नंदीश्वर


                 ❄नंदीश्वर❄

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शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे।
वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा।

शिलाद ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर अयोनिज व मृत्युहीन पुत्र मांगा।
इंद्र ने कहा ऐसा वरदान तो शिव ही दे सकते हैं।
तब शिलाद ने शिव को प्रसन्न कर उनके समान मृत्युहीन व अयोनिज पुत्र का वरदान मांगा।
भगवान शिव ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया।

कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा।
नंदी जब बढ़े हुए तो शिलाद ने नंदी को शास्त्रों का ज्ञान दिया।

एक दिन भगवान शिव द्वारा भेजे गए , मित्रा-वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए।
उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं।
नंदी को यह ज्ञात हुआ तो उसने वन में जाकर महादेव की आराधना आरंभ कर दी।
भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन देकर कहा -
वत्स नंदी ...
तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है ?
मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।
भगवान शंकर ने नंदी का अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।
इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।

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नंदी मंत्र :-
" ॐ महाकालयम महावीर्यं शिव वाहनं उत्तमम गणनामत्वा प्रथम वन्दे नंदिश्वरम महाबलम ! "

शिव मंदिर मे प्रवेश करते ही सबसे पहले हमें शिव के वाहन नंदी के दर्शन होते हैं।

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यह भी माना जाता है कि नंदी पुरुषार्थ का प्रतीक है।
शिव मंदिर में नंदी की विशेषता होती है कि उसका मुंह शिवलिंग की ओर होता है।

नंदी शिवलिंग की ओर ही मुख करके क्यों बैठा होता है ?
नंदी की इसी मुद्रा का व्यावहारिक जीवन मे क्या संदेश है ??
इस प्रकार के कई प्रश्न जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं ।

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नंदी का संदेश है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है ... ठीक उसी तरह हमारा शरीर , हमारी आत्मा का वाहन है।

जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है,
उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर हो।
इस बात का सरल शब्दों मे यही अर्थ है कि हर व्यक्ति को अपने मानसिक, व्यावहारिक और वाणी के गुण-दोषों की परख करते रहना चाहिए।

मन मे हमेशा मंगल और कल्याण करने वाले देवता शिव की तरह दूसरों के हित,
परोपकार और भलाई का भाव रखना चाहिए।

नंदी का संकेत यही होता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है।
इसे ही आम भाषा मे मन का साफ होना कहते हैं।

इससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के सेहतमंद रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है।
इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य मे सफलता के निकट ले जाता है।

इस तरह अब जब भी मंदिर मे जाएं शिव के साथ नंदी की पूजा कर शिव के कल्याण भाव को मन मे रखकर वापस आएं ... इसी को शिवतत्व को जीवन मे उतारना कहा जाता है।

“ॐ महाकालयम महावीर्यं शिव वाहनं उत्तमम गणनामत्वा प्रथम वन्दे नंदिश्वरम महाबलम !”

इस मंत्र के नियमित जप द्वारा हम सदकर्मों लिए प्रेरित होते हैं।

!! ॐ सुरभ्यै नमः !!

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