समस्या का अस्वीकार ही समस्या की जड है
समस्या का अस्वीकार ही समस्या की जड है। '
समस्या का स्वीकार ही समाधान का हेतु है। समस्या आती है रजोगुणी, तमोगुणी संचित चित्त वृत्तियों के कारण जिनसे उठने वाले भ्रामक विचार जुडे होते हैं।
विचारों का इतना ही काम है सारे कारण बाहर बताना अत: उन विचारों को साक्षी भाव से देखा जा सके तो हम उनके भ्रमजाल में फंसने से रह जाते हैं।
या जैसे ही विचार उठे चाहे कोई भी, कैसा भी विचार-हम अपने आपसे पूछें-यह विचार उठा।
किसे? मुझे।
मैं कौन हूँ, मैं कहाँ से हूँ?
इस प्रकार पता लगाकर हम जानलेते हैं कि मैं (मन), हृदय से हूँ और हृदय में रहने लगता हूँ तब निर्विचार, मौन, विश्राम पूर्ण स्थिति बनती है चौबीसों घंटे। हर वक़्त हृदय में स्थित, सहज, रिलेक्स्ड।मूल में बने रहने का यही सुपरिणाम है।
मन रुपी मेरा, हर वक़्त हृदय में रहना मेरा मौलिक परिवर्तन है। यह रचनात्मक परिवर्तन है। अन्यथा मन में जब तक हम मै के रूप में रहते हैं, विचार उठते रहते हैं। वे अधिकांश भ्रामक ही होते हैं अतः भटकने की संभावना बनी रहती है। अतः मन रुपी मै के मूल का पता लगाकर मूल में अर्थात हृदय में ही रहना हर समय- बहुत बडा समाधान है।
समस्या के रूप में संचित चित्त वृत्तियों का स्वीकार इसीका हिस्सा है।कोई घटना घटने पर
किसीका चित्त विषाद से भर जाता है, किसीके चित्त में श्रद्धा रहती है। श्रद्धा प्रधान व्यक्ति अनेक कष्टों से बच जाता है पर जिसमें विषाद है उसे तकलीफ होती है।
विचारों से बाहरी घटना, परिस्थिति को विषाद का कारण माना जाता है जबकि असली कारण होती है हमारे चित्त में संचित विषाद वृत्ति।
यह अच्छी नहीं लगती अतः इससे बचाव की कोशिश होती है। यही असली समस्या है। विषाद वृत्ति खुद समस्या नहीं है। यह प्रकृति है। तमोगुण है। प्रकृति के गुण अच्छे बुरे नहीं होते। ऐसा नहीं है कि सत्वगुण अच्छा है,रजोगुण, तमोगुण बुरे हैं।वे प्रकृति के गुण हैं, दोष नहीं। दोष तो हम मानते हैं इसलिए बाधा आती है।
दोष मानने से उसका अस्वीकार होता है। यही अहं बुद्धि है जो रजोगुण, तमोगुण को बुरे मानती है जबकि समझ उसे प्रकृति के गुण के रूप में देखती है।
इन्हें रोका नहीं जा सकता, इनसे बचा नहीं जा सकता, इन्हें हटाया नहीं जा सकता यदि ये हमारे भीतर हैं। गुण भी गुणों को नहीं रोक या हटा सकते तो अहं बुद्धि क्या हटा पायेगी वह तो अहम्मन्यता मात्र है।
ऐसे में बुद्धिमान व्यक्ति सूक्ष्म बुद्धि से समझकर उन प्रस्तुत गुणों को स्वीकार लेता है, अपना लेता है।
चाहे जो वृत्ति हो-क्रोध, लोभ, कलह, शोक, मोह, विषाद, भय आदि।
भेद बुद्धि को भी कृष्ण ने रजोगुण कहा है। इसके शिकार तो सभी हैं। समझदार आदमी इसे स्वीकार लेगा, अपना लेगा बजाय उससे परिचालित होने के।
दोनों में फर्क है। परिचालित व्यक्ति बेहोश होता है। उसका नियंत्रण उसके हाथ में नहीं होता।वह केवल गलती से अपने को उस गुण का कर्ता मानता है और भोक्ता बन जाता है।
स्वीकारने वाला उससे परिचालित नहीं होता। वह सजग होता है।
भेद बुद्धि से चलने से बेहतर है भेद बुद्धि को स्वीकार लेना, अपना लेना, उसे हृदय से लगा लेना। हृदय से लगा लेने से भेद बुद्धि, हृदय में ही समा जाती है जो उसका उद्गम स्थान है।
भेद बुद्धि से समस्या आती ही है। इस वजह से भेद मिटाने के प्रयास होते हैं। ये प्रयास कभी सफल नहीं होते जिससे भेद की समस्या और पीडा और ज्यादा बढ जाती है।
इस संघर्ष को सर्वत्र देखा जा सकता है। समाधान जानने के लिए भेद को नकारने का प्रयास करने के बजाय अपने में संचित भेद बुद्धि पर आना पडे और उसे स्वीकारना पडे, अपनाना पडे। बचाव की फिक्र न की जाय।
भेद बुद्धि को नकारना उपाय नहीं, भेद बुद्धि को स्वीकारने, अपनाने से समाधान होता है। स्वीकारने से वह उसके मूल में विलीन हो जाती है जहाँ से वह आयी होती है।
हर वृत्ति के साथ यही उपाय है। भय और क्रोध की समस्या आम है। आदमी कभी क्रोध करता है अहंकार वश, कभी भयभीत हो जाता है यह भी अहंकार का ही काम है। यदि वह सप्रेम, सहर्ष अपनी संचित क्रोध, भय आदि सभी वृत्तियों को गले लगा लेता है बजाय बचने, हटने, हटाने के तो वह उनसे मुक्त हो जाता है। अब वह भय रहित, क्रोध रहित होने से सहज रहेगा कभी कुछ, कभी कुछ नहीं होगा अर्थात अस्थिर, असंतुलित।
गीता उसे स्थितप्रज्ञ कहती है।
दु:खेष्वनुद्विग्नमना:सुखेषु विगतस्पृह:। वीतरागभयक्रोध:स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
बस आदमी को स्वयं को रागद्वेष, पसंद नापसंद के अधीन नहीं होना चाहिए अन्यथा वह बाहरी व्यक्ति के प्रति प्रतिक्रिया करेगा या अपनी वृत्तियों को लेकर द्वंद्व में रहेगा।
बाहरी व्यक्ति,,बाहरी व्यक्ति नहीं अपितु अपना ही प्रक्षेपण है। अपनी ही जगह पर दृढता से रुककर अपने प्रक्षेपण या प्रतिबिंब को स्वीकार लिया जाय, अपना लिया जाय तो वह अपने भीतर विलीन हो जाता है।सारा आंतरिक संघर्ष समाप्त हो जाता है, बाहरी संघर्ष भी समाप्त हो जाता है। किससे संघर्ष करना? अपने ही प्रक्षेपण से संघर्ष करना या पलायन करना अपने आपसे ही संघर्ष या पलायन करना है।
और चित्त वृत्तियाँ तो अपनी हैं ही। उन्हें अपना लेने में ही भलाई है। बहुत कम लोग इसके सत्य को समझ पाते हैं। बाकी जैसे भय लगे तो मन बाहरी कारण बताता है,चित्तवृत्ति अपना असर दिखाती है ऐसे में अच्छे अच्छे लोग भी भान भूल जाते हैं। यदि संपूर्ण रुप से उस वृत्ति को अपना लिया जाय तो वह वापस अपने मूल में विलीन हो जाती है।
आधे अधूरे रहे, अहम्मन्यता में रहे संघर्ष में, पलायन में उतरे तो कभी उससे मुक्ति नही मिलती। फिर तो यही रहता है कि जब जब तात्कालिक परिस्थितियां उत्पन्न होती रहें उनका समाधान खोजा जाता रहे और मूल कारण के संज्ञान से वंचित रहा जाय।
अत: कहा जायेगा कि समस्या का अस्वीकार ही समस्या की जड है।
और समस्या का स्वीकार, समाधान का हेतु है।
समस्या को स्वीकारना, अपने आपको स्वीकारना है क्योंकि समस्या हमारे भीतर से ही उत्पन्न होती है। समस्या से बचने का अर्थ है अपने आपसे बचना जबकि अपने आपको स्वीकार लेने वाला अपने भीतर महान ऊर्जा, प्रज्ञा, शक्ति का स्रोत पा लेता है।
इसलिए अंदर बाहर कहीं कैसी भी समस्या अनुभव है तब पूरा ध्यान अपने आपको स्वीकारने पर ही होना चाहिए, तब भ्रामक विचारों से तो मुक्ति मिलती ही है, चित्त शांत-स्थिर हो जाता है। यह स्थिति न केवल अपने लिए अपितु समाज के लिए भी रचनात्मक सिद्ध होती है। समस्या से अर्थात् स्वयं से बचना चाहने वाले तो अपने और सबके लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं।
अपने आपको स्वीकारने वाला अपने हृदय में विराजमान गुरु को, आत्मा को, ईश्वर को पा लेता है और यह महान कल्याणकारी सिद्ध होता है।
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