मोक्ष की चाह

*💥मोक्ष की चाह💥*
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साधु ने कराया यथार्थबोध...
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किसी नगर में एक व्यक्ति रहता था। उसके घर में पत्नी के अलावा एक छोटा बच्चा था।
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उसकी गृहस्थी की गाड़ी बड़े आराम से चल रही थी। मगर एक दिन उस व्यक्ति के मन में अचानक वैराग्य भाव जाग उठा।
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अब उसका किसी काम में मन नहीं लगता और वह दिन-रात अपना घर-परिवार छोड़ मोक्ष प्राप्ति के बारे में सोचा करता।
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आखिरकार उसने तय कर लिया कि अब मोह-माया के बंधनों में नहीं पड़ना है और भगवद्भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना है।
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यह सोचकर वह रात में चुपचाप अपने घर से भाग निकला।
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वह एक साधु के पास पहुंचा और भगवद्प्राप्ति का उपाय पूछने लगा।
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उसकी आकांक्षा जान साधु बोले - वत्स, भगवान की कृपा यूं ही किसी को प्राप्त नहीं होती। उसके लिए जीवन में बड़ा त्याग करना पड़ता है।
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यह सुनकर वह व्यक्ति बोला - महात्मन्, मैंने भी बड़ा त्याग किया है।
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इस पर साधु ने उससे पूछा - जरा हमें भी तो बताओ तुमने क्या त्याग किया है ?
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तब वह व्यक्ति बोला - जब मैं अपने घर से निकला, तब मेरी पत्नी और मेरा इकलौता बेटा गहरी नींद में सो रहे थे।
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तभी अचानक नींद में बच्चा चौंकते हुए जोर-से चीखा। यह देखकर मैं घबरा गया।
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मुझे लगा कि अब पत्नी जाग जाएगी और मेरा घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा। पर पत्नी ने नींद में ही बच्चे को सीने से चिपका लिया और वह चुप हो गया।
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इसके बाद मैं चुपचाप वहां से निकल आया। अब मैं संसार की मोह-माया में नहीं फंसना चाहता।
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आप कृपा कर मुझे आगे की राह दिखाएं।
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साधु बोले- अरे मूर्ख, दो भगवान तो तेरे घर में ही बैठे हैं, जिन्हें तू यूं ही छोड़ आया।
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जा, जब तक तू उनकी सेवा नहीं करेगा, तब तक तेरा उद्धार नहीं होगा।
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पहले अपने परिवार को संभाल, अपने कर्तव्यों को पूरा कर, फिर सोचना कि पारिवारिक दायित्वों को निबाहते हुए तेरा आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा हुआ कि नहीं ?
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अध्यात्म भगोड़ों का नहीं, शूरवीरों का साथ देता है। परिवार में रहकर भी तेरी साधना पूरी होती रह सकती है।
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त्याग करना है तो अपने भीतर के विकारों एवं भ्रम-जंजालों का कर।
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यह सुनकर व्यक्ति को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह व्यावहारिक साधना की पूर्ति हेतु अपने घर की ओर लौट पड़ा।

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