सुख
*सुख* के पीछे दुःख खड़ा ही है इसलिये सुख के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है । सुख के पीछे दुःख और फिर दुःख के पीछे सुख चक्र की भाँति चलते ही रहनेवाले हैं सुख अथवा दुःख,मन का विषय है और सद्गुरू चरण कमलों में लग जाने के बाद *#सुख-दुःख* तो आते हैं लेकिन उनके ताप का अनुभव नहीं होता है। जैसे हम सीधे सीधे आग को छुएँगे तो हाथ जलेगा ही लेकिन हाथ में ऐस्बेस्टस युक्त्त दस्ताने पहन कर आग को छुएँगे तो आग तो रहेगा लेकिन उसके ताप का अनुभव हाथ को नहीं होगा। *जयश्रीमन्नारायण*
टिप्पणियाँ