गोत्र
*गोत्र क्या होता है?*
*🌷गोत्रम् -🌷*
*गोत्र {गो+त्रै +कः}के अर्थ*= गौशाला, परिवार, वंश, पशुशाला, कुल ,परंपरा ,नाम, अभिधान, समूह ,समुच्चय, संघ ,वन, वृद्धि ,खेत ,सड़क, सम्पत्ति ,छाता, जाती ,श्रेणी ,वर्ग ,पर्वत ,भविष्य-ज्ञान ।
*गवतेशब्दयतिपूर्वक्पुरुषान्यत् तत्पर्य्यायः।*
*१सन्ततिः२जननम्३कुलम्४अभिजनः५अन्वयः६वंशः७अन्ववायः८सन्तानः*
सनातन धर्म में गोत्र का बहुत महत्व है। 'गोत्र' का शाब्दिक अर्थ तो बहुत व्यापक है। विद्वानों ने समय-समय पर इसकी यथोचित व्याख्या भी की है। *'गो' अर्थात् इन्द्रियां, वहीं 'त्र' से आशय है *रक्षा करना।*
*अत: गोत्र का एक अर्थ 'इन्द्रिय आघात से रक्षा करने वाले' भी होता है जिसका स्पष्ट संकेत 'ऋषि' की ओर है।*
सामान्यत: 'गोत्र' को ऋषि परम्परा से संबंधित माना गया है। ब्राह्मणों के लिए तो 'गोत्र' विशेषरूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ब्राह्मण ऋषियों की संतान माने जाते हैं। अत: प्रत्येक ब्राह्मण का संबंध एक ऋषिकुल से होता है। प्राचीनकाल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परंपरा प्रारंभ हुई। ये ऋषि हैं-अंगिरा,कश्यप,वशिष्ठ और भृगु हैं। कुछ समय उपरान्त जमदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र और अगस्त्य भी इसमें जुड़ गए। व्यावहारिक रूप में 'गोत्र' से आशय पहचान से है जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है।
कालान्तर में जब वर्ण व्यवस्था ने जाति-व्यवस्था का रूप ले लिया तब यह पहचान स्थान व कर्म के साथ भी संबंधित हो गई। यही कारण है कि ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य वर्गों के गोत्र अधिकांश उनके उद्गम स्थान या कर्मक्षेत्र से संबंधित होते हैं। 'गोत्र' के पीछे मुख्य भाव एकत्रीकरण का है किन्तु वर्तमान समय में आपसी प्रेम व सौहार्द की कमी के कारण गोत्र का महत्त्व भी धीरे-धीरे कम होकर केवल कर्मकाण्डी औपचारिकता तक ही सीमित रह गया है।
*जब गोत्र पता न हो तो ...*
ब्राह्मणों में जब किसी को अपने 'गोत्र' का ज्ञान नहीं होता तब वह 'कश्यप' गोत्र का उच्चारण करता है। ऐसा इसलिए होता क्योंकि कश्यप ऋषि के एक से अधिक विवाह हुए थे और उनके अनेक पुत्र थे। अनेक पुत्र होने के कारण ही ऐसे ब्राह्मणों को जिन्हें अपने 'गोत्र' का पता नहीं है 'कश्यप' ऋषि के ऋषिकुल से संबंधित मान लिया जाता है।
गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है। व्याकरण के प्रयोजनों के लिये पाणिनि में गोत्र की परिभाषा है *अपात्यम_पौत्रप्रभ्रति_गोत्रम्' (४.१.१६२),* अर्थात 'गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक साधु की) संतान्। गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है।
गोत्र को हिन्दू लोग लाखो हजारो वर्ष पहले पैदा हुए पूर्वजो के नाम से अपना गोत्र चला रहे हैंं जिससे वैवाहिक जटिलताएं उतपन्न नहींं हो रही हैं।
*गोत्राणितुचतुर्व्विंशतिःतथाचमनुः।*
“शाण्डिल्यःकाश्यपश्चैववात्स्यःसावर्णकस्तथा।भरद्वाजोगौतमश्चसौकालीनस्तथापरः॥कल्किषश्चाग्निवेश्यश्चकृष्णात्रेयवशिष्ठकौ।विश्वामित्रःकुशिकश्चकौशिकश्चतथापरः॥घृतकौशिकमौद्गल्यौआलम्यानःपराशरः।सौपायनस्तथात्रिश्चवासुकीरोहितस्तथा॥घैयाघ्रपद्यकश्चैवजामदग्न्यस्तथापरः।चतुर्व्विंशतिर्वैगोत्राकथिताःपूर्ब्बपण्डितैः॥” तथाचमनुः।
“जमदग्निर्भरद्वाजोविश्वामित्रात्रिगौतमाः।वशिष्ठकाश्यपागस्त्यामुनयोगोत्रकारिणः॥एतेषांयान्यपत्यानितानिगोत्राणिमन्यते॥” एतदुपलक्षणमन्येषामपिदर्शनात्।तथाच। “सौकालीनकभौद्गल्यौपराशरबृहस्पती।काञ्चनोविष्णुकौशिक्यौकात्यायनात्रेयकाण्वकाः॥कृष्णात्रेयःसाङ्कृतिश्चकौण्डिल्योगर्गसंज्ञकः।आङ्गिरसइतिख्यातःअनावृकाख्यसङ्गितः॥अव्यजैमिनिवृद्धाख्याःशाण्डिल्योवात्स्यएवच।सावर्ण्यालम्यानवैयाघ्रपद्यश्चघृतकौशिकः॥शक्त्रिःकाण्वायनश्चैववासुकीगौतमस्तथा।शुनकःसौपायनश्चैवमुनयोगोत्रकारिणः॥एतेषांयान्यपत्यानितानिगोत्राणिमन्यते॥”
*सर्व्वेचत्वारिंशद्गोत्राः।*
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