कबित्त

ज्ञान घटै किये मूढ की संगत ,ध्यान घटै बिन धीरज लाए ।
प्रीति घटै परदेस बसे अरु ,मान घटे नित ही नित जाये।।
सोक घटै कोउ साधु की संगत ,रोग घटे कोउ औषध पाये।
"गंग" कहे सुनु शाह अकबर ,पाप कटे हरि के गुन गाये।। ( गंग कवि)

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