शबरी के गुरु मतङ्ग
*💥शबरी के गुरु मतङ्ग💥*
आप महातपस्वी, योगी, त्यागी, वीतराग एवं सिद्ध महात्मा थे। हजारों वर्षों तक समाधि में रहते थे, इनकी ख्याति सर्वत्र व्याप्त थी।
इनकी सत्यसंकल्प के प्रभाव से शबरी नाम की ब्राह्मणी इनकी शिष्या थी।
इन्होंने जीवन में ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी दूसरे वर्ण को मन्त्र दीक्षा न देने का संकल्प लिया था, अतः ये जन्म से ही ब्राह्मण सिद्ध होते हैं।
अज्ञानतावश कुछलोगों का कथन है कि यह मतङ्ग 【हाथी】 मारकर खाते थे, इसलिए इनका नाम 'मतङ्ग' हुआ, परन्तु यह नितान्त असत्य है, यह बात त्याज्य है।
आप परम् अहिंसा व्रत का पालन करते थे।
इनके अहिंसा व्रत के प्रभाव के कारण आश्रम के चारों ओर विरोधी स्वभाव वाले जीव-जन्तु भी परस्पर विरोध का त्याग करके सद्भाव से रहते थे।
इनका विशेष जीवन-चरित्र वाल्मीकीय रामायण के अरण्यकांड के ७३-७४ सर्ग में वर्णित है।
भगवान श्रीराम का लक्ष्मण सहित कंदमूल, फल से स्वागत करने के अनन्तर शबरी वन में जाकर गुरु जी का आश्रम उन्हें दिखाते हुये, मतङ्ग ऋषि का चरित्र सुनाते हुए कहती है कि~~~~~~
" हे राम ! जिस समय आप सीता लक्ष्मण सहित चित्रकूट में पधारे थे, उस समय मैं अपने गुरु महाराज की सेवा करती थी। वे अति वृद्ध थे, तब योग, समाधि द्वारा अपने शरीर को त्यागने की इच्छा उन्होंने की।
तब मैंने भी शरीर त्याग करने की इच्छा प्रकट की।"
इसपर गुरुजी ने मना करते हुये कहा--- 'हे धर्मज्ञे ! तुम इसी आश्रम में रहो, इसी पवित्र आश्रम में पूर्ण परमब्रह्म, श्रीराम के रूप में, लक्ष्मण सहित पधारेंगे।
तुम दोनोंका आतिथ्य-सत्कारपूर्वक दर्शन करते हुए अपने अविनाशी रूप को प्राप्त होगी।'
हे पुरुषश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर गुरुजी ने शरीर त्याग दिया। उनके अनन्तर मैं आपकी प्रतीक्षा करते हुए आश्रम में ही रहने लगी।"
शबरी ने श्रीराम को उनका आश्रम दिखाते हुये कहा~~~
" हे रघुनन्दन ! इस स्थान पर स्नानादि के अनन्तर गुरुजी बैठकर संध्योपासना तथा अग्निहोत्र करने के उपरान्त अपने वृद्ध कांपते हाथों से स्वयं पुष्प तोड़कर तथा उनका सुंदर हार बनाकर देवताओं को समर्पित किया करते थे।
हे रघुराम ! उनकी तपस्या के प्रभाव से जिस चबूतरे पर बैठकर वे पूजन करते थे, उस चबूतरे से दशों-दिशाओं को प्रकाशित करने वाला अतुलित प्रकाश आज भी निकल रहा है।
मेरे गुरुदेव के द्वारा चढ़ाये हुए पुष्प तेरह वर्ष व्यतीत हो जाने पर, आज भी ज्यों के त्यों है, वे मुरझाये नहीं है।
अब आप गुरुजी का दूसरा चमत्कार देखें।
गुरुजी अत्यंत वृद्ध होने के कारण जब सम्पूर्ण तीर्थों की यात्रा करने में असमर्थ हुये, तब उन्होंने यहीं पर बैठे ही बैठे सातों समुद्रों तथा नदियों का आवाहन किया, तो उनके स्नान के लिए सातों समुद्र यहां आये हुये देखे गये।
वे अपने वृद्ध हाथों से जिन पेडों की सिंचाई करते थे, उनके तप के प्रभाव से वह जल आजतक भी नहीं सूखा है।"
इतना कहने के पश्चात् शबरी ने भगवान की स्तुति करने के अनन्तर कहा----- " मैं अब आपका दर्शन करते हुए इस शरीर को त्यागना चाहती हूं।"
भगवान की आज्ञा से शबरी ने योगाग्नि से शरीर त्यागकर गुरूजी का ब्रह्मलोक प्राप्त किया।
बाल्मीकीय रामायण में शबरी द्वारा कहे हुये मतङ्ग ऋषि का चरित्र निष्कलंक, आदर्श एवं तपोत्यागमय सिद्ध होता है।
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