध
जन्मस्थान - मेखल नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुदत्त एवं सिरिमा
पटरानी - अवतंसिका
पुत्र - अनुपम
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - देवयोनि में नागराज

भगवान् रेवत बुद्ध
जन्मस्थान - सुधान्यवती
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - विपुला एवं विपुल
पटरानी - सुदर्शना
पुत्र - वरुण
आयु - साठ हजार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - अतिदेव नामक दरिद्र ब्राह्मण

भगवान् शोभित बुद्ध
जन्मस्थान - सुधर्मनगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुधर्मा एवं सुधर्म
पटरानी - मणिला
पुत्र - सिंह
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - सुजात नामक ब्राह्मण

भगवान् अनोमदर्शी बुद्ध
जन्मस्थान - चन्द्रवती
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - यशोधरा एवं यशस्वी
पटरानी - सिरिमा
पुत्र - उपवाण
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - देवयोनि में यक्षराज

भगवान् पद्म बुद्ध
जन्मस्थान - चम्पकनगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - असमा एवं अस
पटरानी - उत्तरा
पुत्र - रम्य
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - पशुयोनि में सिंह

भगवान् नारद बुद्ध
जन्मस्थान - धन्यवती नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - अनोमा एवं सुदेव
पटरानी - विजितसेना
पुत्र - नन्दोत्तर
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - जटाधारी तपस्वी

भगवान् पद्मोत्तर बुद्ध
जन्मस्थान - हंसवती
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुजाता एवं आनन्द
पटरानी - वसुदत्ता
पुत्र - उत्तम
आयु - एक लाख वर्ध
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - जटिल नामक प्रशासनिक अधिकारी

भगवान् सुमेध बुद्ध
जन्मस्थान - सुदर्शन नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुदत्ता एवं सुदत्त
पटरानी - सुमना
पुत्र - पुनर्वसु
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - उत्तर नामक करोड़पति

भगवान् सुजात बुद्ध
जन्मस्थान - सुमङ्गल नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - प्रभावती एवं उद्गत
पटरानी - श्रीनन्दा
पुत्र - उपसेन
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - चार द्वीपों का चक्रवर्ती सम्राट्

भगवान् प्रियदर्शी बुद्ध
जन्मस्थान - सुधन्य नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - चन्द्रा एवं सुदत्त
पटरानी - विमला
पुत्र - काञ्चनावेल
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - काश्यप नामक वेदपाठी ब्राह्मण

भगवान् अर्थदर्शी बुद्ध
जन्मस्थान - शोभन नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुदर्शना एवं सागर
पटरानी - विशाखा
पुत्र - शैल
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - सुसीम नामक उग्र तपस्वी

भगवान् धर्मदर्शी बुद्ध
जन्मस्थान - शरण नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुनन्दा एवं शरण
पटरानी - विचिकोली
पुत्र - पुण्यवर्द्धन
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - देवयोनि में देवराज इन्द्र

भगवान् सिद्धार्थ बुद्ध (प्राचीन)
जन्मस्थान - वैभार नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सुस्पर्शा एवं उदयन
पटरानी - सौमनस्या
पुत्र - अनुपम
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - मङ्गल नामक त्रिकालदर्शी तपस्वी

भगवान् तिष्य बुद्ध
जन्मस्थान - क्षेमक नगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - पद्मा एवं जनसन्ध
पटरानी - सुभद्रा
पुत्र - आनन्द
आयु - एक लाख वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - सुजात नामक राजा

भगवान् पुष्य बुद्ध
जन्मस्थान - काशिका नगरी
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - सिरिमा एवं जयसेन
पटरानी - कृशा गौतमी
पुत्र - अनुपम
आयु - नब्बे हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - विजितावी नामक राजा

भगवान् विपश्यी बुद्ध
जन्मस्थान - बन्धुमती नगरी
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - बन्धुमती एवं बन्धुमान्
पटरानी - सुदर्शना
पुत्र - समवृत्तस्कंध
आयु - अस्सी हजार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - देवयोनि में अतुल नामक नागराज

भगवान् शिखी बुद्ध
जन्मस्थान - अरुणवती
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - प्रभावती एवं अरुण
पटरानी - सर्वकामा
पुत्र - अतुल
आयु - सत्तर हजार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - अरिन्दम नामक प्रतापी राजा

भगवान् विश्वम्भू बुद्ध
जन्मस्थान - अनोमनगर
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - यशस्वी (यशस्विनी) एवं सुप्रतीत
पटरानी - सुचित्रा
पुत्र - शूर्पबुद्ध
आयु - साठ हजार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - सुदर्शन नामक राजा

भगवान् ककुसन्ध बुद्ध
जन्मस्थान - क्षेमवती नगरी
कुल - ब्राह्मण
माता एवं पिता - विशाखा एवं अग्निदत्त
पटरानी - रोचिनी
पुत्र - उत्तर
आयु - चालीस हजार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - क्षेम नामक प्रजावत्सल राजा

भगवान् कोणागमन बुद्ध
जन्मस्थान - शोभवती
कुल - ब्राह्मण
माता एवं पिता - उत्तरा एवं यज्ञदत्त
पटरानी - रुचिगात्रा
पुत्र - स्वस्तिज
आयु - तीस हजार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - पर्वत नामक दिग्विजयी राजा

भगवान् काश्यप बुद्ध
जन्मस्थान - कीकट (उस समय वाराणसी में महाराज किकी का शासन था)
कुल - ब्राह्मण
माता एवं पिता - धनवती एवं ब्रह्मदत्त (अजन)
पटरानी - सुनन्दा
पुत्र - विजितसेन
आयु - बीस हज़ार वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - ज्योतिपाल नामक वेदज्ञ ब्रह्मचारी

भगवान् गौतम बुद्ध
जन्मस्थान - कपिलवस्तु
कुल - क्षत्रिय
माता एवं पिता - मायादेवी एवं शुद्धोदन
पटरानी - भद्रकञ्चना यशोधरा
पुत्र - राहुल
आयु - लगभग सौ वर्ष
उस समय गौतम बुद्ध की स्थिति - मुख्य बुद्धत्व की स्थिति में महापरिनिर्वाण

दीपङ्कर बुद्ध के समय जो सुमेध ब्राह्मण थे, वे इस सनातनी गणना से श्वेतवाराह कल्प एवं बौद्ध गणना से भद्रक कल्प में ही गौतम बुद्ध बने। दीपङ्कर बुद्ध से पूर्व उनके ही कल्प में तण्हङ्कर बुद्ध, मेघङ्कर बुद्ध एवं शरणङ्कर बुद्ध हो चुके थे। दीपङ्कर बुद्ध के कई कल्पों के बाद कौण्डिन्य बुद्ध हुए। भगवान् कौण्डिन्य बुद्ध एवं मङ्गल बुद्ध के मध्य असंख्य कल्पों का अंतराल था। भगवान् मङ्गल बुद्ध के बाद हुए सुमन बुद्ध से लेकर शोभित बुद्ध तक चार बुद्ध एक ही कल्प में हुए हैं। उसके बाद कई कल्पों के अंतराल से अनोमदर्शी बुद्ध हुए। इन्हीं के कल्प में पद्म एवं नारद बुद्ध भी हुए। इसके बाद एक लाख कल्पों तक बुद्धावतार नहीं हुआ, फिर पद्मोत्तर बुद्ध हुए। इनके बाद तीस हजार कल्पों के मध्य मात्र सुमेध एवं सुजात बुद्ध हुए। फिर अठारह सौ कल्पों के बाद प्रियदर्शी, अर्थदर्शी एवं धर्मदर्शी बुद्ध एक ही कल्प में आये। वर्तमान कल्प से ९४ कल्प पूर्व सिद्धार्थ (प्राचीन) बुद्ध आये। उनके आने के दो कल्प के बाद तिष्य एवं पुष्य नामक बुद्ध आये। उसके भी अगले कल्प में विपश्यी बुद्ध हुए। वर्तमान कल्प से ३१ कल्प पूर्व शिखी एवं विश्वम्भू नामक बुद्ध हुए।

वर्तमान भद्रक कल्प में ककुसन्ध, कोणागमन, काश्यप एवं गौतम बुद्ध हुए हैं। इसके बाद आगे आने वाले कल्पों में भविष्य के मैत्रेय आदि बुद्ध होंगे। आज के बौद्धों को बुद्धत्व की इस अनादि एवं अनंत परम्परा का शास्त्रीय बोध न होने से केवल गौतम बुद्ध के नाम पर उदरपूर्ति करते रहते हैं।

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मैं ब्रह्मा विष्णु महेश आदि किसी देवता को नहीं मानूंगा।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् तथागत बुद्ध बोधिसत्व वज्रगर्भ से -
इन्द जम जल जक्ख भुत वह्नि वायु रक्ख।
चन्द सुज्ज माद बप्प तलपाताले अट्ठसप्प स्वाहा॥
(हेवज्रतन्त्र, हेवज्रसर्वतन्त्रमुद्रणपिण्डार्थ, श्लोक - ९१)

इन्द्र, यम और जल हमारी रक्षा करें। भूत, अग्नि, वायु भी रक्षा करें। चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी और ब्रह्मा, नीचे पाताल में अष्टसर्प भी रक्षा करें।

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मैं ओमकार आदि पर विश्वास नहीं करता हूँ।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् तथागत बुद्ध बोधिसत्व वज्रगर्भ से कहते हैं -

ओं अकारो मुखं सर्वधर्माणामाद्यनुत्पन्नत्वात्॥
(हेवज्रतन्त्र, हेवज्रसर्वतन्त्रमुद्रणपिण्डार्थ, श्लोक - ९३)

ओंकार सभी धर्मों का मुख है, क्योंकि यह सभी धर्मों का उत्पत्ति स्थान है।

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि किसी को नहीं मानता और उनकी पूजा नहीं करता।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् तथागत बुद्ध बोधिसत्व वज्रगर्भ से कहते हैं -

ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्ररुद्राश्च वैवस्वत विनायकः।
नैर्ऋतिर्वेमचित्री च गौर्यादीनां तु विष्टरम्॥

(हेवज्रतन्त्र, हेवज्राभ्युदय, श्लोक - ३७)

ब्रह्मा, इन्द्र, उपेंद्र (विष्णु), रुद्र (महेश), वैवस्वत (यम), विनायक (गणेश), नैर्ऋति, वेमचित्री ये सब गौरी के आसन हैं।

श्रीदेवी के सिंहासन के रूप में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव का तात्विक वर्णन सनातन धर्म भी करता है।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः।
एते पञ्चमहाप्रेता: स्थिता: सिंहासनादधः॥
(महाकालसंहिता)

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मूर्तिपूजा आदि पाखण्ड है, ग्रहों की पूजा अंधविश्वास है।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् चण्डमहारोषण भगवती द्वेषवज्री से कहते हैं -

एवं वेणुमयं गन्धर्वं साधयेत्, वाल्मीकमृण्मयं गरुडं, देवदारुमयान् देवान् ब्रह्मविष्णुमहेश्वरेन्द्रकामदेवादीन्...... एवं सूर्यं चन्द्रं मङ्गलं बुधं बृहस्पतिं शुक्रं शनैश्चरं राहुं केतुं च नवग्रहम्॥
(श्रीचण्डमहारोषणतन्त्र, द्वादश पटल, श्लोक - १७-१८)

इस प्रकार बांस के बने हुए गन्धर्व, दीमक की बाम्बी की मिट्टी के बने गरुड़, देववृक्षों (देवदार, पीपल, आम, नीम, बरगद, पलाश, शमी आदि) की लकड़ी के बने हुए ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, कामदेव आदि ..... और इसी प्रकार से सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु की साधना करे।

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मैं स्वर्ग नरक आदि में विश्वास नहीं करता हूँ। देवी देवता नहीं होते हैं।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् मैत्रेय बुद्ध का शारिपुत्र आदि के प्रति उपदेश -

देवानां दिवि दिव्यदुन्दुभिरवो यद्वत् स्वकर्मोद्भवो।
धर्मोदाहरणं मुनेरपि तथा लोके स्वकर्मोद्भवम्॥
(महायानोत्तरतन्त्रशास्त्र, कृत्यक्रियाधिकार, श्लोक - ३४)

देवताओं का स्वर्ग में दिव्यदुन्दुभि का स्वर जैसे उनके अपने कर्मों के प्रभाव से जन्य है, उसी प्रकार भगवान् के धर्म का घोष भी लोक में उनके अपने कर्मों के ही कारण है।

गुरुभक्ति से रहित, अयोग्य, रहस्य को अनधिकारी के समक्ष प्रकाशित करने वाले शिष्य की गति भगवान् चण्डमहारोषण भगवती द्वेषवज्री से कहते हैं -

यमदूतैस्ततो ग्रस्तः कालपाशवशीकृतः।
नरकं नीयते पापी यदि बुद्धैरपि रक्षितः॥
यदि कर्मक्षयाद्दुःखं भुक्त्वा च लक्षवत्सरम्।
मानुष्यं प्राप्यते जन्म तत्र वज्रेण भिद्यते॥
(श्रीचण्डमहारोषणतन्त्र, तन्त्रावतार पटल, श्लोक - १३-१४)

यमदूतों के द्वारा पकड़े जाने बाद कालपाश में बंधकर वह पापी नरक में ले जाया जाता है। यदि साक्षात् बुद्ध भी चाहें तो उसकी रक्षा नहीं कर सकते। उसके बाद नरक में उस दुःख को एक लाख वर्षों तक भोगने पर जब कर्मक्षय होता है, और यदि मनुष्य जन्म में आ जाता है तब भी यहां उसके ऊपर वज्रपात हो जाता है।

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मैं ध्यान, योग आदि में विश्वास नहीं करता। विचित्र आकृति वाले देवी देवताओं का ध्यान अंधविश्वास है।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् सर्वतथागत कायवाक्चित्त वज्राधिपति वज्रधर ने तथागत अक्षोभ्यवज्र, तथागत वैरोचनव्रज, तथागत अमितायुवज्र, तथागत रत्नकेतुवज्र, एवं तथागत अमोघसिद्धिवज्र को इसी जन्म में बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए जिन देवताओं के जिस रूप के ध्यान का उपदेश किया, उनमें से एक उदाहरण देखें -

हयग्रीवं महाक्रोधं कल्पोद्दाहमिवोद्भवम्।
त्रिमुखं दुष्टपदाक्रान्तं भावयेद्योगभावतः॥
(श्रीगुह्यसमाजतन्त्र, त्रयोदश पटल, श्लोक - ९८)

कल्पों को दहन करने के समान तेज से युक्त, महाक्रोधयुक्त तीन मुखों से युक्त, दुष्टों को पैरों के नीचे रौंदते हुए, भगवान् हयग्रीव का योगबल से ध्यान करना चाहिए।

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - मैं पुनर्जन्म आदि में विश्वास नहीं करता हूँ। देवताओं की पूजा, हवन आदि पाखण्ड है। भूत और भविष्य की घटनाओं को जानने का दावा करने वाले अंधविश्वासी हैं।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् कृष्णयमारि ने मैत्रेय आदि सर्वतथागत बुद्धों को उपदेश करते हुए कहा -

दुष्टमैत्री सदा त्याज्याऽधर्मं नैव प्रमाणयेत्।
श्राद्धसत्वं न वै वञ्चेत् समयान्सेवयेत् सदा॥
स्त्रीणां प्रज्ञास्वभावानां दूषणाद्दोष एव च।
भिक्षां नैवभ्रमेद्योगी योगं नैव विवर्जयेत्॥
(श्रीकृष्णयमारितन्त्र, सप्तदश पटल, १५-१६)

योगी को चाहिए कि दुष्टों से मित्रता करना छोड़ दे, अधर्म को प्रमाण मानकर आचरण न करे, श्रद्धायुक्त कर्म से वञ्चित न रहे और समयानुसार इन्द्रियों का संयमन करे। स्त्रियों एवं विद्वानों की निंदा न करें क्योंकि इससे दोष लगता है। केवल भिक्षा मांगने के लिए ही भ्रमण न करे, साथ ही योगाभ्यास का कभी परित्याग न करे।

भगवान् शाक्यमुनि गौतम बुद्ध उपदेश करते हैं -
प्रतिसेनां यथादर्शे कुमारी पश्येदवस्तुजाम्।
अतीतानागतं धर्मं तत्वयोग्यम्बरे तथा॥
(कालचक्रतन्त्र, षडङ्गयोगप्रकरण, श्लोक - ०६)

जैसे आईने में कुमारी अपनी प्रतिसेना में अनेक अप्रत्यक्ष वस्तुओं को देखती हैं, जहां वस्तुतः कोई पदार्थ नहीं होता है, वैसे ही योगीजन भी आकाश में अतीत (भूतकाल) एवं अनागत (भविष्य) के पदार्थों को देखते हैं।

(प्रतिसेनावतार तन्त्र में आईना, खड्ग, अंगूठा, दीपक, चन्द्र, सूर्य, जल, कुण्ड एवं नेत्र आदि आठ पदार्थों को प्रतिसेना कहा गया है)

दुःखाद्धातुक्षयः पुंसां क्षयान्मृत्यु रिति स्मृतः।
मृत्यो: पुनर्भवस्तेषां भवान्मृत्युश्च्युतिः पुनः॥
(कालचक्रतन्त्र, मलप्रकरण, नरोत्तमपादविरचिता सेकोद्देशटीका, श्लोक - ११-१२)

दुःख से धातुक्षय, धातुक्षय से मृत्यु होती है। मृत्यु से पुनर्जन्म होता है और पुनर्जन्म के बाद फिर मृत्यु और उससे च्युति (पतन) होती है।

भगवान् शाक्यमुनि गौतम बुद्ध ने दीपङ्कर बुद्ध के द्वारा पूर्वकाल में दिए गए मन्त्रोपदेश को शम्भलपुर के राजा सुचन्द्र के अनुरोध पर उन्हें देवताओं के पूजन की विधि का उपदेश करते हुए जो कहा, उसपर बौद्ध विद्वान् नरोत्तमपाद (नारोपापाद) की टीका देखें -

सर्वेषां नामपूर्वं प्रणवं देयम्। अर्चने सर्वकर्मणि नमोऽन्ते नाम्नो भवति। प्रत्येकं कर्मणि पुष्ट्यादौ स्वाहान्तो वेदितव्य इति।
(कालचक्रतन्त्र, दीक्षाप्रकरण)

सभी देवताओं के नाम से पहले ॐ लगाना चाहिए। पूजा के अवसर में नामों के अन्त में नमः लगाना चाहिए। प्रत्येक पुष्टि कर्म में स्वाहा लगाना होता है।

(नेपाल के अभिलेखागार में स्थित देववर्मा के द्वारा लिखित सिद्धचरितम् की हस्तलिखित प्रति के अनुसार नरोत्तमपाद चौरासी बौद्ध सिद्धों में एक हैं। ये कश्मीरी ब्राह्मण थे एवं वहां के राजपुरोहित भी थे। इनका नाम बौद्ध गुरु तिलिप्पा से दीक्षा लेने बाद नारोपापाद हो गया था। कहीं कहीं लोग इन्हें शुभवर्मा नामक राजा के पुत्र अथवा कुछ लोग शूद्रवर्ण के व्यक्ति के रूप में भी जानते हैं)

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - सभी लोग समान हैं, वर्णव्यवस्था एवं जातिव्यवस्था काल्पनिक और अंधविश्वास से भरी हुई है।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - मायापुत्र चण्डरोषण को भगवती प्रज्ञापारमिता, जातियों का वर्णन करते हुए उपदेश करती हैं -

ब्राह्मणी क्षत्रिणी वैश्या शूद्री चात्यन्तविस्तरा।
कायस्थी राजपुत्री च शिष्टिनी कर-उत्तिनी॥
वणिजिनी वारिणी वेश्या च तरिणी चर्मकारिणी।
कुलत्रिणी हत्रिणी डोम्बी चाण्डाली शवरिणी तथा॥
धोबिनी शौण्डिनी गन्धवारिणी कर्मकारिणी।
नापिती नटिनी कंसकारिणी स्वर्णकारिणी॥
कैवर्ती खटकी कुण्डकारिणी चापि मालिनी।
कापालिनी शंखिनी चैव वरुडिनी च केमालिनी॥
गोपाली काण्डकारी च कोचिनी च शिलाकुटी।
थपतिनी केशकारी च सर्वजातिसमावृता॥
(श्रीचण्डमहारोषणतन्त्र, स्वरूपपटल, श्लोक - ०४-०९)

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियां हैं। इसके अतिरिक्त विस्तार में समझने के लिए कुछ उदाहरण हैं - कायस्थ, राजपुत्र (राजपूत आदि), ...... वेश्या ..... चमार .... डोम .... चाण्डाल .... शबर (वनवासी) ..... धोबी .... इत्र का काम करने वाले गन्धी, लोहार, नाई, अभिनय करने वाले नट, कांसे का काम करने वाले ठठेरा, सुनार, मल्लाह-केवट, खटीक, खुदाई करने वाले खनिक, माली ..... ग्वाला, शस्त्र बनाने वाले कर्मकार/कर्माकर, पत्थर तोड़ने वाले..... कुशियार .... आदि आदि सभी जातियां हैं। (यहां जाति शब्द के कारण एवं देवीरूप से व्याख्या होने से सभी जातियों के स्त्रीलिंग नाम श्लोक में वर्णित हैं)

नवबौद्ध अम्बेडकरवादी - धर्म कुछ नहीं है। धर्म केवल काल्पनिक है और अंधविश्वास है।

बुद्धवाक्यों से खण्डन - भगवान् तथागत मैत्रेय बुद्ध धर्म की दुर्गम्यता को बताते हुए उपदेश करते हैं -

यथा सूक्ष्मान् शब्दाननुभवति न श्रोत्रविकलो,
न दिव्यश्रोत्रेऽपि श्रवणपथमायान्ति निखिलम्।
तथा धर्मः सूक्ष्मः परमनिपुणज्ञानविषयः,
प्रयात्येकेषां तु श्रवणपथमक्लिष्टमनसाम्॥
(महायानोत्तरतन्त्रशास्त्र, कृत्यक्रियाधिकार, श्लोक - ४१)

जैसे कान खराब हो जाने पर व्यक्ति सूक्ष्म शब्दों को नहीं सुन सकता, और दिव्य कान के होने और भी सभी विषय नहीं सुने जाते सकते। (रूप, रस, गन्ध आदि अश्रौत विषयों को दिव्य कान भी ग्रहण नहीं करते) उसी प्रकार धर्म अत्यंत सूक्ष्म है, अत्यंत निपुण व्यक्ति को ही इसका ज्ञान हो सकता है। यह वस्तुतः अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि एवं शान्त मन वालों के द्वारा ही सुना और समझा जा सकता है।

यावजीवम्पि चे बालो पण्डितं पायिरुपासति।
न सो धम्मं विजानाति दब्बी सूप रसं यथा॥
मुहूत्तमपि चे विञ्ञू पण्डितं पयिरुपासति।
खिप्पं धम्मं विजानाति जिव्हा सूपरसं यथा॥
(धम्मपद, बाल-वग्गो, श्लोक - ०५-०६)

भगवान् शाक्यमुनि गौतम बुद्ध उपदेश करते हैं -
मूर्ख व्यक्ति चाहे जन्मभर पण्डितों की संगति में रहे, वह सच्चे धर्म को नहीं जान सकता, जैसे कड़छी दाल में डूबी रहकर भी उसके स्वाद को नहीं जानती। बुद्धिमान् व्यक्ति चाहे मुहूर्तमात्र के लिए भी पण्डितों की संगति में रहे, वह सच्चे धर्म को जान लेता है, जैसे जिह्वा दाल के स्वाद को।

यहाँ एक छोटी शंका हो सकती है कि जब गौतम बुद्ध स्वयं भगवान् विष्णु के ही अवतार हैं, तब उनके इतने जन्मों का वर्णन क्यों है ? इसका उत्तर है कि अर्जुन भी नारायणभ्राता नर के अवतार थे किन्तु पराशर संहिता में उनके भी विजयसंज्ञक पूर्वजन्म का वर्णन है। भगवान् नारद जी भी विष्णु के अवतार हैं, किन्तु गन्धर्वकुल, शूद्रकुल आदि में उनके पूर्वजन्म का वर्णन श्रीमद्भागवत में वर्णित है। आवेशावतार, अंशावतार आदि में ऐसा होना सामान्य बात है, क्योंकि इनमें जीवांश भी होता है जो कर्मप्रारब्ध का निर्माण करता है। 

उपर्युक्त सभी ग्रंथों को बौद्धों के सर्वोच्च धर्मगुरु दलाई लामा समेत सभी मान्य प्राचीन एवं नवीन बौद्ध विद्वानों का पूर्ण समर्थन और प्रामाणिकता प्राप्त है। चौदहवें दलाई लामा तो कालचक्रतन्त्र आदि के प्रचार प्रसार और अनुसरण में ही पूरा जीवन लगा दे रहे हैं। बुद्ध के नाम पर देश में वैमनस्य एवं धर्मद्रोह की शृंखला प्रारम्भ करने वाले राजनैतिक गृद्धों को यदि भगवान् शाक्यमुनि गौतम, मैत्रेय, यमारि, अमिताभ बुद्ध आदि के ही उपदेशों के शास्त्रोक्त प्रारूप के अध्ययन का अवसर मिल जाये तो उनका कुछ कल्याण ही होगा। अंत मैं नारायण कवच के वचन के अनुसार यह प्रार्थना करता हूँ कि भगवान् विष्णु के अवतार सभी बुद्ध पाखण्ड एवं आलस्य से हमारी रक्षा करें - बुद्धस्तु पाखण्डगणात्प्रमादात्॥

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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