आचार्य शंकर
एक दिन आचार्य शंकर प्रातः काल शिष्यों सहित गंगा-स्नान करके नित्यकर्म के अनन्तर लौट रहे थे।
मार्ग में ही इन्हें मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये हुए, मदिरा सिर पर रखे हुए, हाथ में चार कुत्तो की डोरी पकड़े हुए, दो पत्नियों सहित एक अन्त्यज को देखा।
उसको देखते ही स्वामी जी ने "गच्छ, गच्छ" कहा ।
इसको सुनकर अन्त्यज बोला------
"आप किसे जाने के लिए कहते हो?
एक, अद्वितीय, निर्दोष, असंग, सत्य ज्ञानस्वरूप, अखण्ड आनंद ब्रह्म को दूर करते हो या अन्नमय कोष को ?
हे यतिवर ! अन्नमय कोष से अन्नमय कोष को दूर करते हो या चैतन्य से चैतन्य को दूर करते हो ?
हे विद्वन् ! गंगा में प्रतिबिंबित होने वाला सूर्य तथा चाण्डाल की वापी में प्रतिबिंबित होने वाले सूर्य में क्या अंतर है ?
सोने के घड़े के भीतर आकाश में तथा मिट्टी के घटाकाश में क्या कोई अंतर है ?
आत्मा में कोई भेद नहीं है, फिर यह ब्राह्मण है, यह चाण्डाल है, यह भेद भ्रम मात्र है।
यदि आप व्यवहार को लेकर कहते हो तो यह बनता नहीं, क्योंकि मैं पवित्र ब्राह्मण हूँ, तुम श्वपच हो, इसीलिए दूर हट जाओ।
हे मुनिवर ! आपका यह भेद-भ्रम मिथ्या है क्योंकि अनेकों शरीरों में एक ही आत्मा है।" इत्यादि उस चाण्डाल के वचन सुनकर आचार्यपाद ने "मनीषापंचक" नामक स्तोत्र की रचना की।
आचार्य कहा---- "जाग्रतादि तीन अवस्थाओं में जो एक चैतन्य है, जगत् साक्षी ब्रह्म, ब्रह्मा से लेकर चींटी पर्यंत सभी शरीरों में मणि में सूत्र के समान जो सबमें ओतप्रोत है।
"दृश्य मिथ्या है, द्रष्टा चैतन्य सत्य है" ऐसी जिसकी दृढ़ बुद्धि हो चुकी है, वह चाण्डाल हो या ब्राह्मण, वह मेरा गुरु है।"
इस स्तुति के पूर्ण होते ही वह चाण्डाल दोनों पत्नियों तथा कुत्तों सहित लुप्त हो गया तथा आचार्यपाद ने विशालाक्षी पार्वती सहित शिव को देखा।
देवता तथा महर्षि स्तुति कर रहे थे। वह कैलाश के समान श्वेत बैल पर सवार थे। उनका वस्त्र हाथी चर्म, तथा कुत्ते चार वेदों के रूप में, मस्तक पर विद्यमान गंगा मदिरा के रूप में, दो अनुचर स्वामी कार्तिक और गणेश के रूप में परिणत हो गये।
विश्वनाथ भगवान ही उनकी परीक्षा के लिए अन्त्यज के रूप में आये थे।
शिव रूप को उन्होंने दंड सहित प्रणाम करके स्तुति की।
चाण्डाल के रूप को प्रणाम नहीं किया।
आजकल टी. वी. में चाण्डाल के रूप को दंड सहित प्रणाम करते दिखाया जाता है, जो कि धर्मशास्त्र, शास्त्रमर्यादा तथा दिग्विजयों के प्रमाण से सर्वथा विरुद्ध है।
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