शिव लिंग का वैज्ञानिक रूप

शिवलिंग का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य...
शिवलिङ्ग (शिवलिंग), का अर्थ है भगवान शिव का आदि-
अनादी स्वरुप । शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड
और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा
गया है।
स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है।
धरती उसका पीठ या आधार है और सब
अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे
लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती
धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान
है) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है।
The whole universe rotates through a shaft called
shiva lingam.
पुराणो में शिवलिंग को कई अन्य नामो से भी संबोधित किया
गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/
लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग |
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति
(पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है
तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक
भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल
प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है |
हम जानते है की सभी भाषाओँ में एक
ही शब्द के कई अर्थ निकलते है
जैसे: सूत्र के - डोरी/धागा गणितीय सूत्र,
कोई भाष्य, लेखन को भी सूत्र कहा जाता है जैसे
नासदीय सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि | अर्थ :- सम्पति,
मतलब (मीनिंग), उसी प्रकार यहाँ लिंग
शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी या प्रतीक
है। ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा
और प्रदार्थ |
हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा
है| इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का
प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है | ब्रह्मांड में
उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में
शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है |
अब जरा आईसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर
परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत
ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी
विध्वंसक थी सब जानते है | e / c = m c {e=mc²}
.इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है
अर्थात दो नही एक ही है पर वो दो हो
कर स्रष्टि का निर्माण करता है . हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो
साल पहले ही ख़ोज लिया था |
हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते
है की जब भी किसी स्थान पर
अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल
स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा उपर व निचे
की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं (आठों दिशों
की प्रत्येक डिग्री (360
डिग्री)+ऊपर व निचे ) होता है, फलस्वरूप एक
क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती
है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप , शांत जल में कंकर
फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) का प्रतिरूप आदि ।
स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट(bigbang) के पश्चात् उर्जा का
प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व निचे की ओर हुआ
फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ जैसा
की आप आकाशगंगा के चीत्र में
भी देख सकते है. जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण,
शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है की
आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) तथा की
देवता आदि मिलकर भी उस लिंग के आदि और अंत का
छोर या शास्वत अंत न पा सके ।
पुराणो में कहा गया है की प्रत्येक महायुग के पश्चात
समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित (लय) होता है
तथा इसी से पुनः सृजन होता है । शिवलिंग के
महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य
किसी तीर्थ की मृत्तिका से
शिवलिंग बना कर उनका विधि- विधान के साथ पूजा करता है, वह
शिवस्वरूप हो जाता है।
शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या,
ज्ञान,सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की
प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा
होती है, वह तीर्थ न होने पर
भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर
सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर
मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य
समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण
शुद्ध हो जाता है।
दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग
दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।
तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्।
नैतस्मादपरंकिंचित् तारकंब्रह्म सर्वथा॥

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