शिव शब्द रहस्य
#शिव_शब्द_रहस्यम्
'शिव' शब्द तो अव्युत्पन्न है। शिव शब्द का अर्थ रूढ है। व्युत्पत्तिगम्य नहीं है। शिव का अर्थ है जो क्रियाशून्य हो, अज्ञेय हो तथा दृश्य जगत् से अपरिच्छिन्न हो। शिव तो न कर्ता है और न धर्ता है। वह तो शुद्ध ब्रह्म है और उन्हीं योगियों के ज्ञान का विषय बनता है जिन योगियों का चित्त अत्यन्त शुद्ध है।
यजुर्वेद की रुद्राष्टाध्यायी में वर्णित रुद्रदेव इसी आदि शिव के व्यक्त स्वरूप हैं। कभी कभी हम शास्त्रों में पढ़ते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव तीनों ही सृष्टिकर्ता हैं किन्तु ये तीनों मिलकर सृष्टि नहीं करते। शिव ही जब ब्रह्मा का रूप धारण करता है तो सृष्टि करता है वही शिव जब विष्णु का रूप धारण करता है तो सृष्टि का पालन करता है और जब रुद्र - शिव का रूप ग्रहण करता है तो संहार करता है। शिव के स्वरूप में तीन आंखें हैं, गले में नागमाला है, तथा मस्तक से गंगा की धारा प्रवाहित होती है। शिव का ही दूसरा स्वरूप 'पंचमुखी' है। इस पंचमुखी शिव का स्वरूप अत्यन्त प्रकाशमान है। शिव के जितने स्वरूप हमारे शास्त्रों में प्राप्त होते हैं उनमें केवल लिङ्गमूर्ति ही स्वरूपतः प्राप्त नहीं होती अपितु शिव के अनेक अन्य मूर्तिनाम प्राप्त होते हैं, जैसे कैलासेश्वर, नीलकण्ठ महादेव, भगवान् शङ्कर, महाकालेश्वर तथा विश्वनाथ।
वास्तव में सदाशिव के स्वरूप में कोई आकार नहीं होता। सृष्टि के पहले एक प्रकाशमान हिरण्यगर्भ अण्डा प्रकट होता है। यह अनोखा अण्डा अपने में समस्त सृष्टि को समाहित रखता है। उस समय समस्त विश्व एक अण्डे के आकार का रहता है और समस्त विश्व प्रलय काल में भी अण्डे के आकार में परिणत हो जाता है। इस हिरण्यगर्भ अण्डे पर ध्यान करने से सारे पूर्वजन्मों के संस्कार नष्ट हो जाते हैं। यह ज्योतिर्लिङ्ग सदाशिव का ही पर्यायवाचक है। इस सदाशिव स्वरूप अण्डे पर ध्यान जमाना तथा इसका प्रत्यक्ष दर्शन करना प्रायः असंभव है। इसलिए उस प्रकाशमान ज्योतिर्लिङ्ग का प्रतिनिधान करने वाला एक पार्थिव लिङ्ग पूजा के लिए ग्रहण किया जाता है।
टिप्पणियाँ