!!गायत्रीमहिमा!!
!!गायत्रीमहिमा!!
गायत्रीं चैव वेदांश्च तुलया समतोलयेत् ।
वेदारेकत्र सांगास्तु गायत्री चैकतः स्थिता ।।(योगी याज्ञवल्क्य)
गायत्री और समस्त वेदको तराजुमें तौला गया तो एक पलडेमें सांगवेदको रखके दुसरा पलडेमें केवल गायत्री ही रखागया । अर्थात् षड़ङ्ग सहित वेदका पूण्यवल भी गायत्रीसे भारी नहीं । पावन पवित्रतादिमें गायत्रीसे वढ़कर कुछ भी नहीं ।।
सारभूतास्तु वेदानां गुह्योपनिषदो मताः ।
ताभ्यः सारस्तु गायत्री तिस्रो व्याहृतयस्तथा ।।(याज्ञवल्क्य)
समस्त वेदोंके सारभूत गुह्यतत्त्वरूप उपनिषद् मानी जाती है । उन उपनिषदोंके सारतत्त्वरूप तिनों व्याहृतियुक्त प्रणवान्विता मन्त्रात्मिका माता गायत्री ही है ।।
गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी ।
गायत्र्यास्तु परं नास्ति दिवि चेह च पावनम् ।। (शङ्ख स्मृतिः)
मन्त्रात्मिका माता गायत्री वेदोंके जननी तथा पापनाशिनी है । इहलोक और स्वर्लोकमें गायत्रीसे वढ़कर कोइ और पावन पवित्र वस्तु या मन्त्र है ही नहीं ।।
यद्यथाग्निर्देवानां ब्राह्मणोपि मनुष्याणाम्
वसन्तऋतूनामियं गायत्री चास्ति छन्दसाम् ।।
यद्यपि यहाँ अग्नि देवताओंमे श्रेष्ठ जैसे ब्राह्मण मनुष्योंमें श्रेष्ठ मना जाता है, ऋतुओंमे वसन्तऋतुको श्रेष्ठ माना जाता है वैसे ही छन्दोंमें गायत्री ही श्रेष्ठ है ।।
अभिप्राय यह है कि ये जो महामनिषीओंके आत्मानुभूतिकथन है उसका गूढ़ता लौकिक तथा पारलौकिक सिद्ध है और इसका विश्वास ही भक्तका भक्तिको सुदृढ़ तथा अचल अटलरूप स्थिरतासे लक्षप्राप्ति करादेता है । यही सत्य है और परिक्षित भी है ।। हरिः ॐ तत् सत्
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