पितृ श्राद्ध अधिकारी

*श्राद्ध/पितर कर्म के अधिकारी*


पिताका श्राद्ध करनेका अधिकार मुख्यरूपसे पुत्रको ही है। कई पुत्र होनेपर अन्त्येष्टि से लेकर एकादशाह तथा द्वादशाहतक की सभी क्रियाएँ ज्येष्ठ पुत्रको करनी चाहिये। विशेष परिस्थितिमें बड़े भाईकी आज्ञासे छोटा भाई भी कर सकता है। यदि सभी भाइयों का संयुक्त परिवार हो तो वार्षिक श्राद्ध भी ज्येष्ठ पुत्रके द्वारा एक ही
जगह सम्पन्न हो सकता है। यदि पुत्र अलग-अलग हों तो उन्हें वार्षिक आदि श्राद्ध अलग-अलग करना चाहिये।

*मृते पितरि पुत्रेण क्रिया कार्या विधानतः ।*
*बहवः स्युर्यदा पुत्राः पितुरेकत्रवासिनः ॥*
*सर्वेषां तु मतं कृत्वा ज्येष्ठेनैव तु यत्कृतम् ।*
*द्रव्येण चाविभक्तेन सर्वैरेव कृतं भवेत् ॥(वीरमित्रोदय श्रा०प्र०में मरीचिका वचन)*
*(ख) एकादशाद्या:क्रमशो ज्येष्ठस्य विधिवत् क्रियाः ।*
*कुर्युनकैकश:श्राद्धमाब्दिकं तु पृथक् पृथक्॥(वीरमित्रोदय श्रा०प्र०में प्रचेताका वचन)*


यदि पुत्र न हो तो शास्त्रोंमें श्राद्धाधिकारीके लिये विभिन्न व्यवस्थाएँ प्राप्त हैं। स्मृतिसंग्रह तथा श्राद्धकल्पलताके अनुसार श्राद्धके अधिकारी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र (पुत्रीका पुत्र), पत्नी, भाई, भतीजा,
पिता, माता, पुत्रवधू, बहन, भानजा, सपिण्ड (स्वयंसे लेकर पूर्वकी सात पीढ़ीतकका परिवार)
 तथा सोदक (आठवींसे लेकर चौदहवीं पीढ़ीतकके पूर्वज परिवार) कहे गये हैं-इनमें पूर्व-पूर्वके न रहनेपरक्रमशः बादके लोगोंका श्राद्ध करनेका अधिकार है-

*मूलपुरुषमारभ्य सप्तमपर्यन्तं सपिण्डाः, अष्टममारभ्य चतुर्दशपुरुषपर्यन्तं सोदकाः, पञ्चदशमारभ्य एकविंशतिपर्यन्तं सगोत्राः ।पित्रादयस्त्रयश्चैव तथा तत्पूर्वजास्त्रयः॥*
*सप्तमः स्यात्स्वयं चैव तत्सापिण्ड्यं बुधैःस्मृतम् ।* *सापिण्ड्यं सोदकं चैव सगोत्रं तच्च वै क्रमात् ॥*
*एकैकं सप्तकं चैकं सापिण्ड्यकमुदाहृतम् ॥ (लघ्वाश्वलायनस्मृति २०।८२-८४)*
*पुत्रः पौत्रश्च तत्पुत्रः पुत्रिकापुत्र एव च ।*
*पत्नी भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा ॥*
*भगिनी भागिनेयश्च सपिण्ड: सोदकस्तथा ।*
*असन्निधाने पूर्वेषामुत्तरे पिण्डदाः स्मृताः ॥ (स्मृतिसंग्रह, श्राद्ध०कल्प०।*


विष्णुपुराणके वचनके अनुसार पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भतीजा अथवा अपनी सपिण्ड संततिमें उत्पन्न हुआ पुरुष ही श्राद्धादि क्रिया करनेका अधिकारी होता है। यदि इन सबका अभाव हो तो समानोदककी संतति अथवा मातृपक्षके सपिण्ड अथवा समानोदक को इसका अधिकार है। मातृकुल और पितृकुल दोनों के नष्ट हो जानेपर स्त्री ही इस क्रियाको करे अथवा (यदि स्त्री भी न हो तो) साथियोंमेंसे ही कोई करे या बान्धवहीन मृतकके धनसे राजा ही उसके सम्पूर्ण पितरकर्म कराये-

*पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रो वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः ।* *सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियाहॊ नृप जायते॥*
*तेषामभावे सर्वेषां समानोदकसन्ततिः ।* *मातृपक्षसपिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा॥*
*कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभिः कार्याः क्रिया नृप॥*
*सङ्घातान्तर्गतैर्वापि कार्याः प्रेतस्य च क्रियाः ।*
*उत्सन्नबन्धुरिक्थाद्वा कारयेदवनीपतिः ॥ (विष्णुपु० ३।१३।३०-३३)*

हेमाद्रिके अनुसार पिताकी पिण्डदानादि सम्पूर्ण क्रिया पुत्रको ही करनी चाहिये। पुत्रके अभावमें पत्नी करे और पत्नीके अभावमें सहोदर भाईको करनी चाहिये।

*पितुः पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया ।*
*पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्न्यभावे तु सोदरः ॥ (हेमाद्रिमें शंखका वचन)*

मार्कण्डेयपुराणने बताया है कि चूंकि राजा सभी वर्गों का बन्धु होता है। अतः सभी श्राद्धाधिकारी जनोंके अभाव होनेपर राजा उस मृत व्यक्तिके धनसे उसके जातिके बान्धवोंद्वारा भलीभाँति दाह आदि सभी और्ध्वदेहिक क्रिया कराये-

 *सर्वाऽभावे तु नृपतिः कारयेत् तस्य रिक्थतः ।*
*तज्जातीयेन वै सम्यग् दाहाद्याः सकलाः क्रियाः॥*
*सर्वेषामेव वर्णानां बान्धवो नृपतिर्यतः ।। (मार्कण्डेयपुराण, श्राद्धकल्पलता)*

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