एकाकी ही चलना होगा
*एकाकी ही चलना होगा...*
दुनिया में राही सब मानव,
अलग-अलग पर राह सभी की,
जग-कोलाहल में लय होता
गान किसी का, आह किसी की,
पथ के कांटों को तलुवों से एकाकी ही दलना होगा!
एकाकी ही चलना होगा!
पृथ्वी पर दीपक जलते हैं
नभ में ज्योतित अनगिन तारे,
चंद्र-सूर्य भी आलोकित
करते हैं रजनी-दिवस हमारे,
अपनी राह खोजनी है तो एकाकी ही चलना होगा!
एकाकी ही चलना होगा."
यत पिंडे तत ब्रह्मांडे।
जो पिंड में है वही ब्रह्माण्ड में है, जो ब्रह्मांड में है वह पिंड में है।
हमने कभी हमारे मन को नहीं देखा। यह मन पूरा विश्व बना हुआ है द्रष्टा-दृश्य में विभाजित होकर।
यह जानना है तो मन की गति बहुत धीमी होनी चाहिए। सचमुच गति बेहद धीमी हो तो पता चले कि स्वयं सब है।
स्वयं सब है तो नामकरण क्यों किया जाय? भिन्न भिन्न चीजें हैं नहीं। अर्थात केवल स्वयं है। ऐसे में द्रष्टा-दृश्य दोनों नहीं रहते। सूर्य होगा, चंद्र होगा, पृथ्वी होगी मगर बिना नाम के। वास्तविक सत्ता अखंड होगी।
केवल मन के धरातल पर अखंडता प्रकट हो जाती है। कहीं दूर नहीं जाना पडता।
यदि मन की गति अत्यंत धीमी नहीं है तो फिर वहां द्रष्टा-दृश्य का विभाजन है। नामकरण है। फिर वहां हजार चीजें हैं अच्छे बुरे रुप में, अनुकूल प्रतिकूल रुप में।फिर अंतहीन आत्म संघर्ष है।
और इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। चित्त के रूप में हम ठहराव में नहीं हैं, स्थिर नहीं हैं, अस्थिर हैं-घडी के पेंडुलम की तरह जो रुकना जानता ही नहीं। वह न रुके मगर हमें रुकना पडता है, स्वस्थ होना पडता है।
थोड़ा विरोध है। चित्त स्वस्थ हो तो मन की गति धीमी हो;मन की गति धीमी हो तो चित्त स्वस्थ हो।इस अंतर्विरोध से गतिरोध पैदा होता है।
प्राणायाम उपाय है। श्वास की गति नियंत्रित होगी, संतुलित होगी तो अपने आप चित्त स्वस्थ होने लगेगा, मन की गति धीमी पडने लगेगी।
ये सब जुडे हुए हैं अत: एक को भी संभाल लिया जाय तो बाकी सब संभल जाते हैं।
मन में निरंतर उठते विचार बडे जिम्मेदार हैं। विचार बराबर आते हैं, चित्त उनमें खो जाता है। श्वास गति भावदशा के अनुसार घटती बढती रहती है।उपाय जानने की आवश्यकता पैदा होती है। तो
प्राणायाम तो है ही,
दूसरा आंख कान से ध्यान हटाकर अस्तित्व बोध पर केंद्रित करना पडे। ऐसी भावना करनी पडे कि आंख कान हैं ही नहीं, केवल अस्तित्व बोध है, केवल होने का अनुभव है।
मन की गति में आंखों का, कानों का रोल बडा है। यदि हम ऐसी भावना करें कि आंख कान हैं ही नहीं तो आश्चर्यजनक रुप से मन की गति शांत होने लगेगी, चित्त स्वस्थ होने लगेगा।
ऐसा नहीं है कि आंख कान केवल बाहरी जगत में ही काम करते हैं बल्कि उससे भी ज्यादा भीतरी जगत में काम करते हैं। यदि कोई आंख नहीं है जो मानसिक दृश्य देख रही हो, कोई कान नहीं हैं जो मानसिक वार्तालाप सुन रहे हों तो मन शांत होने लगता है,प्रतिक्रिया ठहरने लगती है,ध्यान अपने आप अस्तित्व बोध पर आने लगता है।
मन के आंख कान हैं, मगर जीभ भी है। मन की जीभ बोलती है तब तो मन के कान सुनते हैं।विचार उठते हैं, मन की जीभ हमारा प्रतिनिधित्व करते हुए बोलती है-यह ठीक है, यह ठीक नहीं, यह होना चाहिए, यह नहीं होना चाहिए। हमें लगता है हम सोच रहे हैं। यही तादात्म्य है। इसे जाना जा सकता है यदि हम शांत स्वस्थ मौन बैठे रहें।
अस्तित्व बोध सबसे महत्वपूर्ण है जिसकी सबसे ज्यादा उपेक्षा होती है जबकि यह आत्मसाक्षात्कार का परम द्वार है।
इसका कचरा हो जाता है। क्रोध, क्षोभ, लोभ, डर, भय, चिंता, शंका के कारण भरपूर तथा स्थिरता पूर्वक अस्तित्व बोध को जीया भी नहीं जाता। हर वक़्त विचार, हर वक़्त ध्यान तब वहां।हर वक़्त कोई फिक्र, कोई शंका, या राग या द्वेष का उद्वेग।
अकेलेपन का अहसास हो तब तो कुछ बात बने मगर क्षण भर के लिए भी अकेले नहीं होते। मन में बराबर विचार चलते हैं, निरंतर दृश्य उठते हैं जिन्हें मन की आंखें देखती रहती हैं।मन के कान सुनते रहते हैं।मन की जीभ बोलती रहती है।
इनके तार चित्त वृत्तियों से जुड़े रहते हैं। वृत्तियाँ सात्विक हों तब तो ठीक वर्ना राजसी, तामसी वृत्तियों के साथ जुडाव होने से वेग और ज्यादा बढ जाता है, नियंत्रण अपने हाथ से छूट जाता है। मनुष्य उसी प्रकार का जीवन जीते रहते हैं और चले जाते हैं फिर से आकर अगला जीवन इसी प्रकार जीने के लिए।
अतः सत्य को जानने का अवसर मिले तो हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। हर रोज ऐसा ध्यान अवश्य करना चाहिए इस भावना सहित कि आंख कान जीभ हैं ही नहीं, न बाहर न भीतर।पूर्ण मौन मे ध्यान पूरा अस्तित्व बोध पर; ध्यान अपने होने के अनुभव से ही जुडा हुआ रहे।तब सब समझ में आता है अपने आप। समझने की कोशिश करने और समझ में आने में बडा फर्क है। समझ में स्वत: आता है। हम कर्ता न बनें।
"सोचें नहीं कि आप हैं। आप केवल हों अस्तित्व बोध के रुप में।"
"Sink deep within and abide as Self. "
कोशिश तो की ही जा सकती है। और जो सार्थक हो बल्कि परम सार्थक हो उसके लिए कोशिश करने में भला क्या बाधा आ सकती है?जब इसका परिणाम मिलता है तभी अपनी पीठ थपथपाता है आदमी इन प्रयत्नों के लिए। जब वह बेरोकटोक अपने अस्तित्व बोध को भरपूर जीने में कामयाब होता है, जो वर्तमान में नहीं हो पा रहा है। आदमी को विश्वास ही नहीं होता कि परिपूर्ण रुप से अपने होनेपन को जीया जा सकता है। वह केवल किताब में लिखा देखता है ओम पूर्णमद:पूर्णमिदं.......
अपूर्णता ही अनिवार्य लगती है। वह सोच नहीं सकता कि आंख कान जीभ के बिना वह कैसे कार्य कर सकता है?
जबकि इनका आश्रय किये बिना सचमुच वह अपने हृदय में स्वयं के रुप में,अपने आपके रुप में जी सके तो महान प्रज्ञा शक्ति का उदय होता है। वही सारे कार्य करती है संपूर्ण रुप में।
गीता इसकी ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहती है-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। पूर्ण रुप से कर्म हो, अपूर्ण रुप से नहीं।
और यह खंडित मन बुद्धि आंखकानजीभ के बस की बात नहीं।वे सब तो फल पाने मे लगे रहते हैं आतुरता पूर्वक, उच्चाटित होकर, मूल से टूटकर।
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