चन्दन के प्रकार
*चंदन कितने प्रकार का होता है ?
लाल चंदन, रक्तचंदन, सफेद चंदन, पीला चंदन, शबर चंदन, पतंग चंदन, पर्वर चंदन एवं हरि चंदन ।
रक्तचंदन के क्या उपयोग हैं ?
१. गायत्री मंत्र के उपासकों के लिए उपयुक्त : ‘रक्तचंदन मूलतः ही तेजोमय है, इसलिए गायत्री मंत्र के उपासकों के लिए इसका उपयोग लाभकारी है ।
२. काले शक्तिबीजों के नाश के लिए उपयुक्त : रक्तचंदन के लेप से जीव की सूर्यनाडी कार्यरत होती है एवं उसके शरीर में तेजकणों की वृद्धि होती है । यह बढा हुआ तेज जीव की आत्मशक्ति जाग्रत कर उसके शरीर में विद्यमान काले शक्तिबीजों का नाश करता है ।
३. संकट दूर करने के लिए जिस देवता की मनौती मांगी गई है, उन्हें लेप करना : परिवार का संकट दूर करने के लिए देवता से मनौती मांगी जाती है । उस समय उन्हें रक्तचंदन का लेप लगाकर उनमें विद्यमान पृथ्वी एवं तेज के संयोग से कार्यरत सगुण तत्त्व जाग्रत किया जाता है तथा उस तत्त्व की सहायता से इच्छित अनिष्ट परिणामों को नष्ट कर परिवार को संकटमुक्त करने का प्रयत्न किया जाता है ।
४. वास्तु की अनिष्ट शक्तियों से रक्षा हेतु आसरा (एक कनिष्ठ देवी) एवं स्थानदेवता की प्रतिमाओं को लेप करना : आसरा एवं स्थानदेवता की प्रतिमाओं को रक्तचंदन का लेप लगाकर प्रार्थना करनेपर उनका तेजतत्त्वरूपी शक्तितत्त्व जाग्रत होकर वास्तु में संचार करनेवाली अनिष्ट शक्तियों को नियंत्रित किया जाता है ।
५. त्वचापर दिखाई देनेवाले करनी के लक्षणोंपर लेप लगाना : साधारणतः मारण कर्म में रक्तचंदन का उपयोग किया जाता है । करनी के (टिप्पणी) कष्ट में शरीरपर लाल फुन्सियां उभरना, गुणाकार का चिह्न उभरना, स्त्री की आकृति उभरना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं । शरीर के उस भागपर रक्तचंदन का लेप लगाने से करनी के ये लक्षण घटकर त्वचा में विद्यमान काली शक्ति के बीज नष्ट होने में सहायता मिलती है ।’
टिप्पणी १ – गुडिया, नींबू, टाचनी इत्यादि घटकों को माध्यम बनाकर उसपर विशिष्ट मंत्र का प्रयोग कर काली शक्ति व्यक्ति की ओर प्रक्षेपित कर उसे कष्ट पहुंचाने का प्रयास किया जाता है ।
चंदन को घिसते समय हलदी-कुमकुम का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए ?
चंदन को घिसते समय उसमें हलदी-कुमकुम मिलाने से, हलदी एवं कुमकुम से प्रक्षेपित रजोगुणी तरंगों के कारण तथा कुमकुम से प्रक्षेपित तेजतत्त्व के कणों के कारण, चंदन के सत्त्वकणों का विघटन होता है । इससे चंदन की सात्त्विकता नष्ट हो जाती है, अर्थात् हलदी एवं कुमकुम के कारण चंदन रजोगुणी बनता है । चंदन को घिसने की घर्षण प्रक्रिया से हलदी एवं कुमकुम के रजकणों की गतिविधि को वेग प्राप्त होता है तथा चंदन में शेष सात्त्विक कणों का भी ह्रास हो सकता है । इस कारण चंदन घिसते समय, उसमें हलदी-कुमकुम नहीं मिलाना चाहिए ।’*
टिप्पणियाँ