विचार मंथन
"क्या विचारकर्ता और उसके विचार अविभाजित घटना नहीं हैं? हम क्यों विचार को विचारकर्ता से अलग करते हैं? क्या यह मन की धूर्त तरकीब नहीं है ताकि विचारकर्ता परिस्थितियों के अनुसार पोशाक बदल सके, फिर भी वैसा ही बना रह सके? बाहर से यह परिवर्तन का दिखावा है लेकिन भीतर से विचारकर्ता जैसा है वैसा ही बना रहता है। निरंतरता की, स्थायित्व की लालसा विचारकर्ता और उसके विचारों के बीच विभाजन उत्पन्न करती है। जब विचारकर्ता और उसके विचार अविभाजित होते हैं (अवियोज्य, अविभेद्य) तभी द्वैत का अतिक्रमण होता है। तभी सच्चा धार्मिक अनुभव है। केवल जब विचारकर्ता नहीं रहता, यथार्थ होता है। विचारकर्ता और उसके विचार की अविभाजित एकता को अनुभव किया जाना चाहिए, न कि उसका अनुमान मात्र।
यह अनुभव मुक्ति है, स्वतंत्रता है, आजादी है। इसमें अभिव्यक्त न किया जा सके ऐसा आनंद है। "
हम ब्रह्म का सत्संग तो करते ही हैं, कभी माया का, मन का सत्संग भी करना चाहिए कि यह कैसे कार्य करते हैं? केवल माया को कोसने, डरने का कोई अर्थ नहीं। माया मन के रूप में एक व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करती है, न कि यह अव्यवस्था है। यह अंधेर नगरी चौपट राजा की बात नहीं है।
मन, विचार है।मन विचार के रूप में है। विचार को समझने से मन शांत हो जाता है, समाप्त हो जाता है। विचार को कैसे समझा जाय?
विचार क्षणभंगुर है। अपने से नहीं बना रह सकता अत:यह एक विचार को अलग कर देता है। यह अलग हुआ विचार ही मै विचार के रूप में विचार पर विचार करता रहता है, उसे मिटने नही देता। जब विचार, विचारकर्ता तथा विचार दो भागों में बंट जाता है तब इसे भुला दिया जाता है कि मूलतः विचार (मन, माया) ही बंटा हुआ है। अर्थात यह विभाजन वास्तविक नहीं है।अतः विचारकर्ता और विचार को अलग नहीं किया जा सकता। मूल में वही विचार है।
विचारकर्ता, विचार ही है।
"The thinker is the thought. "
अब विचार अपने आपको समझे कि स्वयं ही विचारकर्ता और विचार दो भागों में बंट गया है।
विचार ही विचारकर्ता बनकर क्रिया, प्रतिक्रिया कर रहा है तो दो नही रहते, एक ही चीज रहती है-विचारक्रिया। यह संस्कार बद्ध होती है।
"There is no thinker, only conditioned thinking. "
दो नही है तो फिर एक ही विचार क्रिया है जो संस्कार अनुरूप होती रहती है।
जब वही है तो वह जारी कैसे रहती है? उसे रुक जाना चाहिए।वह न रुके इसलिए माया की, मन की यह व्यवस्था है कि विचार, मैं बन जाता है, विचारकर्ता बन जाता है ताकि विचार को जारी रखा जा सके।
वह विचारकर्ता, मै के रूप में रहता है अर्थात मै विचारकर्ता हूँ (I-thought)।
मैं आत्मा-परमात्मा हूँ यह मालूम नहीं, मगर मै,
मै- विचार हूँ यह तो साफ दिखाई देता है।
मैं (विचार) का एक ही काम है जो विचार आते हैं उन पर क्रिया, प्रतिक्रिया करते रहना ताकि विचार बना रहे। विचार की मौत, मै विचार की मौत है और वह अर्थात मै मरना नहीं चाहता। मै(विचार कर्ता रुपी विचार) अपने को बनाये रखने की पूरी कोशिश करता हूँ। मै सुखी हूँ, दुखी हूं, हैरान हूँ, परेशान हूँ। ये सब अपने को बनाये रखने की तरकीबें हैं। हैरान, परेशान होने से मै(विचार) बना रहता हूँ।बने रहने के लिए मै, बाध्य होने की कल्पना भी कर लेता हूँ।हैरान, परेशान, बाध्य न होऊं(अपने को जबरदस्ती बनाये रखने के लिए)
तो मैं(विचार) मिट जाता हूँ। मेरा खात्मा हो जाता है।आनंद अभिव्यक्त हो जाता है।
विचार इसका दुश्मन है क्योंकि वह स्वयं बने रहना चाहता है। विचार स्वयं बने रहते हुए आनंद खोजने का नाटक करता है। विचार के रहते हुए आनंद हो नहीं सकता। यह समस्या कई लोगों के सामने आती है। वे जीवन भर आनंद की खोज में रहते हैं। कभी हताश, निराश भी हो जाते हैं।
यह पता ही नहीं चलता कि जब तक मै रुप में विचार मौजूद है, आनंद का अभिव्यक्त होना असंभव है। यह तो तभी संभव है जब मै(विचारकर्ता रुपी विचार) नहीं हूँ।
"The Self is that where there is absolutely no I-thought. That is called 'silence'. "
वही आनंद है जिसमें द्रष्टा-दृश्य, विचारकर्ता-विचार, अनुभव कर्ता तथा अनुभव होने वाले का भेद नहीं है।
वस्तुतः द्रष्टा-दृश्य दोनों एक ही हैं, विचार कर्ता और विचार को अलग नहीं किया जा सकता। अनुभव करने वाला और अनुभव होने वाला अविभेद्य है। दोनों जुडे हुए हैं। इस अविभाजित एकता का अनुभव होना चाहिए तभी आनंद है, अनुमान से काम नहीं चलता।
पता लगाना पडता है कि ये एक हैं फिर भी अलग मालूम पडते हैं तो इस भ्रम को कैसे मिटाया जाय?
इसकी जिम्मेदारी विचार पर ही आती है जो अलग से विचारकर्ता बना हुआ है जो है "मै" हूँ (विचार)।
मुझ मै विचार को जो भी विचार उठते हैं उन पर कोई क्रिया, प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। न किसी उठते विचार का औचित्य-समर्थन(जस्टिफिकेशन) न निंदा, न प्रतिरोध न बदलने की कोशिश, न पलायन न अच्छा बुरा घोषित करने का निर्णय। बिल्कुल तटस्थ, निष्क्रिय। जब किसी भी विचार पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की जाती तब वह स्वत:नहीं चल पाता, वह शांत होने लगता है, साथ ही मै विचार रुपी मै भी।
ऐसी स्थिति में द्वैत का अतिक्रमण होता है। जब न कोई विचार होता है, न विचारकर्ता मै (विचार) होता हूँ तब सच्चा धार्मिक अनुभव होता है।
जब तक मैं विचार तथा अन्य विचारों के बीच संघर्ष है तब तक सच्चा धार्मिक अनुभव नही है। पता ही नहीं चलता कि मै विचार रुपी अपने आपको बनाये रखने की कोशिश करते हुए जब तक अन्य विचारों से संघर्ष है तब तक न आजादी है, न आनंद है।
इससे कोई फर्क नहीं पडता कि मै कितना सुखी या दुखी हूं क्यों कि मैं विचार हूँ तथा सुखदुख के विचारों के साथ संघर्ष में हूँ। इससे विचार कर्ता और विचार का विभाजन बना रहता है यह समझ में ही नहीं आता कि विचार तो विचार है ही, विचारकर्ता भी विचार ही है।
यह पता चल जाय तो विचार क्रिया चलती है(संस्कार अनुरूप) मगर विचारकर्ता वहाँ नहीं होता।
मै आत्मा-परमात्मा हूँ यह भी विचार है और इस तरह यह भी विभाजन की ही योजना है।
विचार, मै है।
मै विचार हूँ और विचार से मै निरंतर अलग होने की कोशिश कर रहा हूँ ताकि मैं बना रहूँ अर्थात विचार बना रहे, माया बनी रहे, मन बना रहे।
यह मन ही मै-दूसरा बन जाता है। यह विचार ही है जो स्वयं को बनाये रखने के लिए मै भी बन जाता है तथा दूसरा भी।मै विचार, दूसरेपन के विचार के साथ निरंतर रागद्वेष पूर्ण संघर्ष में रहता है।
विचार स्वयं को समझ ले कि किस प्रकार मै विचार बनकर, अन्य विचार के साथ संघर्ष में रहता हूँ तब न मै रहता है, न दूसरा। केवल विचार रहता है ऐसा विचार जो अविभाजित है। इसलिए तब वहां मुक्ति है, आनंद है। कोई वैचारिक संघर्ष नहीं है।
पूरे विश्व में अपने अपने वैचारिक संघर्ष ही जगत पर थोपे जाते हैं यदि विचार स्वयं को समझले तथा अपने ही मै विचार और अन्य विचार के द्वंद्व को समझ ले तो फिर वहां परम मौन है, परम शांति है।
इसे समझना जरुरी है अन्यथा मै-दूसरा यह वैचारिक विभाजन मन की भ्रामक चेष्टाओं में उलझा देता है जो बेहद हानिकारक साबित हो सकती हैं।
यह समझ पूर्णतया व्यक्तिगत है इसलिए स्व ज्ञान (सेल्फ नोलेज) का इतना महत्व है। स्व ज्ञान का अर्थ है अपने ही वैचारिक विभाजन को देखना और समझना । वहां "दूसरा" है नहीं, क्योंकि जिसे "दूसरा" समझते हैं वह अपना ही विचार मात्र है।इस तरह हर आदमी अपने अपने व्यक्तिगत वैचारिक विभाजन में व्यस्त है।
स्व ज्ञान(सेल्फ नोलेज) से स्व वैचारिक विभाजन और वैचारिक संघर्ष का अंत हो जाता है। आजादी और आनंद प्रकट हो जाते हैं।
जो अपने आपको नही समझते उनके विभाजन और संघर्ष का अंत नही होता।आजादी और आनंद विचार के विषय मात्र बने रहते हैं।खुद विभाजित
विचार शांत हो तो यथार्थ प्रकटे।
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