कैसे हुई दिव्य तेजस्वी मां दुर्गा की उत्पत्ति

कैसे हुई दिव्य तेजस्वी मां दुर्गा की उत्पत्ति?????

असुरों के अत्याचार से तंग आकर देवताओं ने जब ब्रह्माजी से सुना कि दैत्यराज को यह वर प्राप्त है कि उसकी मृत्यु किसी कुंवारी कन्या के हाथ से होगी, तो सब देवताओं ने अपने सम्मिलित तेज से देवी के इन रूपों को प्रकट किया। विभिन्न देवताओं की देह से निकले हुए इस तेज से ही देवी के विभिन्न अंग बने।

भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक के केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से स्तन, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पौरों की ऊंगलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने हैं।

फिर शिवजी ने उस महाशक्ति को अपना त्रिशूल दिया, लक्ष्मीजी ने कमल का फूल, विष्णु ने चक्र, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, वरुण ने दिव्य शंख, हनुमानजी ने गदा, शेषनागजी ने मणियों से सुशोभित नाग, इंद्र ने वज्र, भगवान राम ने धनुष, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्माजी ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह प्रदान किया।

इसके अतिरिक्त समुद्र ने बहुत उज्जवल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुंडल, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर तथा अंगुठियां भेंट कीं। इन सब वस्तुओं को देवी ने अपनी अठारह भुजाओं में धारण किया।

मां दुर्गा इस सृष्टि की आद्य शक्ति हैं यानी आदि शक्ति हैं। पितामह ब्रह्माजी, भगवान विष्णु और भगवान शंकरजी उन्हीं की शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन-पोषण और संहार करते हैं। अन्य देवता भी उन्हीं की शक्ति से शक्तिमान होकर सारे कार्य करते हैं।

पौराणिक कथा- लंका युद्ध के समय भगवान श्री रामचन्द्र जी ने ब्रहमा जी के पास रावण से युद्ध जीतने की युक्ति पूछने गये। ब्रहा जी ने राम से कहा कि मां चण्डी को प्रसन्न करके रावण का वध किया जा सकता है। राम ने मॉ चण्डी का पूजन व हवन करने के लिए दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी विजय व अमरता के लिए चण्डी पाठ आरम्भ किया। यह बात इन्द्रदेव ने पवन देव के माध्यम से श्री राम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि चण्डी पाठ यथा सम्भव पूर्ण होने दिया जाये।

इधर रावण की माया से श्री राम की हवन सामग्री से एक नीलकमल गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता सा नजर आने लगा। दुर्लभ नीलकमल की तत्काल व्यस्था हो पाना सम्भव नहीं था। तभी श्री राम को स्मरण आया कि मुझे लोग कमलनयन नवकंच लोचन कहते है। तो क्यों न एक सकंल्प हेतू एक नेत्र अर्पित कर दिया जाये। जैसे ही श्री राम ने अपने तीर से अपना नेत्र निकालना चाहा वैसे ही मॉ चण्डी प्रकट हुयी और बोली राम में प्रसन्न होकर तुम्हें विजय श्री का आशीर्वाद देती हूं।

वहीं रावण के चण्डी पाठ में यज्ञ कर रहें ब्राह्रणों की सेवा करने के लिए बालक का रूप धारण करके हुनमान जी सेवा करने लगे। निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्रणों ने हुनमान जी से वरदान मॉगने को कहा। इस पर हनुमना जी ने विनम्रता से कहा ब्राहम्ण देवता आप जिस मन्त्र से हवन कर रहें है, उसमें का एक अक्षर बदल दें यही मेरा वरदान है। ब्राहमण इस रहस्य को समझ न सकें और तथास्तु कह दिया। मन्त्र में जयादेवी भर्तिहरिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' का उच्चारण करें। यही मेरी कामना है।

भर्तिहरिणी यानि प्राणियों की रक्षा करने वाली और कारिणी का अर्थ हुआ प्राणियों को पीडि़त करने वाली जिससे देवी रूष्ट होकर रावण का सर्वनाश करने के लिए प्रतिबद्ध हो गई। हनुमान जी ने अपनी चुतरता से ''ह'' के स्थान पर ''क'' का ब्राहम्णों से उच्चारण करवाके रावण का सर्वनाश करवा दिया। सर्वप्रथम श्री रामचन्द्र जी ने शारदीय नवरात्रि की पूजा समुद्र किनारे तट पर प्रारम्भ कर दशवे दिन लंका पर विजय के लिए प्रस्थान करके विजय प्राप्त की थी।

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