ॐ_पूर्णमद_पूर्णमिदम्



ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
                           *१*
अदः --- वह कारण ब्रह्म सत् (नामरूप के विभाग के अयोग्य  अर्थात् सूक्ष्मचिदचित् विशिष्ट ब्रह्म) #पूर्ण हैं।
 #इदम्:---- यह दृश्यमान जगत् (कार्यरूपब्रह्म /स्थूल चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म  
 पूर्णम = पूर्ण हैं।
पूर्णात् :---पूर्ण कारण से 
पूर्णम् :--- पूर्ण कार्य 
उदच्यते:---- उत्पन्न (प्रगट) होता है।
पूर्णस्य:---पूर्ण कारण (ब्रह्म )के
पूर्णम्आदाय :---पूर्ण कार्य को लीन करके।
पूर्णमेव:----पूर्ण ही।
अवशिष्यते :----शेष रहता है।
                     *२.*
#अदः ---त्रिपाद्विभूति में विद्यमान पर वासुदेव परब्रह्म ।
#पूर्णम् ---पूर्ण हैं।
#इदम्  :----हृदयस्थ अंतर्यामी ।
#पूर्णम् :-- पूर्ण हैं।
#पूर्णात् :-----पूर्ण परमात्मासे              #पूर्णम्  :---पूर्णव्यूह (वासुदेव , संकर्षण ,प्रद्युम्न, अनिरुद्ध )                                #उदच्यते ::-प्रादुर्भूतहोतेहैं।               #पूर्णस्य ::---पूर्ण परमात्माके               #पूर्णम्  ::---रामकृषणादि पूर्णअवतारोंको 
#आदाय:---अपने हेतु (उपास्य) रूपसे स्वीकार करके।
#पूर्णमेव ::--अर्चावतार ही ।
#अवशिष्यते ::---सर्व सुलभ होने से प्रधान रूपसे शेष रहते हैं।        श्रीरामः!

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