शिव नैवेद्य निर्णय 2

हरि: ओम्,

शिवनैवेद्य भक्षण निर्णय

आज महाशिवरात्रि के पुण्य अवसर पर शिवनैवेद्य भक्षण सम्बन्धि विचार प्रस्तुत करते हैं।

पूर्वकाल में ऋषियों को भी शिवनैवेद्य भक्षण सम्बन्धि शङ्का हुई थी तो सूतजी ने उसका निवारण किया था।

ऋषयः ऊचुः
अग्राह्यं शिवनैवेद्यमिति पूर्वं श्रुतं वचः
ब्रूहि तन्निर्णयं बिल्वमाहात्म्यमपि सन्मुने।। १ ।।

​ऋषिगणों ने कहा — हमने सुना है ​कि शिवनैवेद्य अग्राह्य है। अत: हे मुने! उस नैवेद्य के विषय में निर्णय तथा बिल्व महात्म्य के विषय में आप ही हमें कुछ बतायें।

सूत जी ने जो निर्णय दिया था उसमे जो मुख्य बातें कही वह यह है। 

यद्गृहे शिवनैवेद्यप्रचारोपि प्रजायते
तद्गृहं पावनं सर्वमन्यपावनकारणम्।। ६ ।।

जिस घर शिव नैवेद्य पहुंच जाता है वह घर भी महापवित्र है एवं वह दूसरे घर को भी महापवित्र करने में समर्थ होता है। अर्थात उस घर की पवित्रता से आस पास के घर भी पवित्र हो जाते हैं। 

आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा
भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरणपूर्वकम्।। ७ ।।

शिव के नैवेद्य को आया देखकर उसे शिर पर धारण करना चाहिए तथा परम प्रसन्नता से शिव का स्मरण करते हुए प्रयत्न पूर्वक उसका भक्षण करना चाहिए। उसमें किंचित भी विलम्ब नहीं करना चाहिए।

जो शिवदीक्षा से युक्त हैं उनके लिए तो यह महाप्रसाद है। उनके लिए सभी लिङ्गों का नैवेद्य भक्षण योग्य है किन्तु जो अन्य देवताओं में दीक्षित हैं उनके लिए —

शालग्रामोद्भवे लिंगे रसलिंगे तथा द्विजाः
पाषाणे राजते स्वर्णे सुरसिद्धप्रतिष्ठिते।। १३ ।।
काश्मीरे स्फाटिके रात्ने ज्योतिर्लिंगेषु सर्वशः
चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शंभोर्नैवेद्यभक्षणम्।। १४ ।।
ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत्
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति।। १५ ।।

हे द्विजो! शालीग्राम से उत्पन्न लिङ्ग, पारदलिङ्ग, पाषाणलिङ्ग, रजत एवं सुवर्णलिङ्ग, देवताओं तथा सिद्धों के द्वारा प्रतिष्ठितलिङ्ग, काश्मीर में बने लिङ्ग, स्फटिकलिङ्ग, रत्नों से बने लिङ्ग तथा ज्योतिर्लिङ्ग आदि सभी ​लिङ्गों का नैवेद्य भक्षण चान्द्रायण व्रत के समान फल देने वाला है।

चंडाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवैः
चंडाधिकारो नो यत्र भोक्तव्यं तच्च भक्तितः।। १६ ।।
बाणलिंगे च लौहे च सिद्धे लिंगे स्वयंभुवि
प्रतिमासु च सर्वासु न चंडोधिकृतो भवेत्।। १७ ।।

इसके अतिरिक्त यह कहा है कि जहां चण्ड का अधिकार न हो ऐसे लिङ्गों के नैवेद्यग्रहण में दोष नहीं यथा बाण​लिङ्ग, लौहलिङ्ग, सिद्धलिङ्ग व स्वयंभूलिङ्ग में तथा शिवप्रतिमा में चण्डाधिकार न होने से इनका नेवैद्य भी ग्राह्म है। 

अग्राह्यं शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम्
शालग्रामशिलासंगात्सर्वं याति पवित्रिताम्।। १९ ।।

इसप्रकार देखें तो मात्र मृत्तिका के शिवलिङ्ग में ही नैवेद्य अग्राह्यता का दोष प्रतीत होता है। इसके भी परिमार्जन हेतु शालग्राम स्पर्श कराकर नैवेद्य आदि ग्रहण किया जा सकता है। 

यह इस प्रकार से शिवलिङ्ग नैवेद्य ग्रहण सम्बन्धि निर्णय आपको बता दिया गया है।

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