दीक्षा

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    ❗❗ *आचार्य रुद्रेश्वरन* ❗❗
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👉🏻 प्रिय पाठकों-------

दीक्षा का विषय अत्यन्त रहस्यमय, गोपनीय, परमगूढ़ तथा विस्तृत है। सदगुरू से दीक्षा प्राप्त हो जाने पर शिष्य को दिव्य शक्ति का संचार होना प्रारम्भ हो जाता है। दीक्षा शब्द दो अक्षरों दी तथा क्षा से बना है। दी का तात्पर्य देना तथा क्षा का तात्पर्य क्षरण (नष्ट) करना होता है। दीक्षा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है तथा समस्त पापों का क्षय होता है।

ये हैं दीक्षा के प्रकार

शाम्भवी दीक्षा

गुरु के दृष्टिपात मात्र से, स्पर्ष से तथा बातचीत से भी जीव को पाश्बंधन को नष्ट करने वाली बुद्धि एवं ईश्वर के चरणों में अनन्य प्रेम की प्राप्ति होती है। प्रकृति (सत, रज, तम गुण), बुद्धि, त्रिगुणात्मक अहंकार एवं शब्द, रस, रूप, गंर्ध स्पशज़् (पांच तन्मात्राएं), इन्हें आठ पाश कहा गया है। इन्हीं से शरीरादी संसार उत्पन्न होता है। इन पाशों का समुदाय ही महाचक्र या संसारचक्र है और परमात्मा इन प्रकृति आदि आठ पाशों से परे है। गुरु द्वारा दी गई योग दीक्षा से यह पाश क्षीण होकर नष्ट हो जाता है।

शाक्ती दीक्षा

गुरु योगमार्ग से शिष्य के शारीर में प्रवेश करके उसके अंत:करण में ज्ञान उत्पन्न करके जो ज्ञानवती दीक्षा देते हैं, वह शाक्ती दीक्षा कहलाती है।

मान्त्री दीक्षा
मान्त्री दीक्षा में पहले यज्ञमंडप और हवनकुंड बनाया जाता है। फिर गुरु बाहर से शिष्य का संस्कार (शुद्धि) करते हैं। शक्तिपात के अनुसार शिष्य को गुरु का अनुग्रह प्राप्त होता है। जिस शिष्य में गुरु की शक्ति का पात नहीं हुआ, उसमें शुद्धि नहीं आती, उसमें न तो विद्या, न मुक्ति और न सिद्धियां ही आती हैं.   इसलिए शक्तिपात के द्वारा शिष्य में उत्पन्न होने वाले लक्षणों को देखकर गुरु ज्ञान अथवा क्रिया द्वारा शिष्य की शुद्धि करते हैं। उत्कृष्ट बोध और आनंद की प्राप्ति ही शक्तिपात का लक्षण (प्रतीक) है क्योंकि वह परमशक्ति प्रबोधानन्दरूपिणी ही है।

                                       सम्पूर्ण---🖌
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