साम्ब शंकर की आरती
।। आरती ।।
आर्त अर्थात हृदय की गहराईयों से निकली आवाज , दु:ख के उन असीम क्षणों मे यकायक बरबस निकली आऽऽवाज । जैसे गजेन्द्र के मगर द्वारा पैर पकडे जाने पर कुछ न होता देख अंतिम क्षणो मे नारायण को याद कर आऽऽवाज लगाई ' आर्त नाद ' हुआ और नारायण को आना पडा , द्रौपदी चीरहरण क्षणों मे किसी के भी द्वारा कुछ भी न होता देख अंतिम क्षणो मे कन्हैय्या को याद कर आऽऽवाज लगाई - आर्त होने वाला ही तो आरती होता है ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।
सत्य सनातन शिव शुभँकर की ।।
आदि अनादि अनन्त अनामय ।
अज अविनाशी अकल कलामय ।।
सर्व रहित नित सर्व उरालय ।
मस्तक सुरसरिधर शशिधर की ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।।
कर्ता भर्ता जग संहारी ।
ब्रह्मा विष्णु रुद्र तनुधारी ।।
सर्व विकाररूप अविकारी ।
अग जग पालक प्रलयंकर की ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।।
विश्वातीत विश्वगत स्वामी ।
द्रष्टा साक्षी अन्तर्यामी ।।
काम काल सब जगहितकामी ।
अनघ स्वरूप सकल अघहर की ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।।
मुनि मन हरण मधुर शुचि सुन्दर ।
अति कमनीय रूप सुषमावर ।।
दिव्याम्बर रत्न भूषणधर ।
सर्व नयन मन हर सुखकर की ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।।
विकट कराल पंचमुखधारी ।
मुण्डमाल विषधर भयकारी ।।
हाथ कपाल श्मशान विहारी ।
वेष अमंगल मंगलकर की ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।।
भोगी योगी ध्यानी ज्ञानी ।
जग जग अभिमानाधार अमानी ।।
आशुतोष अति औढरदानी ।
दैन्य दुरित दुर्गतिहर हर की ।
आरती परम साम्ब शँकर की ।।
।। महादेव ।।
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