पञ्चांगुली साधना (2)
पंचांगुली देवी कालज्ञान की देवी हैं आप इसे महाकाली के रूप में जान सकते हैं। पञ्चागुली साधना को सिद्ध कर आप समाज कल्याण कर सकते हैं। ऐसा साधक अपने आपातकाल का ज्ञान भी पहले ही अर्जित कर सकता है। साधक किसी भी व्यक्ति के भविष्य के प्रत्येक क्षण को अक्षरशः जान सकता है, और घटित होने वाली दुर्घटनाओं की पूर्व जानकारी देकर उन्हें सचेत कर सकता है। इस साधना की उच्चतम स्थिति दिव्य दृष्टि सम्पन्न होना है।
ज्ञान तो चैतन्य शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होता है, जिसे अपने अन्दर से प्रस्फुटित करना पड़ता है। यदि पंचांगुली मंत्र के साथ-साथ काल ज्ञान मंत्र को भी सिद्ध कर लिया जाय तो दिव्य दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर यह जरूरी नहीं कि जिस व्यक्ति का भूत-भविष्य जानना हो, वह सामने हो ही रहे।
साधना विधान :
(अ) : इस साधना को करने के लिए ‘ पंचांगुली यंत्र व कवच तथा ‘ प्राण प्रतिष्ठित रुद्राक्ष माला की आवश्यकता होती है।
(आ) : यह साधना किसी भी शुक्ल पक्ष की द्वितीया,पंचमी, सप्तमी या पूर्णमासी को ब्रह्म मुहूर्त में करनी चाहिए।
(इ): इक्कीस दिन की साधना को किसी एकांत पूजा स्थल में ही सम्पन्न करना चाहिए। इसमें पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके, पीले वस्त्र धारण कर बैठ जायें।
(ई) : एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर ‘पंचांगुली देवी यंत्र'(ताबीज) स्थापित कर दें। यंत्र को किसी ताम्र प्लेट में रखें।
(उ) : गणपति का ध्यान करें, फिर गुरुदेव का ध्यान, स्नान, पंचोपचार पूजन सम्पन्न कर, गुरु मंत्र का जप करें। गुरु पूजन के पश्चात् षोडशोपचार पूजन हेतु यंत्र पर कुंकुम से ‘ स्वस्तिक ’ का चिह्न बनायें।
#षोडशोपचार विधि :
ध्यान : ॐ भूभुर्वः स्वः श्री पंचांगुली देवीं ध्यायामि।
आह्वान : ॐ आगच्छाच्छ देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे।
क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तमे॥
ॐ भूर्भुवःस्वः श्री पंचांगुली देवताभ्योः नमः आह्वानं समर्पयामि।
आसन : रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्य करं शुभम्। आसनञ्च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरीं॥
ॐ भूभुर्वः स्वः श्री पंचांगुली देवताभ्यो नमः आसनं समर्पयामि।
स्नान : ऊँ गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदा जलैः।
स्नापिताऽसि मया देवि तथा शान्तिं कुरुष्व मे॥
पयस्नान : ऊँ कामधेनु समुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम्।
पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम्॥
दधिस्नान : ऊँ पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।
दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥
मधुस्नान : ऊँ तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥
घृतस्नान : ऊँ नवनीत समुत्पन्नं सर्वसन्तोष कारकम्।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥
शर्करास्नान : ऊँ इक्षुरस समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका।
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥
वस्त्र : ऊँ सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे।
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रति गृह्यताम् ।।
गन्ध : ऊँ श्री खण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठि चन्दनं प्रति गृह्यताम्॥
अक्षत : ऊँ अक्षताश्च सुरश्रेष्ठि कुकुम्माक्ता सुशोभिता।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ।।
पुष्प :ॐ माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै विभे।
मयाहृतानि पुष्पाणि प्रीत्यर्थं प्रति गृह्यताम्॥
दीप : ऊँ साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे॥
नैवेद्य : ऊँ नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्तिं मे ह्यचला कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्रेह परां गतिम्॥
दक्षिणा : ऊँ हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तः पुण्य फलदमतः शांतिं प्रयच्छ मे॥
विशेषार्घ्य : ऊँ नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते धरणीधरे। नमस्ते जगदाधारे अर्घ्यं च प्रति गृह्यताम्।।
ऊँ वरदत्वं वरं देहि वांछितं वांछितार्थदं। अनेन सफलार्घैण फलादऽस्तु सदा मम।।
ऊँ गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्र्यमेव च। आगता सुख सम्पत्तिः पुण्योऽहं तव दर्शनात्॥
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