आचार्य शंकर का काल-निर्णय
आचार्य शंकर का काल-निर्णय ===
भगवान् शंकराचार्य के काल के सम्बंध में विद्वानों में बड़ा मतभेद पाया जाता है, परन्तु अनेकों अकाट्य प्रमाणों से सिद्ध होता है कि आज ईस्वी सन् २०१९ से २४९१ वर्ष पूर्व आचार्य जन्म हुआ था, इस विषय पर बाद में लिखेंगे, पहले पूर्वी और पश्चिमी विद्वानों की मान्यता लिख रहे हैं ।
१.... भगवान् भाष्यकार के सम्बंध में "इंडियन आंटिक्वैरी" नामक पुस्तक के २५२/५३ पृष्ठ में "दक्षिण भारतीय इतिहास" नामक ग्रँथ के अंतर्गत वैष्णव उत्पत्ति नाम प्रकरण में विचार किया गया है।
इसमें लिखा है कि श्री शंकराचार्य तथा रामानुजाचार्य का जन्म बारहवीं शताब्दी में हुआ था, परन्तु यह विचार "माधवीय", "आनंद गिरीय", "बृहच्छंकर विजय" के विपरीत है।
क्योंकि भामती टिकाकर वाचस्पति मिश्रकृत "तात्पर्यविशुद्धि" नामक ग्रँथ से तथा अन्य किसी अद्वैतवादी पुस्तक से मेल नहीं खाता।
कुछ विद्वान श्री शंकर तथा रामानुज को एक काल का मानते हैं, किन्तु यह अत्यंत विपरीत बात है।
२.... कुछ विद्वान कलि सम्वत् ३९०१ (ईस्वी सन ८०३) में मानते हैं, यह "गुरुस्तोत्र के कर्ता शंकराचार्य का समय" नामक ग्रँथ में मिलता है।
३...... कुछ लोगों के अनुसार आचार्य का आविर्भाव कलि सम्वत् ३९०१ में आर्द्रा नक्षत्र में कालटी के समीप टेली नामक ग्राम में रमान "पेरुमल्ल" के महायुद्ध के समय हुआ,, इसका स्पष्टीकरण 'केरलोत्पत्ति' नामक मलयालम ग्रँथ में किया है।
इसमें लिखा है चेरमान, चेरुमल्ल के राजा कुंदी कृष्णराज के केरल के सिंहासन पर बैठने पर हिन्दूमत छोड़कर मुसलमान हो गया
उसने मक्का की यात्रा की, उसका राज्य ट्रावनकोर कोचीन से मक्का तक था।
मक्का से लौट आने पर वह गद्दी पर बैठा।
उसने समुद्र तटपर एक नगर बसाया, ई. सन् ८२५ में इसी समय के बीच शंकराचार्य का जन्म हुआ।
४...... तमिल के एक ग्रँथ से प्रमाण मिलता है कि वे ई. सन ७८८ में जन्म लेकर ८२० में ब्रह्मीभूत हुए।
५....... तैलंग के विद्वान् श्री काशीनाथ महाशय ने लिखा है कि सातवीं शतीं के अंत तथा आठवीं सदी के प्रारंभ में उनका जन्म हुआ।
६..... कृष्णराज ने ईसा ४२७ में इनका जन्म स्वीकार किया है।
७... "गोविंद भट्ट" के लिखे तीन पत्रों में आया है-----
"दुष्टाचार विनाशाय प्रादुर्भूतो महीतले।
स एव शंकराचार्य साक्षात कैवल्य नामक: ।।
निधि नागेश बह्न्यब्दे विभवे शंकरोदय:
अष्टवर्षे चतुर्वेदान् द्वादशे सर्वशास्त्रकृत।
षोडशे कृतवान्भाष्यं द्वात्रिंशे मुनिरभ्यगात् ।।""
' कैवल्य मुक्ति देने वाले साक्षात भगवान शंकर दुष्टों का विनाश करने के लिए शंकराचार्य के रूप में कलि सँ. ३८८९ में विभव नाम के संवत्सर में उत्पन्न हुए।
उन्होंने आठ वर्ष में चारों वेदों का ज्ञान , बारह वर्ष में शास्त्रों का अध्ययन , सोहलवें वर्ष में भाष्य करके दिग्विजय की औऱ बत्तीसवें वर्ष में ब्रह्मीभूत हुए।
कलि सँ. ३९२१ में दत्तात्रेय की गुफा में वैशाख पूर्णिमा के दिन शिव भाव की प्राप्ति की।
इनके मत से आज से १३२६ वर्ष पूर्व आचार्य का जन्म हुआ, अर्थात ईस्वी सम्वत ७८८ में।
यह निर्णय सन १८८२ के जून माह में प्रकाशित "इंडियन आंटिक्वैरी" में "भारतवर्ष के इतिहास" के ग्यारहवें भाग में प्रो. विष्णुदेव फाटक महोदय ने लिखा है।
८..... पं. सदानन्द जी महाराज (यह पं. सदानन्द स्वामी से भिन्न है, सदानन्द स्वामीजी ने शांकर दिग्विजय लिखा है) ने शंकर का जन्म कलि ३८८९ या ९० , ईस्वी सम्वत् ७८८ विभव वैशाख शुक्ल दशमी में हुआ माना है, यही मत चार विद्वानों का है।
किसी ने दूसरी, किसी ने पांचवीं, किसी ने चौदहवीं शताब्दी में जन्म माना है ; यह "दविस्तान" नामक ग्रँथ का मत है, इसका स्पष्टीकरण "भारत धर्म" नामक ग्रँथ में पण्डित वार्थ ने किया है।
९...... भगवान भाष्यकार ने ब्रह्मसूत्र के दूसरे अध्याय के प्रथम पाद के अठारवें सूत्र के भाष्य में लिखा है-----
"स्त्रुघ्न" देश में रहने वाले देवदत्त जिसदिन "स्त्रुघ्न" देश में थे , उसीदिन पाटलिपुत्र नहीं पहुँच सकते।
एक व्यक्ति एक ही काल में दो स्थानों पर नहीं रह सकता किन्तु देवदत्त, यज्ञदत्त के समान स्त्रुघ्न तथा पाटलिपुत्र के निवासी एक ही काल में विभिन्न देशों में हो सकते हैं।
तथा ब्रह्मसूत्र के ४/२/५ में भी कहा है----
"जो व्यक्ति स्त्रुघ्न से मथुरा जाकर मथुरा से पाटलिपुत्र जाता है; वह स्त्रुघ्न से पाटलिपुत्र जाने में भी समर्थ होता है।"
भाष्य के इन दोनों प्रमाणों से सिद्ध होता है कि उनके काल में "स्त्रुघ्न" नगर विद्यमान था।
ई. सम्वत् ७५६ में नदी की बाढ़ में वह बह गया ऐसा इतिहासकारों ने निश्चित किया है।
श्री शंकर के समय पाटलिपुत्र (पटना) तथा स्त्रुघ्न नामक दो नगर थे ; इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि शंकराचार्य का जन्म सन ७५६ से पहले का है।
इस प्रमाण से सन ७८८ में शंकराचार्य का जन्म कहने वाले परास्त हुए।
१२...... "श्री तारानाथ तर्क वाचस्पति बी. ए." अपने द्वारा लिखे ऐतिहासिक ग्रँथ में लिखते हैं कि सन ७०० से ७५० के बीच में कुमारिल भट्ट से पहले श्री शंकराचार्य जी थे तथा कुमारिल भट्ट तथा भगवत्पाद का समागम, सम्पूर्ण चरित्र तथा समय एक ही है।
कुमारिल का समय सन ६५० से ७०० के बीच में है , ये "साम विधान ब्राह्मण" के उपोद्घात में डॉ. बर्नल ने कहा है।
१३..... नेपाल के सूर्यवंशीय राजा वृषदेव के राजगद्दी पर बैठने के पन्द्रह वर्ष पश्चात कालटी में श्री शंकराचर्य जी का प्रादुर्भाव हुआ तथा उन्होंने बीस वर्ष की आयु में युधिष्ठिर सम्वत २६५१ में नेपाल की यात्रा की।
शंकराचार्य जी के आगमन से पूर्व महाराज वृषदेव बौद्ध तथा जैन धर्म से प्रभावित थे, इन्होंने बौद्ध दीक्षा भी ली थी।
भगवान पशुपतिनाथ मंदिर को भी बौद्घ विहार के रूप में परिणत कर दिया था,, परन्तु शंकराचार्य जी से प्रभावित होकर वे शैव धर्म में ही दीक्षित हुए।
महाराज ने अनेक मन्दिरों का जीर्णोद्धार किया।
उनके कोई संतान नहीं थी, भगवत्पाद के आशिर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
श्री शंकराचार्य जी के आशीर्वाद से पुत्र होने के कारण उस बालक का नाम "शंकरदेव" रखा।
आचार्यपाद ने एक वर्ष के काल में भगवान दत्तात्रेय, भगवान परसुराम तथा माता पार्वती का प्रत्यक्ष दर्शन किया।
एक दिन वे प्यास से बड़े व्याकुल थे,, खोजने पर भी कहीं जल नहीं मिला।
तब जगज्जननी पार्वती प्रकट हुई, उन्होंने मट्ठा पिलाया।
इसके पान करने से इन्हें अश्रुत ग्रन्थों का बोध हुआ।
आचार्य ने नेपाल यात्रा से पूर्व भारत में ही ज्योतिर्मठ में "दंडैश्वर्य विधानम्" नामक ग्रँथ आरंभ किया था, जिसकी पूर्ति नेपाल में हुई।
इसकी पुष्टि नेपाल राजवंश के इतिहास से तथा इस ग्रँथ के खोजकर्ता परम् पूज्यपाद श्री विद्यारण्य स्वामी जी महाराज जो अपने को मुर्खानंद नाम से कहते थे, आदि के प्रमाणों से होती है।
नेपाल-नरेश के राज्यकाल में अथवा उनके मृत्यु के अनन्तर कुछ ही महीनों के बीच आचार्य ने नेपाल यात्रा की थी।आचार्य के नेपाल प्रवास में ही नेपाल नरेश के पुत्र का जन्म हुआ, इसीलिए राजा ने उसका नाम "शंकरदेव" रखा।
बृषदेव का समय सन ६३० ईस्वी से लेकर ६५५ ईस्वी के भीतर था ,, इस प्रमाण से ७०० सन में आचार्य का जन्म मानने वालों का मत भी ठीक नहीं है।
यह तैलंग महापंडित ने काल निश्चित किया है।
१४.... ब्रह्मसूत्र के २/१/१८ के भाष्य में तथा छान्दोग्योपनिषद् ३/१९/१ में पूर्णवर्मा तथा राजवर्मा नाम के राजा आये हैं। इससे पूर्णवर्मा तथा राजवर्मा दो राजा इनसे पूर्व सिद्ध होते हैं।
पूर्णवर्मा नाम से अनेकों राजा हुए।
बनवासी कदम्बों में बैंगि, पुरु पल्लवों, महोवचन्देलों, मगध, मौखरियों तथा कश्मीर में उतपन्न वंशों के राजाओं में पूर्णवर्मा दो हुए।
इनमें जावा ताम्रपट्ट में एक पूर्णवर्मा का नाम आया है।
चीन के यात्री ह्वयेन्स्यांग जो ६०० से ६५० ईस्वी तक रहे,, उस समय पूर्णवर्मा पश्चिम मगध देश में शासन करते थे।
यह अशोक वंश के अंतिम राजा थे। इस यात्री ने मगध में ६३७----६३८ तक यात्रा की।
इस यात्री ने राजा का दर्शन किया था।
सूत्रभाष्य में लिखित दूसरे पूर्णवर्मा पूर्वोत्तर देश के थे। आचार्य के लेखनकाल में यह वाराणसी वास करते थे।
कुछ दिग्विजयों में बद्रिकाश्रम में भाष्यों की रचना कही गई है।
इस राजा के राजगद्दी पर बैठने के पहले ही छान्दोग्योपनिषद् तथा सूत्र भाष्य आचार्य लिख चुके थे।
इस राजा का समय सन ६०५ था।
१५...... पं. वेवर तथा बुलर ने छठी शताब्दी में हुए दण्डी कवि, त्र्यम्बक सूनु, तैलंग काशीनाथ शर्मा आदिकों ने इनका काल सातवीं शताब्दी का प्रथम भाग माना है।
१६...... सन ५५७ ई. से लेकर ५८३ तक एक चीनी यात्री "ह्वील" ने एक राजा का उल्लेख किया है।
उसी के राज्यकाल में सन ५७० में ईश्वरकृष्ण विरचित सांख्य कारिकाओं पर गौडपादाचार्य द्वारा रचित भाष्य का चीनी भाषा में अनुवाद किया है।
शंकराचार्य के गुरु तथा परम् गुरु श्री गोविंद भगवत्पादचार्य तथा गौडपादाचार्य जी का काल इससे पहले का सिद्ध होता है।
१७...... भास्कराचार्य जी ने अपने दिग्विजय में तथा "सौभाग्य चंद्रोदय दीक्षा मीमांसा पद्धति" आदि ग्रन्थों में कलियुग सम्वत ६०१ में शंकराचार्य का अवतार कहा है------------
"वर्षेश्वतीतेषु शतेषु षटसु तिष्येsतीर्णम् भुवि शंकरार्यम्।
शिष्यै चतुर्भि: सहितं शिवादि
पारंपरीकावधिमानमाम: ।।"
भगवान शंकराचार्य पृथ्वी पर कलि के ६०० वर्ष बीतने के बाद, चार शिष्य सहित अवतीर्ण हुए, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
१८....... कलि सम्वत २५४८ अर्थात ईस्वी सम्वत ५५३ में श्री शंकराचार्य जी ने नेपाल की यात्रा की।
सूर्यवंशीय अठारवें राजा रुद्र वर्मा के पुत्र ने बिहार में बुद्ध की मूर्ति की स्थापना की ; उस समय उनका अवतार हुआ,, यह मत पं. लाला इंद्रजीत ने "नेपाल देश के इतिहास" में "इंडियन आंटिक्वैरी" की पंद्रहवीं पुस्तक के इकतालिसवें पृष्ठ पर लिखा है तथा विदेशी पं मैक्समूलर ने भी यही कहा है।
१९..... आचार्य का अवतार शालिवाहन शाके ४२१ में प्रमाथी वर्ष माघ शुक्ल चतुर्दशी को शिवगुरु तथा गिरिजा माता के गर्भ से केरल देश में विद्याशंकर भारती के नाम से हुआ।
और शाक सम्वत ४९१ विरोधी वर्ष में कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को सायंकाल के समय कीकट नाम के देश में निर्मल नामक स्थान पर शिद्धि को प्राप्त हुए।
इनको दूसरा शंकर कहते हैं, ऐसा "जिनविजय" ग्रंथकर्ता का मत है।
यह पन्द्रह वर्ष की आयु में श्रृंगेरी पहुंचे।
वहां पर एक वर्ष तक विद्याभ्यास किया।
"विद्यानृसिंह भारती" के मठ में दीक्षित होकर उनके द्वारा विद्याशंकर भारती के नाम से आचार्य पद पर अभिषिक्त हुए।
२०...... श्री शंकराचार्य दो हजार वर्ष से पूर्व हुए-----कदली ब्राह्मणों के मत से।
२१..... ईस्वी सम्वत प्रथम शतक में हुए------- कुछ विद्वानों के अनुसार।
२२........ चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के सम्वत १७८वें वर्ष में हुए।
२३..... शंकराचार्य का अवतार १६०० वर्ष पूर्व हुआ--------- श्रृंगेरी मठ के विद्वानों के अनुसार।
२४....... इनका अवतार आज से १२८२ वर्ष पूर्व हुआ,, यह सम्प्रदायविदों का मत है।
इसप्रकार भगवत्पाद के काल के विषय में और भी अनेको मतभेद पाये जाते हैं,, विस्तार भय से नहीं लिखा।
२४ से ३९ वर्ष में इन्होंने दिग्विजय यात्रा की फिर लौटकर मठ में आये।
सूर्यग्रहण के पश्चात स्नान के लिए निकले, निर्मल नामक स्थान पर शालि सम्वत ४९१ में कार्तिक शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी, शुक्रवार सायंकाल के समय विद्याशंकर भारती ने समाधि ली।
इन्हें द्वितीय शंकर कहा जाता है।
कुछ विद्वानों के मत में प्रथम शंकर कैलाश पर्वत पर स्थित शिव रूप में है।
दूसरे शंकर आदि शंकराचार्य के रूप में अवतरित हुए।
शिव शंकर के समान ही इनका कार्य कलाप होने से द्वितीय शंकर कहा।
परन्तु इन विद्वानों का मत आद्य शंकराचार्य के मत से अत्यंत विपरीत सिद्ध होता है।
उसी के सम्बंध में आगे लिख रहे हैं
कुम्भकोणम् मठ की परम्परानुसार भगवान् शंकर ने पांच बार अवतार धारण किया।
गुरु परम्परा कांची मठ के अनुसार----------
१...... प्रथम वार शंकर जी ईसा से ५०९-८ या ४८२ या ४७६ वर्ष पूर्व कालटी में अवतरित हुए।
यह आद्य शंकर या कालटी शंकर कहलाये।
इन्होंने प्रस्थानत्रयी, विष्णुसहस्रनाम आदि पर भाष्य किया ।
२..... इनका नाम कृपाशंकर था।
यह ईस्वी सम्वत २६ से ६९ तक रहे।
यह कामकोटि के सातवें या आठवें मठाधीश हुए।
इन्हें षणमत स्थापनाचार्य के नाम से कहा गया।
इन्होंने गाणपत्य, सुब्रह्मण्य, शाक्त, शैव, वैष्णव तथा सौर इन छह वैदिक उपासनाओं का प्रचार किया।
इन्होंने विश्वरूप को श्रृंगेरी में स्थापित किया।
यह ४३ वर्ष तक रहे।
३... उज्ज्वल शंकर----- इनका समय ई. ३२९ से ३६७ तक ३८ वर्ष रहे।
यह कामकोटि के सोहलवें शंकराचार्य थे।
केरल के राजा कुलशेखर इनके शिष्य थे।
४.... ये मूक शंकर या मूकेन्द्र शंकर के नाम से विख्यात हुए।
यह कामकोटि के अठारवें या बीसवें आचार्य हुए।
यह ईस्वी सम्वत ३९८ से ४३७ या ४३९ वर्ष तक रहे।
५.... ये अभिनव विद्याशंकर तीर्थ या धीर शंकर या चिदम्बर शंकर के नामों से विख्यात हुए।
इनके सम्बन्ध में पीछे लिखा जा चुका है।
इनका जन्म सन ७८८ में हुआ था।
कुछ लोगों ने इन्ही को भ्रांति से आद्य शंकर मान लिया।
"आनंद गिरीय" दिग्विजय में इनका जीवन वृत्तान्त मिलता है।
यह भगवान शंकर के पांच चंद्रमौलीश्वर लिंग लाये थे।
इनके संबंध में "शिव रहस्य" के सोहलवें अध्याय में साठवां श्लोक मिलता है।
"गुरुरत्न माला" की सुषमा टिका, "पुण्य श्लोकमंजरी" तथा "परमिला", "आदि शंकराचार्य अभ्युदय", "पतंजलि चरितम्" आदि ग्रन्थों में इनका वर्णन हुआ है।
अनेकों दिग्विजयों में जिनमें "माधवीय दिग्विजय", "व्यासचलीय" आदि आते हैं , उनमें इन्होंने कैलाश में जाकर पांच मौलीश्वर तथा "सौंदर्य लहरी" ग्रँथ प्राप्त किये ; इस प्रकार इनके सम्बन्ध में मत पाया जाता है।
१.... कदली ब्राह्मणों के मतानुसार श्री शंकराचार्य २०८० वर्ष पूर्व हुए।
कुछ लोग ईसा की प्रथम शताब्दी में कहते हैं।
२..... दक्षिण के स्कंदपुर के हस्तलिखित ग्रँथ के अनुसार आचार्य का जन्म सन १७८ लिखा है।
३..... श्रृंगेरी के विद्वानों के अनुसार श्री शंकराचार्य को १६०० वर्ष हो चुके हैं। कुछ सम्प्रदाय के लोग १२०० वर्ष मानते हैं।
४..... भोज प्रबंध के अनुसार ८०० या ९०० वर्ष पूर्व शंकराचार्य का जन्म हुआ।
५...... शिव रहस्य के ९वें अंशानुसार आचार्य को २०८० वर्ष हो चुके।
शंकर जी कहते हैं "हे देवी ! सारस्वत, गौड़, मिश्र, कर्नाटकी ब्राह्मण, विंध्याचल के उत्तर के वासी ब्राह्मण शास्त्रार्थ करने में दक्ष होंगे।
कलि में जैन, बौद्घ, चार्वाक, मीमांसक वेद के अर्थ का अनर्थ करेंगे।
पूर्वमीमांसक कर्म को ही मुक्ति का साधन बताएंगे।
हे महादेवी ! इनको उखाड़ फेंकने के लिए केरल के शशल ग्राम में मेरा अंश ब्राह्मण पत्नी के गर्भ से शंकर के रूप में अवतरित होगा।"
६...... "श्रृंगेरी गुरु परम्परा" ग्रँथ में लिखा है कि विक्रम संवत १५ , पार्थिव वैशाख शुक्ल तृतीया को जन्म हुआ तथा विक्रम संवत २२ में सन्यास ग्रहण किया।
श्रृंगेरी मठ के पँ. कृष्ण लाल और पं. गोविंद राम का कथन है कि विक्रम संवत ७५ में शंकराचार्य का जन्म हुआ।
७.... शारदा मठ के परम्परा के अनुसार भगवान भाष्यकार का जन्म युधिष्ठिर संवत २६३१ , वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ।
यही मत युक्तियुक्त तथा माननीय है।
कुछ विद्वानों ने कलि का आरंभ ईसा से ३१०२ वर्ष पूर्व माना है।
युधिष्ठिर संवत इससे भी ३६ या ३७ वर्ष पुराना है।
अतः युधिष्ठिर संवत ईसा से ३१३८ या ३१३९ वर्ष पूर्व सिद्ध हुआ।
महाभारत तथा भागवत के अनुसार जिसदिन से भगवान श्रीकृष्ण धराधाम को परित्याग कर परमधाम को गये ; उसी दिन कलि आरम्भ हुआ।
महाभारत के स्त्री पर्व में कथा आती है कि जब गांधारी तथा धृतराष्ट्र को पता चला कि श्रीकृष्ण ने कूटनीति से भीमसेन के द्वारा मेरे सौ पुत्र मरवा दिये हैं, तब पुत्रशोक से संतप्ता गांधारी ने भगवान को शाप दिया ----"जैसे मेरे वंश का विनाश हुआ है आज से ३६ वर्ष बाद वैसे ही तुम्हारे भी वंश का नाश होगा।"
इस कथा से सिद्ध होता है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति पर युधिष्ठिर राजगद्दी पर बैठे, उसी दिन से उनका संवत आरम्भ हुआ।
उपरोक्त श्राप अनुसार ३६ या ३७ वर्ष बाद कलियुग आरम्भ होता है।
युधिष्ठिर सम्वत ३६३१ से लेकर २६६३ तक शंकराचार्य का कार्यकाल रहा ; यह शुषमा टिका तथा प्राचीन दिग्विजयों से सिद्ध होता है।
"विमर्श" नामक पुस्तिका से आचार्य शंकर का काल निर्णय (गुरुवंश पुराण)
शारदा पीठ द्वारका के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी "राजराजेश्वर शंकराश्रम" जी ने 'विमर्श' नामक पुस्तिका में , जो कि विक्रम संवत १९५३ में लिखी थी तथा विक्रम संवत १९५५ में राजराजेश्वर यन्त्रालय वाराणसी से प्रकाशित हुई, उसमे आप लिखते हैं कि शारदा मठ के अट्ठाईसवें जगद्गुरु श्री "नृसिंहाश्रम" जी महाराज विक्रम संवत ९६० ज्येष्ठ वदी १४ तक रहे।
उन्हें गुजरात मण्डल के राजा सर्वजीत वर्मा ने विक्रम संवत ९४१ शुद्ध वैशाख चतुर्दशी को एक ताम्रपत्र भेंट किया, उसका अवलोकन करने से भ्रांति की निवृत्ति हो जाती है।
उसके कुछ वर्ष पश्चात अपनी विजय यात्रा पर निकले।
द्रविड़ के अग्रहारों में भ्रमण करते हुए 'काल हस्ती मण्डल' , उर्दूर अग्रहार' , 'सप्तगोदावरी मण्डल' से होते हुए 'कोण सिमनि' तथा 'चन्नुपुर' प्रांत में पहुँचे।
वहां पर उनका 'उदुरु द्राविड़' , 'कोन सीमद्राविड़' , 'आराम द्राविड़' वर्ग के द्राविड़ शिष्ट ब्राह्मणों ने स्वागत किया।
श्री नृसिंह जी महाराज के ताम्रपत्र की परंपरा को देखकर आद्य शंकराचार्य के काल के संबंध में विचार हुआ।
उसमें स्वामी "नृसिंह आश्रम जी महाराज" से पूर्ववर्ती आचार्यों की परम्परा तथा शंकराचार्य जी का संक्षिप्त जीवन चरित्र सहित युधिष्ठिर तथा विक्रम संवतों का उल्लेख किया गया था।
आचार्य चरणों को उनलोगों ने प्राचीन वंशावली समर्पित की।
श्री स्वामी नृसिंह आश्रम जी को आज से (शारदा मठ के स्वामी श्री राजराजेश्वर जी के "विमर्श" नामक पुस्तिका के लेखन काल से ) अर्थात विक्रमी संवत १९५३ तक १०१३ वर्ष हो चुके हैं
उनसे पहले भगवान भाष्यकार के पश्चात २८ शंकराचार्य हो चुके हैं।
इस प्रकार आद्य शंकराचार्य जी के जन्म से लेकर आज विक्रम संवत २०५० (स्वामी जी का गुरुवंश पुराण लेखन काल) तक २४६४ वर्ष हो चुके हैं, २४६५वां चल रहा है।
.........................................................(क्रमशः)
(नोट--- आचार्य शंकर के जन्म से लेकर कैलाशगमन पर्यंत लीलाओं का विवरण तिथि सहित इस "विमर्श" नामक ग्रँथ में दिया गया है।
"विमर्श" नामक पुस्तक से आचार्य के चरित्र का तिथि निर्णय (गुरुवंश पुराण)
(इस पुस्तक की मात्राएं तथा अक्षर अधिकतर जीर्ण थे।इसमें विश्वरूपाश्रम पर्यंत प्राचीन आचार्यो की परम्परा के अंतर्गत इस पत्रिका को नवीन रूप देकर प्रकाशित किया गया है।)
(निम्नलिखित सभी वर्ष युधिष्ठिर संवत है )
युधिष्ठिर संवत २६३१ वैशाख शुक्ल पंचमी------- श्री शंकराचार्य जी का अवतार।
२६३९ चैत्र शुक्ल नवमी---- उपनयन।
२६३९ कार्तिक शुक्ल एकादशी--- सन्यास।
२६४० फाल्गुन शुक्ल द्वितीय से---- श्री गोविंद भगवत्पादचार्य जी द्वारा उपदेश । (बद्रिकाश्रम में)
२६४६ ज्येष्ठ कृष्ण पूर्णिमा तक----- ब्रह्मसूत्र, गीता तथा ईशावास्योपनिषद से लेकर छोन्दोग्योपनिषद, बृहदारण्यकोपनिषद, सनत्सुजातीयदर्शन, विष्णुसहस्रनाम, ललिता त्रिशती आदि पर भाष्य रचना की।
वहीं पर व्यास जी का दर्शन तथा उनसे शास्त्रार्थ।
भरत खण्ड की यात्रा तथा पद्मपादाचार्य जी की प्राप्ति, बद्रीनारायण की प्रतिष्ठा तथा ज्योतिर्मठ का निर्माण।
२६४७ मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीय---- मण्डन मिश्र के साथ सरस्वती की मध्यस्थता में शास्त्रार्थ।
२६४७ कार्तिक शुक्ल अष्टमी--- भगवान वेदव्यास जी से वाराणसी में शास्त्रार्थ तथा सनन्दन की शरणागति।
२६४८ चैत्र शुक्ल चतुर्थी---- मण्डन की पराजय। ( तीन महीने सत्रह दिन तक शास्त्रार्थ चला)
२६४८ चैत्र शुक्ल षट--- सरस्वती (उभय भारती) का काम कला सम्बन्धी प्रश्न।
२६४८ चैत्र शुक्ल अष्टमी---- आचार्य का परकाय प्रवेश। (छह महीने बीस दिन परकाया में रहे)
२६४८ कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी--- आचार्य का पुनः अपने शरीर में प्रवेश।
२४६८ कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा--- आकाश मार्ग से ब्रह्मलोक को जाती हुई सरस्वती को आचार्य ने चिंतामणि मन्त्र से द्वारका में आकर्षित किया।
२६४८ कार्तिक कृष्ण पंचमी---- शारदा मन्दिर में शारदा की स्थापना।
२६४८ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से---- द्वारका में शारदा मठ का निर्माण, बौद्धादिकों का पराजय ।
२६४८ माघ शुक्ल दशमी तक--- रुद्र मालाकार द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की यादवेंद्र मूर्ति की चांदी के मंदिर में प्रतिष्ठा, शंकर के शिद्धेश्वर मंदिर का निर्माण, भद्रकाली यंत्र का उद्धार।
२६४८ कार्तिक शुक्ल नवमी--- श्रृंगेरी मठ का निर्माण आरम्भ।
२६४९ चैत्र शुक्ल नवमी--- मण्डन मिश्र को सन्यास देकर सुरेश्वचार्य योगपट्ट दिया।
२६४९ मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी---- सुधन्वा की दीक्षा
२६४९ मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी-- श्री सुरेश्वचार्य का द्वारका शारदा पीठ पर अभिषेक।
२६५० वैशाख शुक्ल तृतीया-- -- दिग्विजय यात्रा महोत्सव।
२६५३ श्रावण शुक्ल सप्तमी--- त्रोटकाचार्य का सन्यास
२६५४ आषाढ शुक्ल एकादशी--- हस्तामलकाचार्य का सन्यास।
२६५४ वैशाख शुक्ल दशमी----- दिग्विजय यात्रा में ही पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथपुरी में गमन, जगन्नाथ भगवान की काष्ठ मूर्ति की स्थापना, गोवर्धन मठ का निर्माण तथा पद्मपादाचार्य का अभिषेक।
२६५५ भाद्रपद की अमावस्या से लेकर २६६२ पौष कृष्ण पूर्णिमा तक------ अविच्छिन्न गति से दिग्विजय यात्रा में बौद्घ आदि ११३२ मत-मतान्तरों के आचार्यो पर विजय तथा सुधन्वा आदि धार्मिक राजाओं द्वारा अनादिकालीन वर्णाश्रम धर्म व्यवस्थानुसार राज्य करना।
भूलोक का उद्धार करते हुए कश्मीर मण्डल में शारदा भगवती के सर्वज्ञासन पर आसीन होकर शास्त्रार्थ करना।
२६६३ कार्तिक पूर्णिमा---- देवताओं के प्रार्थना करने पर उसी शरीर से विमान पर बैठकर कैलाश गमन।
इन्ही सभी प्रमाणों के घण्टा-घोष से आज तक चली आ रही जगदगुरुओं की आचार्य परम्परा से आचार्य का समय विक्रम संवत २०५६ तक शंकराचार्य संवत २४७० हो चुके हैं, यह सिद्ध हुआ।
शारदा मठ के प्रथम आचार्य युधिष्ठिर संवत २६९१ चैत्र कृष्ण अष्टमी पर्यंत रहे।
इस मठ के ९वें आचार्य श्री ब्रह्मज्योत्स्नाचार्य युधिष्ठिर संवत ३०४० चैत्र कृष्ण चतुर्थी तक रहे।
दशम श्री आनंद आविर्भावचार्य विक्रम संवत ९ फाल्गुन शुक्ल नवमी तक रहे।
जो लोग ईस्वी सन ७८८ में आचार्य का जन्म मानते हैं , उस समय शारदा मठ के सोहलवें आचार्य श्री वैकुंठाश्रम जी महाराज विक्रम संवत ८८५ आषाढ़ कृष्ण षट पर्यंत ईस्वी सम्वत ८२८ में २६ आचार्य हो चुके थे।
तब आचार्य का जन्म ७८८ ईस्वी को कैसे माना जा सकता है ??
इतना ही नहीं, श्री सुरेश्वचार्य जी से लेकर अभिनव श्री सच्चिदानंद जी तीर्थ पर्यंत शारदा मठ के सभी जगदगुरुओं की संगमरमर की मूर्तियां है।
उनके नीचे उनके नाम, युधिष्ठिर संवत सहित खुदे हुए हैं।
यदि शंकराचार्य जी का उस समय जन्म हुआ होता तो आचार्यपाद ने अपने प्रस्थानत्रयी के भाष्यों में वेद-विरोधी अनेको नास्तिक सम्प्रदाय चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि के शिद्धान्तों का खंडन किया है तो ईसाई तथा मुसलमानों का खंडन नहीं कर सकते थे ???
सुना जाता है कि केरल के कालटी में ही ईस्वी सम्वत १०१ में दक्षिणी भारत का पहला गिरिजाघर बना, पर किसी भी दिग्विजय में इसका उल्लेख नहीं मिलता है ।
पूज्य स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी महाराज ने 'भागवत-दर्शन' नामक एक ग्रँथ दो खण्डों में प्रकाशित किया है।
उसके प्रारम्भ में ही श्री शंकराचार्य जी का काल उन्होंने यही माना है।
शारदा आदि मठो के समान जगन्नाथ गोवर्धन मठ की प्राचीन गुरु परम्परा भी इस मठ के १४३वें शंकराचार्य ब्रह्मीभूत स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी के प्राचीन ग्रन्थागार में वर्तमान पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री स्वामी निश्चलनन्द जी सरस्वती को प्राप्त हुआ।
उसमें भी ईसा तथा विक्रम से पूर्ववर्ती आचार्यों का काल दिया है, जो आगे इस मठ की परम्परा में लिखा जाएगा।
कामकोटि की परम्परा भी सम्वत व तिथि सहित दी हुई है।
कुछ लोग ज्योतिर्मठ के आचार्य कम होने के कारण काल कम कहते हैं।
इस पीठ पर २० चिरंजीवी आचार्य हुए हैं जो आज भी जीवित है-----------
"त्रोटको विजय: कृष्ण: कुमारो गरुड़ध्वज:।
विन्ध्यो, विशालो वकुलो वामन: सुंदरोsरुण:।।
श्रीनिवास:, सुखानन्दो,विद्यानंद: शिवो गिरी:।
विद्याधरो, गुणानंदो नारायण उमापति:।।
ऐते ज्योतिर्मठाधीशा आचार्याश्चिरजीवन:।
य एतान् संस्मरेन्नित्यं योग सिद्धिं स विन्दति।।"
इन चिरंजीवी ज्योतिर्पीठ के आचार्यों का नित्य स्मरण करने वाले को योग सिद्धि प्राप्त होती है।
इस पीठ के ४०० वर्ष बीच के आचार्यों का पता नहीं चलता।
इसमें श्री रामकृष्ण स्वामी के बाद रावल ब्राह्मणों की परंपरा चली है।
बीच में १२ रावल ब्राह्मण हुए।
इसके आगे भी बीच में १६५ वर्ष तक गद्दी रिक्त रही।
उसके बाद विक्रम संवत १९९८ में श्री स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज आचार्य पद पर अभिषिक्त हुए।
श्रृंगेरी की परम्परा भिन्न प्रकार की है।
कुछ विद्वान सोलह सौ सत्तर वर्ष, कुछ बारह सौ वर्ष मानते हैं।
जबकि इसीकी शाखा कुडली मठ में विक्रम संवत १९७० से पूर्व ६३वें आचार्य शंकर भारती जी हुए हैं।
अतः श्रृंगेरी परम्परा संदिग्ध प्रतीत होती है।
चक्रवर्ती सम्राट सुधन्वा के ताम्रलेख का हिंदी अनुवाद ~~~
"""श्री सदाशिव अपरावतार शंकर की चौसंठ कला विलास विहार मूर्ति बौद्घ आदि दानवों के लिए नृसिंह मूर्ति ,
वैदिक वर्णाश्रम शिद्धान्त के उद्धारक मूर्ति,
मेरे साम्राज्य की व्यवस्थापक मूर्ति,
विश्वेश्वर गुरु के पदपर गायी जाने वाली मूर्ति,
सम्पूर्ण योगियों के चक्रवर्ती,
श्री शंकराचार्य के चरण कमलों में (प्रणाम करके) भ्रमर के समान मैं सुधन्वा राजा चंद्रवंश चूड़ामणि महाराज युधिष्ठिर की परम्परा से प्राप्त भारतवर्ष का राजा हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन करता हूँ।
भगवत्पाद ने दिग्विजय करके सभी वादियों को पराजित किया।
सत्ययुग के समान चारो वर्ण--आश्रमों को स्थापित करके पूर्णरूप से वैदिक मार्ग पर शास्त्रानुसार (वैदिक धर्म) में नियुक्त किया।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा शक्ति आदि देवताओं के स्थानों को, जो कि सम्पूर्ण देश में स्थित है, उनका उद्धार किया।
समस्त ब्राह्मण कुलों का उद्धार किया।
सम्पूर्ण देश में हमारे जैसे राजकुलों द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रचार प्रसार करके, अध्ययन-अध्यापन द्वारा उन्नत किया।
हम जैसे प्रमुख ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि की प्रार्थना से सम्पूर्ण देश के चारों दिशाओं में चार राजधानियों, पूर्व में जगन्नाथ, उत्तर में बदरी नारायण, पश्चिम में द्वारका तथा दक्षिण में श्रृंगी ऋषि के क्षेत्र में श्रृंगेरी के क्रमानुसार भोगवर्धन, ज्योति, शारदा तथा श्रृंगेरी नामक मठ स्थापित किये।
उत्तर दिशा में योगीजनों की प्रधानता वाले धर्म की मर्यादा की रक्षा सरलता से करने वाले ज्योतिर्मठ में श्री त्रोटकाचार्य जिनका दूसरा नाम प्रतर्दनाचार्य को,
श्रृंगी ऋषि के आश्रम श्रृंगेरी मठ में उन्ही के समान प्रभाव वाले पृथ्वीधाराचार्य जिनका दूसरा नाम हस्तामलकाचार्य है को,
भोगवर्धन जगन्नाथपुरी में अत्यंत अभीष्ट, उग्र स्वभाव वाले, सबकुछ जानने में समर्थ, पद्मपादाचार्य जिनका दूसरा नाम सनन्दनाचार्य है को,
तथा बौद्ध कापालिक आदि सम्पूर्ण वादियों की प्रधानता वाली पश्चिमी दिशा में वादी रूपी दैत्यों को परास्त करके द्वारका शारदा मठ में भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारा निर्मित भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर को जैनियों द्वारा ध्वस्त देखकर उसकी दुर्दशा को दूर किया तथा त्रैलोक्य सुंदर नाम का भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर निर्माण करके शास्त्र मर्यादा से प्रतिष्ठित किया।
सम्पूर्ण वैदिक, लौकिक तथा तांत्रिक मर्यादा के पालक विश्वविख्यात कीर्तिमान, सर्वज्ञान स्वरूप विश्वरूपाचार्य जिनका अपर नाम सुरेश्वचार्य है को, हम सब लोगों की लोकसम्पत्ति से अभिषिक्त किया।
भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चारों आचार्यों को नियुक्त करके आज्ञा दी, यह चारों आचार्य अपने-अपने पीठ के मर्यादा अनुसार मण्डल की रक्षा करते हुए वैदिक मार्ग को प्रकाशित करें।
हम सभी मण्डलस्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मंडलों के अधिकारी आचार्यों की आज्ञा का पालन करते हुए व्यवहार करें।
भगवान शंकराचार्य जी की आज्ञानुसार वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण आदिकों का महत् निर्णय करने में परम् समर्थ श्री सुरेश्वचार्य जो कि उक्त लक्षणों से युक्त हैं, सबके व्यवस्थापक हों।
हमारी राजसत्ता के समान निरंकुश गुरुसत्ता भी ऊपर कही हुई शास्त्र मर्यादा के अनुसार अविचल रूप से कार्य करें।
मेरे इस पीठ पर महाकुलीन ब्राह्मण, सन्यासी, सम्पूर्ण वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता आचार्य के विशेषताओं से युक्त ही भगवत्पाद शंकराचार्य के पीठ पर बैठने के अधिकारी हों, इसके विपरीत नही।
इसप्रकार भगवत्पाद की आज्ञानुसार नियमों में बंधे हुए हम ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वंश में उतपन्न हुए लोगों को इन आदेशों का परम् प्रेमपूर्वक पालन करना चाहिए।
यही आपलोगों से मेरी भी प्रार्थना है।
विश्व का कल्याण हो।
युधिष्ठिर सम्वत २६६३ अश्विन शुक्ल १५ """
आचार्य शंकर का समय तथा "विविध ज्ञान" नामक मराठी लेख का हिन्दी अनुवाद ~~~
भगवत्पाद भाष्यकार के प्रादुर्भाव की समस्या अति जटिल पहेली सी बन गई है।
यद्यपि केवल श्रृंगेरी को छोड़कर अन्य सभी शंकर मठों की परंपरा से आचार्य का जन्म दो सहस्त्र वर्ष पूर्व सिद्ध होता है, तद्यपि प्रत्येक मठ का सम्वत एक दूसरे से नहीं मिलता है।
कामकोटि के मतानुसार ईसा से ५०८ वर्ष या ५०९ वर्ष या ४४२ वर्ष या ४७६ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है।
द्वारका शारदा मठानुसार ईसा से ४७१ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है।
गोवर्द्धन मठ की परम्परानुसार ईसा से ४८१ वर्ष पूर्व आद्य शंकर ने इस मठ की स्थापना करके श्री पद्मपादाचार्य जी का अभिषेक किया।
अतः काल के सम्बंध में चारों का मतैक्य नहीं है।
इसका कारण बताते हुए काशी से प्रकाशित होने वाली "पाक्षिक सिद्धांत" पत्रिका के १४वें वर्ष के अक्टूबर मास में "श्री महादेव राजाराम वोडस" एम. ए. , एल. एल. बी. ने ईस्वी सन १९२३ में "विविध ज्ञान विस्तार" नाम मराठी लेख का अनुवाद करते हुए "भगवान आद्य शंकराचार्य और उनका समय" लेख में लिखते हैं--------
श्री शंकराचार्य के मठों में संग्रहित किये हुए ग्रन्थों एवं कागजातों में से बहुत सी ऐतिहासिक सामग्री मिली होती -- तो ऐसा मतभेद न पाया जाता, परन्तु दुर्भाग्य से वह नष्ट हो गई।
थोड़ी बहुत जो कुछ बची भी थी तो वह मठाधीशों से प्राप्त नहीं होती।
इस विनाश का कारण विशेषकर पेशवाओं के ब्राह्मण सरदार हुए।
यह बड़े दुख की बात है, पर उसका उल्लेख करना अनिवार्य है।
शंकराचार्य के मठों का विध्वंस पेशवाओं के सरदारों ने किया।
इस विषय पर ऐतिहासिक प्रमाण अब 'वासुदेव शास्त्री खरे" द्वारा मुद्रित "ऐतिहासिक लेख संग्रह" में प्रकाशित हुआ है।
हरिपन्त फड़के की सेना ने द्वारिका मठ सन १७७५ ईस्वी में लूटा ।
कोन्हरे राव पटवर्धन ने करवीर मठ सन १७७६ ईस्वी में भस्म कर दिया।
परसुराम भाऊ ने सन १७९१ ईस्वी में टीपू के आक्रमण में मैसूर के कुडली मठ का नाश किया औऱ उसी समय रघुनाथ राव पटवर्द्धन के लमाड़ो ने श्रृंगेरी मठ को विध्वस्त किया।
जिस श्रृंगेरी मठ को टीपू सुल्तान ने भी जागीर और वर्षाशन प्रदान किये, उस मठ का सर्वस्वापहरण ब्राह्मण सरदारों के हाथों होना उद्वेगजनक है।
मठ के देवी-देवताओं के प्रतिमाएं भी लूट ली ; इससे श्रृंगेरी के स्वामी उपवास करने लगे।
"इस पाप के कारण अपने राज्य पर संकट आयेगा।"
ऐसा पूना के दरबार में नाना फडणवीस को भय उतपन्न हुआ।
स्वामी के नुकसान की भरपाई करने के विषय में नाना फडणवीस ने बहुत आग्रह किया ; पर पटवर्द्धन ने ध्यान नहीं दिया।
पेशवाई के अंत में सब सरदारों की नैतिक अवनति, स्वार्थ परायणता तथा स्वयं पेशवाओं के दुर्बलता के कारण ऐसे पापाचरण बढ़कर मराठेशाही का अंत हुआ होगा।
गांव के धनी साहूकार मठों का आश्रय करते थे ; इसलिए कहा जाता है कि मठ लूटे जाते थे।
कुछ भी हो ; इस आगजनी लूटपाट के कारण मठों के कागजतों का जो विध्वंस हुआ, उस हानि की पूर्ति तो अब हो सकने योग्य नहीं है।
श्रृंगेरी, कुडली, करवीर और द्वारका में अब कोई कागजात नहीं है।
ज्योतिर्मठ लुप्तप्राय है। जगन्नाथ मठ नाम शेष रह गया है।
हप्पी, शिवगंग आदि मठ अर्वाचीन है।
कांची या कुंभकोणम मठ के पीठाधीश्वर अपने को प्राचीन समझते हैं और अपने पास आधार होना बतलाते हैं।
परन्तु वह आधार अभी प्रकट नहीं हो रहा है।
इसके शिवा इन मठों का अनेकबार स्थलांतर होते रहने के कारण असली कागजात सुरक्षित बचे रह गए होंगे, इसमें संदेह ही है।
आचार्य श्री के जन्मस्थान 'कालटी' ग्राम का हाल में पता लगा है, यह बड़ा अन्वेषण का कार्य हुआ ऐसा कहना चाहिए।
वह सर्वांस में नष्ट होकर उसके आस-पास की सर्वभूमि ईसाई लोगो के स्वामित्व में चली गई थी।
जैसे पहले बताया जा चुका है।
ईस्वी सन १९१० में श्रृंगेरी पीठाधीश्वर ने सत्ताईस हजार रुपयों में वह तीस एकड़ जमीन खरीदकर वहां (जन्मभूमि में) मन्दिर, मठ और घाट का निर्माण कराया है।
ईस्वी सम्वत की दूसरी शतीं से सीरियन इशाइयों का निवास मालाबार में हुआ था ; वहीं भारतवर्षीय धर्मक्रान्तिकर्ता जगदगुरुओं का अवतार हुआ, यह विचित्र योगायोग की बात है।
श्रीमदाचार्य जी की जन्मभूमि सैंकड़ों वर्षों तक इशाइयों के अधिकार में रहने के उपरांत बीसवीं शताब्दी में महाप्रयास से उसका पता लगा है, यह दैव गति विचित्र है।
इसके जीर्णोद्धार का श्रेय श्रृंगेरी पीठस्थ श्री स्वामी सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह भारती, त्रावन्कोर के तत्कालीन दीवान 'बी. पी. माधवराव' और मैसूर के प्रधान उच्च न्यायाधीश 'श्री रामचन्द्र अय्यर' इन तीन पुरुषों को है।
निर्जन अरण्य का अब सुंदर क्षेत्र हो गया है,
वहां जंगली सिंह, जानवरों की भयप्रद आवाज के स्थान पर अब हर समय वेद, शास्त्रध्ययन की पवित्र एवं शांत ध्वनि सुनाई पड़ती है।
आचार्यचरण का जन्मस्थान जैसे निश्चित रूप से सिद्ध हुआ है, वैसे ही जन्मकाल का भी अंतिम निर्णय हो जाये ; तो भारतवर्ष के प्राचीन तथा अर्वाचीन इतिहास की विभाजक मध्य रेखा निश्चित हो जाएगी ।""'
उपर्युक्त लेख से यह सिद्ध होता है कि मठों का वास्तविक इतिहास लुप्तप्राय: हो गया है।
हो सकता है कि मठाधीशों के संयुक्त प्रयास से काल सम्बन्धी यथार्थ निर्णय हो सके।
कुछ विद्वानों के मतानुसार अन्य मठों के समान श्रृंगेरी मठ भी कहीं अन्यत्र था।
श्रृंगेरी को छोड़कर और मठों की परंपरा दो सहस्त्र वर्ष पूर्व सिद्ध होता है।
श्रृंगेरी मठ की ही शाखा कुडली तथा करवीर मठ है।
कुडली मठ की परम्परानुसार इस मठ में आज से ८२ वर्ष पूर्व ४४ आचार्य हुए हैं, तो फिर इसके ८८ वर्ष पश्चात ८ आचार्यों का कम होना परमाश्चर्य का विषय है।
इसका सविस्तार उल्लेख श्रृंगेरी मठ के इतिहास में किया जायेगा।
कुछ लोगों का कथन है कि श्रृंगेरी के अतिरिक्त अन्य मठों की परम्परा इतिहास विरुद्ध होने के कारण अमान्य है।
परन्तु वर्तमान अंग्रेजों द्वारा लिखा हुआ इतिहास भारतीय प्राचीन ऐतिहासिक ग्रँथ वाल्मीकीय रामायण, महाभारत तथा पौराणिक इतिहास के विरुद्ध है।
अर्वाचीन इतिहास ईसाइयों के बाईबल के आधार पर है।
इसके अनुसार पूरा सृष्टि चक्र ही किसी के मत से तीन हजार वर्ष, किसी के मत से मत से चार हजार तथा किसी के मत से पांच हजार वर्ष से अधिक की नहीं है।
इनके मत में 'हां' मिलाने वाले पूर्वी विद्वान भी इसीको मानते हैं।
यह लोग तो रामावतार को भी छः हजार वर्ष से पूर्व का नहीं मानते।
अतः इनलोगों ने सभी के समय को कम करते हुए श्री शंकराचार्य के काल को भी कम किया है।
वैसे भी ये लोग व्यास, बाल्मीकी के विरुद्ध होने से माननीय नहीं है।
शारदा मठ के जगद्गुरु श्री शंकराचार्य सच्चिदानंद भारती जी महाराज की आज्ञा से श्री काशी लक्ष्मण शास्त्री जी ने "गुरुवंश काव्यम्" नामक ग्रँथ लिखा है।
इसके ८वें सर्ग के ३८वें श्लोक से लेकर ४२वें श्लोक तक , इस मठ में १५वें शंकराचार्य श्री नृसिंह भारतीन्द्र जी के विषय में कहा है--------
" नृसिंह भारतिश्चंद्र गोकर्णेश दिदृक्षया ।
गतोज्येष्ठाभ्यनुज्ञातो हालाडि ग्राममाययौ ।।३८।।
मन्त्रविमन्त्र राजन्तं संप्रतिष्ठाप्य तत्र स:।
चिरमध्यास्य चागत्य ज्यायसोsनन्तरं वभौ।।३९।।
योगिराजो मुदा यस्मिन् योगराजं प्रशासति।
भक्तिमान् विक्रमाख्योभूच्चक्रव्रती धुरन्धर:।।४०।।
समागत्य समीपेsस्य योगभाजो महामुने: ।
योगार्थ नामनि स्वीये विक्रमी प्रत्यपद्यत: ।।४१।।
विमृशन् वेदभाष्यार्थान् वेदांतसाक्त मानस: ।
ख्यातो नृसिंह योगीन्द्र: सन्मार्गे समपीपलत् ।।४२।।
नृसिंह भारतीन्द्र नाम के जगद्गुरु जी ज्येष्ठ गुरुओं की आज्ञा प्राप्त करके गोकर्णेश की दर्शन की इच्छा से हालाडी ग्राम में गये ।३८।।
जगदगुरु जी ने वहां पर मंत्रराज की प्रतिष्ठा करके चिरकाल तक आराधना करके महानता प्राप्त की ।३९।।
योगिराज के प्रसन्नतापूर्वक योग प्रशासन करते हुए विक्रम नाम के परम् भक्तिमान् चक्रवर्तियों में धुरन्धर हुए ।
महाराज विक्रम ने महामुनि के समीप आकर योग की प्रशिद्धि के लिए अपने विक्रमी नामक सम्वत को चलाया।
वेदांत में आसक्तचित्त वाले महाराज ने वेद के भाष्यों पर विचार करते हुए महाराज नृसिंह योगिंद्र जी के सन्मार्ग का अनुशरण किया ।४०-४२।।
उपर्युक्त "गुरुवंश काव्यम के प्रमाण से उज्जैन के महाराज प्रथम विक्रमादित्य ही सिद्ध होते हैं।
क्योंकि इनके नाम मे "चक्रवर्ती धुरन्धर:" विशेषण आया है।
यह केवल प्रथम विक्रमादित्य का सिद्ध होता है, चालुक्यवंशी विक्रम का नहीं।
क्योंकि इस मठ की परम्परा से आद्य शंकर का जन्म चालुक्यवंशी विक्रम के पंद्रहवें वर्ष में माना जाता है।
श्री नृसिंह भारती जी महाराज आद्य शंकर से श्रृंगेरी परम्परानुसार ६३६ वर्ष बाद हुए।
उस समय उज्जैन के महाराज का आना सिद्ध होता है।
और फिर महाराज सर्वजित का ताम्रशासनम् में भी आचार्यपाद आज से लगभग २५०० वर्ष पूर्व ही सिद्ध होते हैं।
"जिनविजय" ग्रँथ से भी यही बात सिद्ध होती है।
आचार्य शंकर के जीवन वृत्त सम्बन्धी ग्रन्थों का परिचय ~~~~~
१..... भगवान भाष्यकार का जीवनवृत्त शिवरहस्यम् , कूर्मपुराणम् , भविष्योत्तरपुराणम् , मार्कण्डेयसंहिता, लिंगपुराणम् , वायुपुराणम् , शिवपुराणम् आदि पुराणों में आया है ।
२... "वृहच्छन्कर दिग्विजय". यह चित्सुखाचार्य द्वारा रचित (अप्रकाशित) प्राचीन शंकर विजय है। (इसका कुछ अंश ही मिलता है)
३.... "ब्रह्मानंदीय शंकरविजय" जगद्गुरु सर्वज्ञात्म मुनि के गाणपत्य शिष्य ब्रह्मानंद द्वारा रचित , १०००० श्लोकों में है।
इसकी हस्तलिखित पुस्तक कुम्भकोणम में श्री महादेव शास्त्री से प्राप्त हुई।
४... "व्यासचलीय शंकरविजय" इसके रचयिता काँचीकामकोटि पीठाधीश्वर श्री महादेवेंद्र सरस्वती जी है। यह मद्रास से प्रकाशित है।
५..... "आनंदगिरीय शंकरविजय" इसके लेखक श्री स्वामी आनंद गिरी जी हैं।
यह ग्रँथ काशी, कुम्भकोणम तथा तेलगू लिपि में छपा था।
किसी ने ६० अध्याय तथा किसी ने ७५ अध्याय माना है।
६... "माधवीय शंकरविजय", यह आनंदगिरीय विजय का ही संक्षिप्त संस्करण है।
इसकी रचना सायण के बड़े भाई माधव ने सन्यास से पूर्व की थी।
इन्ही का सन्यास का नाम श्री विद्यारण्य स्वामी जी था।
इसपर धनपति सूरी की "डिंडिम" तथा "अद्वैतराजलक्ष्मी" नामक दो व्याख्याएं आनंदाश्रम पूना से प्रकाशित हुई है।
७.... "चिद्विलासीय शंकरविजय विलास" , इसकी रचना स्वामी चिद्विलास यति ने की है।
८.... 'शंकर दिग्विजय सार' यह ग्रँथ सारस्वत श्री सदानन्द जी द्वारा रचित "दुंदुभी" व्याख्या सहित है।
९..... गोविंद नाथीय "श्रीमच्छंकराचार्य चरितम्" , यह ग्रँथ श्री गोविंद नाथ जी ने लिखा है तथा "तिरुपुण्णि चुरत दिवाकर द्विजेन्द्र" द्वारा प्रकाशित है।
१०... "केरलीयशंकर विजयम्" सुष्माटिका सहित आंशिक रूप में मिलता है।
११... "पतञ्जलिचरितम्" , इसकी रचना श्री रामभद्र दीक्षित जी ने की है।
इसमें मुख्य रूप से श्री पतंजलि, गौडपादाचार्य, चन्द्र शर्मा तथा गोविंद भगवत्पादाचार्य का चरित्र है। यह काव्य ग्रँथ है।
१२.... "शंकराभ्युदयम्" यह श्री राज चूड़ामणि दीक्षित द्वारा रचित है। इसमें छः अध्याय तक की व्याख्या उपलब्ध है।
१३.... "गुरुवंश काव्यम्" इसकी रचना स्वामी श्री सच्चिदानंद जी भारती की आज्ञा प्राप्त करके विद्वत बालक काशी लक्ष्मण शास्त्री ने की है तथा सप्तम सर्ग पर्यंत स्वयं व्याख्या की है।
यह मूलमात्र सम्पूर्ण ग्रँथ "श्री वणीविलास प्रेष" श्रीरंगम से प्रकाशित है।
इसकी रचना विक्रम संवत १७७२ में हुई।
इसके प्रारम्भ के तीन सर्गों में भगवत्पाद का चरित्र है।
१४.... "शंकर मंदार सौरभ" यह नीलकण्ठ जी की रचना है। इसी नाम की व्याख्या सहित अप्रकाशित है।
यह सुब्रमण्यम शास्त्री जी को हस्तलिखित प्राप्त हुई है।
१५.... "जगद्गुरु रत्नमाला स्तव:" इसे कामकोटि के आचार्य श्री सदाशिव ब्रह्मेन्द्र सरस्वती जी ने लिखा है और आत्मबोधेन्द्र सरस्वती जी ने "सुष्मा" नामक टिका की है।
इसमें ३३ श्लोकों में शंकराचार्य जी का चरित्र है।
१६... "पुण्य श्लोकमंजरी" इसकी रचना व्यासचलीय श्री महादेवेंद्र सरस्वती जी के प्रशिष्य श्री सर्वज्ञ सदाशिवबोधेंद्र महाराज जी ने की है।
जिन्होंने कामकोटि के ५५ आचार्यों की जन्मभूमि, दिक्षानाम, पितानाम तथा सिद्ध स्थली का स्मरण किया है।
१७.... "भगवत्पाद सप्तति:" इसमे श्री जगन्नाथ कवि द्वारा रचित ६० श्लोकों द्वारा शंकर जयंती में उपहार प्रस्तुत किया है।
१८.... "यति सार्वभौमोपहार" यह ग्रँथ शंकर किंकर श्री ब्रह्मानंद कारमंदीनर कंठीरव कवि प्रणीत ८० श्लोकों में शंकर जयंती पर उपहार है।
१९... "जगद्गुरु परम्पर्यस्तुति:" इसमें कुड़ली ,शृंगेरी मठ की गुरु परम्परा है।
२०..... "गोवर्धन पीठ जगद्गुरु मालास्तोत्रं"
२१.... "श्री शंकर भगवत्पाद द्विसहस्त्र नाम स्तोत्रं" जिनमें से एक हिन्दुमत कलाचारप्रचार संघ द्वारा प्रकाशित है तथा भाष्य स्वामी द्वारा रचित है।
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