केले का पत्ता

*💥केले का पत्ता 💥*

*( केले का पत्ता यानी द्वैत में अद्वैत एक रोचक कथा।)*

जब रावण की सेना को हरा कर और मातासीता जी को लेकर प्रभुश्री राम चन्द्र जी वापस अयोध्या पहुंचे - तो वहां उन सब के लौटने की ख़ुशी में एक बड़े भोज का आयोजन हुआ | वानर सेना के सभी लोग भी आमंत्रित थे - लेकिन बेचारे सब ठहरे वानर ही न ?

तो महात्मा सुग्रीव जी ने उन सब को खूब समझाया - देखो - यहाँ हम मेहमान हैं और अयोध्या के लोग हमारे मेजबान | तुम सब यहाँ खूब अच्छे से आचरण करना - हम वानर जाति वालों को लोग शिष्टाचार विहीन न समझें, इस बात का ध्यान रखना |

वानर भी अपनी जाति का मान रखने के लिए तत्पर थे, किन्तु एक वानर आगे आया और हाथ जोड़ कर महात्मा सुग्रीवजी से कहने लगा " प्रभो - हम प्रयास तो करेंगे कि अपना आचार अच्छा रखें, किन्तु हम ठहरे बन्दर | कहीं भूल चूक भी हो सकती है - तो अयोध्या वासियों के आगे हमारी अच्छी छवि रहे - इसके लिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप किसी को हमारा अगुवा बना दें, जो न सिर्फ हमें मार्गदर्शन देता रहे, बल्कि हमारे बैठने आदि का प्रबंध भी सुचारू रूप से चलाये, कि कही इसी चीज़ के लिए वानर आपस में लड़ने भिड़ने लगें तो हमारी छवि धूमिल होगी |"

अब वानरों में सबसे ज्ञानी, व प्रभुश्री रामजी के सर्वप्रिय तो भगवान हनुमान जी ही माने जाते थे - तो यह जिम्मेदारी भी उन पर आई |

भोज के दिन भगवान श्री हनुमानजी सबके बैठने वगैरह का इंतज़ाम करते रहे , और सब को ठीक से बैठाने के बाद प्रभु श्री रामजी के समीप पहुंचे, तो प्रभु श्री रामजी ने उन्हें बड़े प्रेम से कहा कि तुम भी मेरे साथ ही बैठ कर भोजन करो | अब भगवान हनुमानजी पशोपेश में आ गए | उनकी योजना में प्रभु के बराबर बैठना तो था ही नहीं - " वे तो अपने प्रभु के जीमने के बाद ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करने वाले थे |"

न तो उनके लिए बैठने की जगह ही थी ना ही केले का पत्ता तो भगवान हनुमानजी बेचारे पशोपेश में थे - ना प्रभु की आज्ञा टाली जाए, ना उनके साथ खाया जाए | प्रभु तो भक्त के मन की बात जानते हैं ना ? तो वे जान गए कि मेरे हनुमान के लिए केले का पत्ता नहीं है , ना स्थान है |

उन्होंने अपनी कृपा से अपने से लगता भगवान हनुमानजी के बैठने जितना स्थान बढ़ा दिया (जिन्होंने इतने बड़े संसार की रचना की हो उन्होंने ज़रा से और स्थान की रचना कर दी) | लेकिन प्रभु ने एक और केले का पत्ता नहीं बनाया |

उन्होंने कहा " हे मेरे प्रिय अति प्रिय छोटे भाई या पुत्र की तरह प्रिय हनुमान | यूं मेरे साथ मेरे ही केले के पत्ते में भोजन करो | क्योंकि भक्त और भगवान एक हैं - तो कोई हनुमान को भी पूजे तो मुझे ही प्राप्त करेगा (यही अद्वैत यानी एकेश्वरवाद है.) |"

इस पर भगवान श्री हनुमानजी बोले - "हे प्रभु - आप मुझे कितने ही अपने बराबर बताएं, मैं कभी आप नहीं होऊँगा, ना तो कभी हो सकता हूँ - ना ही होने की अभिलाषा है | ,,,,, (यह है द्वैत, यानी जीव और ब्रह्म के बीच की मर्यादा),,,,, - मैं सदा सर्वदा से आपका सेवक हूँ, और रहूँगा - आपके चरणों में ही मेरा स्थान था - और रहेगा | तो मैं आपकी थाल में से खा ही नहीं सकता | " जब भगवान हनुमानजी ने प्रभु के साथ भोजन करने से इनकार कर दिया।

तब प्रभु श्री रामजी ने अपने सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली से केले के पत्ते के मध्य में एक रेखा खींच दी - जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया | एक भाग में प्रभु ने भोजन किया -और दूसरे अर्ध में भक्त हनुमान को कराया | तो जीवात्मा और परमात्मा के ऐक्य और द्वैत दोनों के चिन्ह के रूप में केले के पत्ते आज भी एक होते हुए भी दो हैं - और दो होते हुए भी एक है |

*यानी द्वैत में अद्वैत । यही सृष्टि की व्यवस्था जो ब्रह्म और जीव के संबंध यानी द्वैत में अद्वैत को दर्शाती है। इसे समझ लिया तो जीवन से उद्धार तय है। ( जीवात्मा एवं परमात्मा का सम्बन्ध )*

टिप्पणियाँ