कावड यात्रा आधारित जीवन-संदेश

*💥कावड यात्रा आधारित जीवन-संदेश💥*

कावड़ यात्रा एक प्रतीक क्रिया है जो कर्मकाण्ड के अन्तर्गत आती है. कावड़ यात्रा के अन्तर्गत हमारे द्वारा “सदानीरा नदी“ के शुद्ध जल से [ अर्थात जो नदी सदैव प्रवाहित बनी रहने वाली है या जिस नदी का प्रवाह कभी थमता नहीं है उस सतत प्रवाह वाली नदी के बहते हुए शुद्ध जल से ] दो छोटे पात्र में जल भरकर तथा दोनों ही पात्र को भाररहित अवस्था में अपने कंधो पर धारणकर शिवमन्दिर की ओर प्रस्थान किया जाता है तथा शिवमन्दिर पहुँचकर, साथ में लाये गये दोनों ही पात्र के जल द्वारा - शिवविग्रह का - जलाभिषेक किया जाता है.।

कावड यात्रा में हमारा एक ही गन्तव्य होता है – शिवविग्रह को प्राप्त कर, उसका जलाभिषेक करना. इस लक्ष्य प्राप्ति के पूर्व न तो हमारे द्वारा गन्तव्य में परिवर्तन किया जाता है और न यात्रा को विराम ही दिया जाता है. इस प्रकार कावड़ यात्रा को पूर्ण करता हुआ कावड़ यात्री [कावड़िया] स्वयं को कृतार्थ मानता है. वह इस प्रकार शिवपूजन करता हुआ स्वयं को कृतकृत्य जानता है।

अनवरत रूप से चलने वाले इस सृष्टिचक्र में कावड़ यात्रा की यह क्रिया प्रतीकात्मक होकर आत्म-साधना के अति गुप्त रहस्य से सम्बन्धित एवं प्राणोंपासना पर आधारित होना जानी गयी है. इस कावड़ यात्रा का रहस्यबोध प्राप्त करने हेतु विचारणीय है कि - धर्मग्रंथ इस मानव देह में स्थित अविनाशी, अजर, अमर, आत्मा को शिवस्वरूप होना कथन करते हैं।

पूज्यपाद आचार्य आदिशंकर द्वारा - शिवोहम, शिवोहम - का जयघोष किया जाकर, स्वयं को ही शिवस्वरूप होना कथन किया है, इस देहस्थ जीवात्मा को ही शिवस्वरूप होने का उद्घोष किया है. आत्मसाधना में योगी पुरुष इस देहस्थ आत्मा को ही आदिदेव शिव का विग्रहरूप होना तथा इसे अनादि एवं देहरूपी मन्दिर में निवास करने वाला जानते हैं।

कठोपनिषद में श्रुति इस शिवस्वरूप - परम पुरुष परमात्मा - को ज्योतिर्मय होना एवं अपनी पूर्णता को धारण करते हुए सब मनुष्यों [ स्त्री – पुरुषों ] के हृदय में निवास करने वाला कथन करती है. इसे धूम रहित स्थिर ज्योति के समान होना वर्णन करती है. [कठ.उप. २.१.१२-१३ एवं २.३.१७]

योग - साधना के मार्ग में, सिद्धावस्था को प्राप्त - आत्मज्ञ, वेदविद, मनीषी पुरुष - नासिका के उभय स्वर में सतत प्रवाहित, प्राणवायु के प्रवाह को ही सदानीरा नदी रूप में गंगा और यमुना नदी होना कथन करते हैं. योगी - सिद्धपुरुषों द्वारा नासिका स्वर की इन दोनों ही नाड़ियों को इड़ा और पिंगला तथा सूर्य एवं चन्द्र नाडी भी कहा गया है।

इन दोनों ही नाड़ियों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला प्राणवायु ग्रहण करते समय शीतलता का बोध प्रदान करता है. चूँकि श्रीमद्भगवदगीता में इस मानवदेह को वस्त्र या अविनाशी आत्मा द्वारा धारण किया गया बाह्य कलेवर कहा गया है. [गीता २.२२ एवं ८.५ व ६ ] अतः स्थूल नदी के जल स्नान करना या डूबकी लगाना तो सदैव ही देहरूपी वस्त्र या अजर - अमर आत्मा द्वारा धारण किये गये बाह्य कलेवर को ही धोना होता है।

यह तो मात्र शरीर को शुद्ध करना या देह के मैल या देह की गन्दगी को दूर करना होता है, जो इस जीवात्मा को विकारमुक्त करता नहीं है . अतः जीवात्मा का स्नान तो नासिका के उभय स्वर में सतत प्रवाहित होने वाले प्राणवायु के शीतल प्रवाह में अवगाहन से सम्बन्ध रखता है जिसे सूचित करने के लिए ही इन दोनों नासिका स्वर को गंगा और यमुना नदी कहा गया है. तथा इनके संयुक्त प्रवाह को सुषुम्ना कहा जाकर इसे ही तीर्थराज प्रयाग होना वर्णन किया गया है।

अतः शुद्ध जल और नियत गन्तव्य की भांति आचरण की निर्मलता तथा चित्त की एकाग्रता और धैर्य को अपनाकर नासिका के उभय स्वर में प्रवाहित होने `वाले प्राणवायु के इस शीतल प्रवाह में अवगाहन करना ही जीवात्मा का स्नान करना होता है. इस प्रकार किया गया स्नान ही इस जीवात्मा को कर्म विकार से मुक्त करने वाला होता है।

श्रीमद्भगवदगीता में आया ‘नासिकाग्रे दृष्टि और दिशाओं का अवलोकन नहीं करने’ का कथन इस अवस्था को ही सूचित करता है. [गीता ६.१३]
आत्मसाधनारत योगी पुरुषों द्वारा नासिका के दायें स्वर को गवंगा नदी एवं बाएं स्वर को यमुना नदी कहा गया है तथा इन दोनों नासिका स्वर में प्राणवायु के एकरूप सम प्रवाह को ही सुषुम्ना नाडी या प्रयागराज कहा गया है।

अतः अविनाशी अदृष्य जीवात्मा का स्नान करना तो प्राणवायु की शीतलता से सम्बन्ध रखता है. इस अवसर पर ज्ञातव्य है कि नासिका के उभय स्वर से ग्रहण करते समय प्राणवायु मरुभूमि में भी शीतलता का बोध प्रदान करने वाला होता है. अतः नासिका स्वर से प्रवाहित होने वाले प्राणवायु के शीतल प्रवाह में अवगाहन करना ही इस जीवात्मा का स्नान करना माना गया है।

नासिका के उभय स्वर में प्रवाहित होने वाले प्राणवायु के शीतल प्रवाह में अवगाहन करने हेतु चित्त कि एकाग्रता अपनाना आवश्यक होता है किन्तु सुषुम्ना नाडी में प्रवाहित होने वाला प्राणवायु स्वभावतः शीतलता का बोध प्रदान करता है. जिसे कुण्डलिनी जागरण कहा गया है।

इस प्रकार प्रवाहित प्राण ही देहस्थ जीवात्मा को आपादमस्तक शीतलता की अनुभूति प्रदान करता है. यह नासिका के दोनों ही स्वर में भाररहित अवस्था को अपनाकर अल्प मात्रा में प्रवाहित होता है. अतः कावड़ यात्रा की यह स्थूल क्रिया तो नासिका के उभय स्वर से सम्बन्ध रखने वाली है. यह उभय स्वर में प्रवाहित होने वाला प्राण ही देहस्थ अविनाशी आत्मा का बोध प्रदान करता है।

सर्वरूप से एकाकार अवस्था का बोध प्रदान करता है अतः इसे ही अमृत प्राप्ति के कुम्भ स्नान से जोड़ा जाकर भी लोकस्मृति में धारण किया गया है. हम देहस्थ शिवस्वरूप आत्मा का बोध प्राप्तकर, कुन्डलिनी की जाग्रत अवस्था को धारण करें, हम स्व - आत्मस्वरूप की शीतलता को प्राप्त करें इस उद्देश्य को प्रतिबोधात्मक रूपमें  सूचित करना ही कावड़ यात्रा का एकमेव आधार है।

अतः कावड़ यात्रा की स्थूल क्रिया तो तमोगुण की प्रधानता वाले व्यक्ति के लिए ही लाभप्रद कही जा सकती है।

किन्तु जो साधक योगमार्ग के पथिक हैं उनके लिए तो प्राणायाम की प्रक्रिया पर आधारित इस अतिगुढ़ कावड़ यात्रा को अपनाकर, प्राणवायु की शीतलता से ही देहस्थ शिवस्वरूप आत्मा का जलाभिषेक करना ही आत्मकल्याण कारी है. इस प्रकार किया गया शीतलता का स्नान ही शिवस्वरुप अविनाशी आत्मा की आराधना करना है जो इस देहस्थ जीवात्मा को कर्म विकार से मुक्त करने वाला है।

यही मनुष्यरूप जीवात्मा को जन्म – जन्मान्तर के कर्म बंधन से मुक्त करने वाला युगों – युगों से प्रचलित साधना मार्ग है जिसे श्रावन मास की कावड़ यात्रा रूप में स्मृति में धारण किया गया है।

श्रेय आधारित जनसुविधा और आत्मकल्याण का यही धर्म-मार्ग है. अतः सड़क मार्ग को सुव्यवस्थित एवं गमनागमन योग्य बनाये रखने के लिए युग परिवर्तन के अवसर पर आगामी श्रावण मास में हमें प्राणायाम की प्रक्रिया पर आधारित इस मूल कावड़ यात्रा का ही अनुपालन करना चाहिए । ॥ॐ हरि: ॥

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