काशी विश्वनाथम्.. नवम् ज्योतिर्लिंगम
*💥काशी विश्वनाथम्.. नवम् ज्योतिर्लिंगम्..💥*
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। :उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
:सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
:हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
:सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥
#काशी #विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजारों वर्षों से #वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से #मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहिपर सन्त एकनाथ ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पुरा किया और काशी नरेश तथा विद्वतजनो द्वारा उस ग्रन्थ की हाथी शोभायात्रा खुब धुमधाम से निकाली गयी थी।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।
गंगा तट पे वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन 1780 में करवाया गया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने के चढावे से मंदिर का शिखर स्वर्णरुपी बनवाया गया था।
हिन्दू धर्म में कहते हैं कि प्रलयकाल में भी इसका लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी यहीं भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने का कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से महर्षि वशिष्ठ तीनों लोकों में पुजित हुए थे तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये थे।
"सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी"
काशी की महिमा ऐसी है कि यहां #प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवागमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं:- दशाश्वेमघ, लोलार्ककुण्ड, बिन्दुमाधव, केशव और
मणिकर्णिका और इनहीं से युक्त यह अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर, जहां बाबा विश्वनाथ वाम रुप में शक्ति की देवी मां भगवती के साथ विराजे हैं। मान्यता है कि पवित्र गंगा में स्नान और काशी विश्वनाथ के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इनके श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।विश्वनाथ दरबार में गर्भगृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं। शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार, निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र की दुनिया में में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और साथ में तंत्र द्वार भी हो। बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है।
काशी में महादेव शंकर साक्षात वास करते हैं। यहां बाबा विश्वनाथ के दो मंदिर बेहद खास हैं। पहला विश्वनाथ मंदिर जो 12 ज्योतिर्लिंगों में नौवां स्थान रखता है, वहीं दूसरा जिसे नया विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित है।
यह भी कहा जाता है कि काशी नगरी देवादिदेव महादेव की त्रिशूल पर बसी है। धर्मग्रन्थों और पुराणों में जिसे मोक्ष की नगरी कहा गया है जो अनंतकाल से बाबा विश्वनाथ के भक्तों के जयकारों से गूंजती आयी है, शिव भक्तों की वो मंजिल है जो सदियों से यहां मोक्ष की तलाश में आते रहे हैं। कुल 12 ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ का नौवां स्थान है। मान्यता है कि अगर कोई भक्त बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाता है तो उसे जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। बाबा का आशीर्वाद अपने भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार खोल देता है।
ऐसी मान्यता है कि एक भक्त को भगवान शिव ने सपने में दर्शन देकर कहा था कि गंगा स्नान के बाद उसे दो शिवलिंग मिलेंगे और जब वो उन दोनों शिवलिंगों को जोड़कर उन्हें स्थापित करेगा तो शिव और शक्ति के दिव्य शिवलिंग की स्थापना होगी और तभी से भगवान शिव यहां मां पार्वती के साथ विराजमान हैं।
एक दूसरी मान्यता के मुताबिक, मां भगवती ने खुद महादेव को यहां स्थापित किया था। बाबा विश्वनाथ के मंदिर में तड़के सुबह की मंगला आरती के साथ पूरे दिन में चार बार आरती होती है। मान्यता है कि सोमवार को चढ़ाए गए जल का पुण्य अधिक मिलता है। खासतौर पर सावन के सोमवार में यहां जलाभिषेक करने का अपना एक अलग ही महत्व है। सावन का हर दिन पावन है और इस दौरान जल चढ़ाने से बाबा प्रसन्न होते हैं।
काशी के कण-कण में चमत्कार की कहानियां भरी पड़ी हैं, लेकिन बाबा विश्वनाथ के इस धाम में आकर भक्तों की सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं औऱ जीवन धन्य हो जाता है। एक तरफ शिव के विराट और बेहद दुर्लभ रूप के दर्शनों का सौभाग्य मिलता है, वहीं गंगा में स्नान कर सभी पाप धुल जाते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद नए काशी विश्वनाथ मंदिर कहने को नया है, लेकिन इस मंदिर का भी महत्व उतना ही है जितना पुराने काशी विश्वनाथ का। कहते हैं यहां आकर भोले भंडारी के दर्शन कर जिसने भी रूद्राभिषेक कर लिया, उसकी सभी मुरादें हो जाती हैं. उसके लिए मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।
यहां देवगण विराजते हैं और गंगा की धार बहती है, वो परमतीर्थ वाराणसी कहलाता है। यहां आने भर से ही भक्तों की पीड़ा दूर हो जाती है। तन-मन को असीम शांति मिलती है क्योंकि यहां स्वयं भगवान शिव विराजते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में काशी के राजा कहे जाने वाले भगवान शिव के दर्शन होते हैं, जिन्हें भक्त बाबा विश्वनाथ के नाम से ही पुकारते हैं। अगर भक्तों के जीवन में ग्रह दशा के कारण परेशानी आ रही है, ग्रहों की चाल ने जीना दूभर कर दिया है तो यहां आकर दर्शन करने के बाद यदि रुद्राभिषेक करा दिया जाए तो भक्तों को ग्रह बाधा से मुक्ति मिल जाती है।
नए विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की कहानी जुड़ी है पंडित मदन मोहल मालवीय जी से। कहते हैं एक बार मालवीय जी ने बाबा विश्वनाथ की उपासना की, तभी शाम के समय उन्हें एक विशालकाय मूर्ति के दर्शन हुए, जिसने उन्हें बाबा विश्वनाथ की स्थापना का आदेश दिया। मालवीय जी ने उस आदेश को भोले बाबा की आज्ञा समझकर मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ करवाया। लेकिन बीमारी के चलते वो इसे पूरा न करा सके। तब मालवीय जी की मंशा जानकर उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने इस मंदिर के निर्माण कार्य को पूरा करवाया।
वैसे तो मंदिर में बाबा का दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं, लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। मंदिर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहां अपने आप को कृतार्थ करते हैं, वहीं मंदिर के आस-पास आम कुंजों की हरियाली एवं मोरों की आवाज से भक्त भावविभोर हो जाते हैं। पूरे सावन माह और माह के प्रत्येक सोमवार को देश-विदेश से श्रद्धालु यहां भक्तिभाव से जुटते हैं। इस भव्य मंदिर के शिखर की सर्वोच्चता के साथ ही यहां का आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय माहौल दुनियाभर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। विश्वविद्यालय के प्रांगण में होने के कारण खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है।
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