आचार्य शंकर 2


आचार्य शंकर जब देश-देशान्तरों में भ्रमण कर रहे थे तब उन्हें सद्गुणों से युक्त एक श्वेत कुष्ठी ब्राह्मण मिला, जिसका सारा शरीर पके हुए सीताफल के समान चितकबरा था।

वह रोता हुआ प्रणाम करके अपना दुःख सुनाने लगा----

"हे करुणानिधे ! मैं संसार सागर में डूब रहा हूँ, मेरा उद्धार करो।" 

उससे आचार्य ने कहा-----

"तुम शरीर, इंद्रिय, प्राण आदि नहीं हो।
इनके प्रकाशक स्वयम्प्रकाश ज्योतिस्वरूप आत्मा हो।" 

ब्राह्मण ने पूछा---

"मैं ज्योतिस्वरूप सबका प्रकाशक कैसे हूँ ?" 

तब आचार्यपाद ने जो उत्तर दिया वह संवाद एक श्लोक में प्रसिद्ध है------

"किं ज्योतिस्तव भानुमानहनि मे, रात्रौ प्रदीपादिकम्।
स्यादेवं रविदीप दर्शन विधौ किं ज्योतिराख्याहि मे।।
चक्षुस्तस्य निमीलनादि समये किंधीर्धियो दर्शने ।
किं तत्राह मतोभवान्, परमकं ज्योतिस्वदस्मै प्रभो।"

( ब्राह्मण~~  ज्योति क्या है ? मुझसे कहिये।

आचार्य~~   दिन में सूर्य की ज्योति ,  रात्रि में चन्द्र,तारादिकों  की   तथा  दीपक की ।

ब्राह्मण~~    नेत्र बंद कर लेने पर किसका प्रकाश होता है ?

आचार्य~~     बुद्धि का । 

ब्राह्मण~~     हे प्रभु ! मैं कौन हूँ ?

  
आचार्य~~    तुम परम् ज्योति हो और सबका प्रकाशक हो।)

कामकोटि के जगद्गुरु 'स्वामी गोपाल गोविंद' के शिष्य 'स्वयम्प्रकाश योगीन्द्र' जी  ने इस पद्य को तत्त्वदीपन नामक व्याख्या में अवतरणिका सहित व्याख्या करते हुए लिखा है कि ----------

"सर्वज्ञ भगवान् चंद्रचूड़ शंकर के अवतार श्रीशंकराचार्य जी, जिन्होंने ८ वर्ष में चारों वेदों का अध्ययन किया, बाहरवें वर्ष में सर्व शस्त्रवित् हुए, १६ वर्ष में भाष्य लिखा, ३२ वर्ष में शिवलोक को प्राप्त किया।

ऐसे तीर्थवत् पवित्र महापुरुष तीनों लोकों को पवित्र करने के लिए विचरण करते हुए किसी ग्राम में पहुँचे।

वहां पर चितकबरे, नेत्रहीन ब्राह्मण ने  "मेरी रक्षा करो !, मेरी रक्षा करो !" कहते हुए बार-बार प्रणाम किया।

उस कुष्टी ब्राह्मण को साधन चतुष्टय सम्पन्न देखकर परम् दया से युक्त, संसार से मुक्त करने के लिए उपदेश किया।

वृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य जी से 'ज्योति-ब्राह्मण' में ऋषि ने पूछा------

"अस्तमित आदित्ये, याज्ञवल्क्य, चन्द्रमस्यास्तमिते, शान्तेऽग्नौ, शान्तायां वाचि किं ज्योति रेवायं पुरुष इति आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीति, आत्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते; पल्यते कर्म कुरुते, विपल्येतीति, कतम आत्मेति, यो यं विज्ञानमय: प्राणेषु हृदयान्तरज्योति: पुरुष:।"

सूर्यास्त होने पर किसका प्रकाश होता है ?    
चन्द्रमा का।

चन्द्रास्त होने पर किसका प्रकाश होता है ?      
अग्नि का।

अग्नि शांत होने पर ?    
वाणी का।

वाणी के शांत होने पर ?     
आत्मा का।

इस प्रकार आत्मा के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं।  वह आत्मा कैसा है ? 
जो विज्ञानमय तथा प्राणमय आदि कोषों में हृदय के अंदर स्थित पुरुष है।

इसी वृहदारण्यकोपनिषद् के ही चौथे अध्याय में कहे हुए जनक-याज्ञवल्क्य संवाद रूप, ज्योति ब्राह्मण में वाक्य के अर्थ को मन में विचार कर आचार्य ने प्रश्नोत्तर रूप में श्लोक लिखा।

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